हम इस स्टेज आ गए जहां अदलतों को शाम 5 बजे तक रिहाई का आदेश देना पड़ रहा : जस्टिस लोकुर

द लीडर : सुप्रीमकोर्ट से रिटायर्ड जस्टिस मदन बी लोकुर ने मणिपुर के एक्टिविस्ट एरेंड्रो लीचोम्बम की रिहाई का हवाला देते हुए कहा कि, ये वो स्थिति है. जहां हम आ गए हैं. इसमें न्यायालयों को शाम 5 या 6 बजे तक रिहाई का ऑर्डर देना पड़ रहा है. जबकि किसी शख्स को रिहा करना पुलिस का फर्ज है. बीते सोमवार को सुप्रीमकोर्ट ने एरेंड्रो लीचोम्बम के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि, उन्हें शाम 5 बजे तक रिहा करें. (Justice Madan B Lokur )

रविवार को जस्टिस लोकुर न्यायिक जवाबदेही और न्यायिक सुधार के लिए अभियान (CJAR) के वेबिनार में बोल रहे थे. विषय था-डेमोक्रेसी, असहमति और सख्त कानून पर संवाद-क्या यूएपीए और राजद्रोह को कानूनी किताबों में स्थान मिलना चाहिए?

जस्टिस लोकुर ने देशद्रोह और गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) कानून को लेकर अपनी राय जाहिर की. और स्पष्ट किया कि ये कानून कहीं नहीं जाने वाले. मतलब अपनी जगह ही रहेंगे. बल्कि इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) को और शामिल किया जा रहा है. (Justice Madan B Lokur )


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उन्होंने इन कठोर कानूनों के तहत लंबे समय की कैद के बाद दोषमुक्त किए जा रहे लोगों को मुआवजा दिए जाने की जरूरत पर बात की. बोले-एक शब्द में इसका जवाब है. और वो है, हां. मुआवजा मिलना चाहिए.

इसके संदर्भ में तमाम पिछले और हालिया मसलों को रखा. मणिपुर के एरेंड्रो लीचोम्बम, जिन्हें एक फेसबुक पोस्ट करने पर हिरासत में लिया गया था. जिसमें उन्होंने कहा था कि, ”गौमूत्र या गोबर से कोविड का इलाज नहीं हो सकता”. इस पर उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत कार्रवाई की गई थी. (Justice Madan B Lokur )

जस्टिस लोकर ने दिल्ली के एक्टिविस्ट नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा के केस का हवाला दिया. कहा, दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उन्हें जमानत दे दी गई थी. लेकिन पुलिस ने फौरन रिहा नहीं किया. पुलिस ने तर्क दिया कि उनके स्थायी पतों का सत्यापन करना चाहती है.


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मतलब-उन्हें यानी तीनों को जेल में रहना चाहिए. सवाल उठाया क्या पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी के समय पते और आधार कार्ड की जांच नहीं की थी. ये क्या चल रहा है? कोर्ट आदेश जारी करती है. वह मतलब-पुलिस कहती है कि अगर उसका अनुपालन करना चाहेंगे तो करेंगे वरना नहीं. (Justice Madan B Lokur )

जस्टिस लोकुर ने कहा कि आपके सामने मणिपुर है. यूपी भी है, जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एनएसए के अंतर्गत करीब 90 आदेशों को निरस्त कर दिया. मुझे नहीं लगता देशद्रोह, यूएपीए कहीं जाएंगे. बल्कि एनएसए का इस्तेमाल और होगा. ऐसी सूरत में लोग कैसे हालात का सामना करेंगे? इसलिए जवाबदेही ही केवल एक रास्ता है.

जस्टिस लोकुर ने इसके दो तरीके सुझाए. पहला फाइनेंशियल है. जिसमें ऐसे सभी लोगों को, जिनकी गलत तरीके से गिरफ्तारियां हुईं या फिर उन्हें हिरासत में रखा गया. उन सभी को मुआवजे के तौर पर एक उचित राशि दी जानी चाहिए. जब कोर्ट, पुलिस और अभियोजन से ये कहना प्रारंभ कर देगी कि आपको 5 या 10 लाख चुकाने पड़ेंगे. तब शायब वे होश में आ जाएंगे. (Justice Madan B Lokur )


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दूसरा काफी गंभीर पहलू है. वो है मानसिक. शायद हमें ये लगे कि 5 लाख रुपये का मुआवजा दे दिया है तो सब ठीक हो जाएगा. लेकिन जो व्यक्ति ये मानता है कि वह बेकसूर है और आखिर में वो बरी हो जाता. वो तमाम मानसिक आघातों से गुजरता है. अपनों की याद और वर्षों जेल की पीड़ा.

वो भी उसके लिए, जो उसने किया ही नहीं. मसलन, मनोवैज्ञानिक दबाव. भावनात्मक असर. परिवार. स्कूल जाने पर बच्चों से सवाल कि तुम्हारे पिता जेल में हैं? क्यों हैं? क्योंकि वो एक आतंकी हैं? वह देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं? उन्होंने देशद्रोह किया है? ये कितना पीड़ादायक है. (Justice Madan B Lokur )

 

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