सैटेलाइट तस्वीर ने खोला रहस्य, इस तरह ऋषि गंगा में पहुंची तबाही, जानिए कैसे

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मनमीत

उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गांव में आई आपदा का रहस्य सैटेलाइट इमेज से खुलने का दावा किया जा रहा है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान ने हैंगिंग ग्लेशियर को आपदा का मुख्य वजह माना है। संस्थान ने छह फरवरी और आठ फरवरी की सैटेलाइट इमेज भी जारी की है।

यह तस्वीर बताती है कि आपदा से पहले क्या हुआ होगा। साथ इस घटना के पीछे की वजहों को भी समझना आसान हाे गया है। इस बुनी गई मुसीबत से सामना कितनी बार होगा, कहना मुश्किल है।

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वैज्ञानिकों का दावा है कि हैंगिंग ग्लेशियर टूटा और अपने साथ नीचे कई ग्लेशियर झीलों को ध्वस्त करता हुआ आगे बढ़ा जिससे बड़ी तबाही हुई। यही कारण रहा होगा, जिसके चलते एक बार फिर बृहस्पतिवार को ऋषि गंगा में बहाव तेज हो गया और बचाव दलों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। कैसे?

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के पूर्व ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल और वरिष्ठ भूगर्भीय वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल इस संबंध में पहले ही बता चुके थे कि रैणी गांव से लगभग दो किलोमीटर ऊपर कोई ग्लेशियर या एवलांच टूटने से झील नहीं बनी होगी। बल्कि कई ‘मल्टीपल लेक’ पहले से मौजूद होंगे।

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Uttarakhand Disaster Updateऐसी झील अमूमन ग्लेशियरों के मुहाने पर होती है और बर्फ के खिसकने से ग्लेशियर से दूर होती चली जाती है। ये आसानी से इसलिए भी नहीं दिखती, क्योंकि इनके उपर हिमलयी मिट्टी और डस्ट गिरती रहती है। ऐसी झीलें पचास के करीब भी हो सकती हैं या उससे ज्यादा भी।

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के महानिदेशक कलाचंद साई के अनुसार, ”सैटेलाइट इमेज में पर्वत की चोटी पर 75 डिग्री सीधी हैंगिंग ग्लेशियर लटका हुआ था, जो पर्वत से अलग हो गया और सीधे तेज गति से धमाके के साथ नीचे गिरा। नीचे कई जलाशय पहले से मौजूद थे, उन्हें समेटता हुआ यह बड़ा हिमखंड तेज गति से ऋषि गंगा नदी में पहुंचा और उसके बाद तबाही हुई।”


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क्यों सहमत है वैज्ञानिक इस दावे से

दरअसल, सैटेलाइट इमेज में साफ दिख रहा है कि छह फरवरी को पर्वत में कोई हलचल नहीं हुई। जबकि आठ फरवरी को पर्वत की चोटी के बगल से एक बड़ा हिमखंड टूटा हुआ दिख रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, नंदा देवी पर्वत के आसपास कुल 14 ग्लेशियर हैं। इन सभी ग्लेशियरों से थोड़ा-थोड़ा पानी निकलता है और फिर ऋषि गंगा नदी बनती है। इन 14 में से एक ग्लेशियरों से निकली जलधारा को इस हैगिंग ग्लेशियर ने अवरूद्ध किया होगा।

इस जलधारा में इतना पानी नहीं है कि वो दो दिन में इतना पानी रोक दे। इसलिये ये माना जा रहा है कि जहां पर ग्लेशियर का टुकड़ा गिरा, वहां पर पहले से कई डेड आइस से बनी झीलें मौजूद थीं। जो एक के बाद एक करके टूटती गईं और पानी का स्तर बढ़ता गया।


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कैसे बने इतने ग्लेशियर झीलें

ऋषि गंगा और तपोवन बांध निर्माण से इस घाटी में मानवीय गतिविधियां ज्यादा हो गई है। बांध निर्माण के दौरान 2019 में चिपको नेत्री गौरा देवी के रैणी गांव के निवासियों ने बांध में डायनामाइट विस्फोटों की शिकायत हाईकोर्ट में की। शिकायत पर कोर्ट ने तत्काल विस्फोटों पर रोक लगा दी।

तब तक कितना नुकसान हो चुका था, इसका कोई आकलन नहीं हो पाया।

वैज्ञानिकों के अनुसार, पहाड़ काटने वाले शक्तिशाली डायनामाइट विस्फोटों से ग्लेशियरों में दरार बन जाती है। चूंकि बांध क्षेत्र ग्लेशियरों से ज्यादा दूर नहीं है, ऐसे में ग्लेशियरों में दरार बनना लाजिमी। अनुमान है कि इसी तरह की दरार ने ग्लेशियर से एक बहुत बड़े हिमखंड को दूर कर दिया होगा। इस हिमखंड और ग्लेशियर के बीच ही कई झील बनी होंगी।

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