किसान आंदोलन : 138वें दिन किसानों ने अंबेडकर जयंती को संविधान बचाओ दिवस के रूप में मनाया

द लीडर : देश के हजारों किसान पिछले 138 दिनों से आंदोलनरत हैं. लेकिन उनकी मांग-तीनों कृषि कानूनों को रद किए जाने का कोई हल नहीं निकला. संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर डॉॅ. भीमराव अंबेडकर जयंती को ‘संविधान बचाओ दिवस’ के रूप में मनाया. संयुक्त किसान मोर्चा के नेता डॉ. दर्शन पाल सिंह के हवाले से जारी एक प्रेस नोट में कहा कि औपनिवेशिक शासन में देश के मजूदर, किसान और कामगार वर्ग का बेहिसाब शोषण हुआ करता था. इस व्यवस्था को बदलने के लिए सामाजिक क्रांति के रूप में संविधान बनाया गया.

भारतीय संविधान में हर नागरिक की बराबरी, न्याय और तरक्की के सुनिश्चित किए जाने के तमाम प्रावधान हैं. जिन पर सरकारें लगातार हमलावर हैं. किसाान नेताओं ने कहा कि मौजूदा सरकार और आरएसएस संविधान में सुधार के नाम पर तमाम छेड़छाड़ कर रही है. जोकि अर्थव्यवस्था और समाज दोनों के लिए खतरनाक है.

कृषि राज्यों का विषय है. जिस पर केंद्र सरकार ने कानून बनाया है. जो असंवैधानिक कदम है. भाजपा और आरएसएस देश की संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करके भारत देश के भविष्य के लिए खतरा उत्पन्न कर रही हैं.


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इन संविधान विरोधी ताकतों का देश की जनता पहले से ही विरोध करती आ रही है. लेकिन वर्तमान किसान आंदोलन ने न सिर्फ संविधान को बचाने का प्रयास किया है बल्कि संविधान को सुचारू रूप से लागू करवाने के भी प्रयास कर रहा है.

आज किसान बहुजन एकता दिवस भी मनाया गया. मंस से किसान नेताओं ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा बिना किसी संवाद व मांग के तीन कृषि कानून, कोरोना महामारी के बीच लाए गए हैं. मंडी व्यवस्था और उचित MSP व कर्जा मुक्ति किसानों की सबसे बड़ी आजादी है.

किसान आंदोलन में राकेश टिकैत के साथ चंद्रशेखर आजाद.

ठीक इसी तरह मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी व सम्मानपूर्वक काम शोषण से बचाता है. मौजूदा समय में दोनों ही वर्गों को केंद्र सरकार ने निशाना बनाया है. कॉरपोरेट और सरकार की मिलीभगत के खिलाफ किसान-मजदूर एकजुट हैं. सरकार कामगार वर्ग को अनेक जातियों में बांटकर “फूट डालो-राज करो” की नीति लागू कर रही है.


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न सिर्फ आवश्यक वस्तु संशोधन कानून बल्कि अन्य दो कानून भी दलितों, बहुजनों की अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेंगे. आज मजदूर और किसान भलिभांति इसे समझते है. और इन नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं.

हरियाणा के दलित संगठनों ने टिकरी बॉर्डर पर पहुंच कर किसानों के धरनों को और मजबूत करने का फैसला किया है. गाजीपुर बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर पर प्रगतिशील नेता चंद्रशेखर आजाद ने पहुंचकर एक सांझी लड़ाई लड़ने का आह्वान किया. पंजाब नरेगा मजदूर एसोसिएशन के कार्यकर्ताओं की सिंघु बॉर्डर पर बड़ी भागीदारी रही.

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