मुसन्ना बिन हारिसा, एक गुमनाम योद्धा जिन्होंने ईराक को फतह किया था

खुर्शीद अहमद


मुसन्ना बिन हारिसा. क्या आप इन्हें जानते हैं. होता ये है कि जब कोई कौम तरक्की कर रही होती है तो बड़े लोगों के साथ कुछ गुमनाम शख्सियतें ऐसा काम कर जाती हैं कि दुनिया देखते रह जाती. मुसन्ना बिन हारिसा भी इनमें से एक हैं. इराक के अल शैबानी कबीले से उनका ताल्लुक था. बाद में अपने कबीले के साथ मदीना आ गए थे.

और अल्लाह के रसूल से मुलाकात की. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इन्होंने वहीं इस्लाम कबूल कर लिया और सहाबी बन गए. जबकि अधिकतर इतिहासकारों का तर्क है कि वह वापस लौट गए थे बाद में सोच समझकर इस्लाम कबूल किया. और जब मदीना पहुंचे तो अल्लाह के रसूल का इंतकाल हो चुका था. मदीना में हज़रत अबु बकर की ख़िलाफत थी. इस तरह वह सहाबी नहीं ताबई हैं.

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उन दिनों ईराक पर ईरान के सासानी परिवार की हुकूमत थी, जो उस वक्त सुपरपावर थे. अरब से इस्लाम को मिटा देना चाहते थे. कई बार कोशिश भी की थी. वहां का बादशाह अल्लाह के रसूल का खत भी फाड़ चुका था.
हज़रत अबु बकर चाहते थे कि उनके ख़तरे को रोकने के लिए कुछ आक्रमण नीति अपनाई जाए और एक सैन्य टुकड़ी को ईराक भेजा जाए.

सेना तैयार होती है, जब उसके नेतृत्व की बात आती है तो उस समय एक से बढ़कर एक योद्धा थे. जो किसी भी सेना का नेतृत्व कर सकते थे. अबु औबैदा बिन अल जर्राह थे. खालिद बिन वलीद थे. साद बिन अबी वक्कास थे, मोआज बिन जबल, अमर बिन अलआस और यजीद बिन अबु सुफियान जैसे बड़े नामों की लंबी फेहरिस्त है.

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लेकिन हज़रत अबु बकर ने सेना के नेतृत्व के लिए एक आम आदमी चुना और वह थे मुसन्ना बिन हारिसा. हारिसा ने अपने पर खलीफा के भरोसे और एतमाद का पूरा सम्मान किया और इन्हीं के नेतृत्व में ईराक फतह हुआ. इस तरह यह फातिहे ईराक कहलाए. ईराक की फतह मामूली काम नहीं थी. उस समय के सुपर पावर से एक मुल्क छीन लेना था. पर उन्होंने अनहोनी को होनी कर दिखाया. अल्लाह की रहमत हो उन पर.

यह इसलाम के नबी और उनके बाद के खलिफाओं की खूबी थी कि जिस के अंदर सलाहियत देखते थे उसे पूरा मौका देते थे. किसी पद पर चुनने के लिए जात पात कुनबा, कबीला, गोरे काले का कोई महत्व और रत्ती भर भी भेद न था.

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