जस्टिस काटजू को ऐसा क्यों लग रहा कि भारत में अच्छे के बजाय काले दिन आने वाले हैं

जस्टिस मार्केंडय काटजू

किसान आंदोलन के बीच व्यापारी भी आंदोलन की राह पर हैं. कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने 26 फरवरी को देश में अखिल भारतीय बंद का आह्वान कर रखा है. सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि किसान और व्यापारी आंदोलन की डगर पर हैं? इसे समझने के लिए सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में है. अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कॉरपोरेट्स के पास बेशुमार दौलत है, जिसके बूते वे खड़े हैं. पूंजी की प्रकृति यही है कि वो फायदेमंद निवेश के नए रास्ते तलाशती है.

हालांकि मौजूदा समय में इसके ज्यादातर रास्ते बंद या प्रतिबंधित नजर आते हैं. ट्रेडिंग और कृषि सेक्टर, भारतीय अर्थव्यवस्था के दो मजबूत खंबे हैं. जिन्हें, बड़े कॉरपोरेट्स ने यूं ही छोड़ दिया था. मगर अब ऐसा लगता है कि उन्होंने इन क्षेत्रों में मजबूती के साथ कदम रखने का फैसला कर लिया है.

रेल रोके अभियान के दौरान रेल पटरियों पर जमे किसान. फाइल फोटो

जिस तरह एक बड़ी शॉर्क, छोटी मछलियां खा जाती है. ठीक उसी तरह बड़े व्यवसाय भी छोटे कारोबार को खत्म कर देते हैं. मसलन, अमेजॉन जैसे विशाल कॉरपोरट ने भारत में ऑनलाइन शॉपिंग साइट शुरू की. इसने भारत के छोटे दुकानदारों को तबाह कर दिया.

क्योंकि ग्राहकों ने दुकान के पर जाने के बजाय ऑनलाइन खरीदारी को तरजीह दी. इसलिए क्योंकि शुरुआत में ये बड़े कॉरपोरेट दुकानों से कम कीमत पर सामान बेचते हैं. कुछ दिन के बाद भाव चढ़ा देते. देश भर में छोटी दुकानों में ऐसे लाखों कर्मचारी होंगे, जो दुकानें बंद होने से बेरोजगार हो गए.


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आज की स्थिति में लगता है कि भारत सरकार पूरी तरह से उन बड़े कॉरपोरेट्स के अधीन हो चुकी है. हाल ही में सरकार ने नए कृषि कानून बनाए हैं. जो किसानों को अपनी फसल बेचने की आजादी देते हैं, कि वे मनचाही जगह पर अनाज बेच सकेंगे. लेकिन हकीकत जुदा है.

बल्कि सच तो ये है कि कृषि कानूनों को इस तरह डिजाइन किया गया है कृषि क्षेत्र पर कॉरपोरेट अपना कब्जा जमा ले. और भारतीय किसानों को उनके रहम जीना पड़े. खासकर एमसीपी के अभाव में.


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मगर, आज के भारतीय किसान और कारोबारी पुराने दौर से थोड़े अलग मिजाज के हैं. वे शिक्षित हैं और इस बात को ठीक से समझते हैं कि देश में क्या चल रहा है. वर्तमान स्थितियों के मद्​देनजर उन्होंने महसूस किया है कि अगर वे एकजुट होकर नहीं लड़े तो, बड़े कॉरपोरेट उन्हें निगल जाएंगे.

यही असल वजह है कि वे आंदोलन की रास्ते पर हैं. पेट्रोल-डीजल की बेलगाम कीमतों ने स्थिति को और गहरा दिया है. भारत में काले दिन आने वाले हैं.

(लेखक-जस्टिस मार्केंडय काटजू हैं, जो सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश और प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे हैं. अंग्रेजी में प्रकाशित लेख का ये हिंदी अनुवाद है. व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

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