इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उस शाम के गवाह हैं जस्टिस काटजू, जो शायर फैज अहमद फैज की जलवे से यादगार बन गई

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Justice Katju Allahabad University Faiz Ahmed Faiz
जस्टिस काटजू-फोटो, साभार फेसबुक

जस्टिस मार्केंडय काटजू 


फैज अहमद फैज


13 फरवरी है. ये तारीख उर्दू के मशहूर शायर फैज अहमद फैज की (1911-84) जयंती की है, जोकि आज है. जिन्हें, मैं बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े उर्दू शायर के तौर पर मानता हूं. हालांकि मेरे दिल में फिराक गोरखपुर समेत दूसरे कवियों के लिए भी बेशुमार इज्जत है.

साल 1981 की बात है. जब, मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकील था. फैज साहब मेरे गृहनगर इलाहाबाद आए. उनके सम्मान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अहाते में समरोह रखा गया. उस शाम, बेशुमार भीड़ उमड़ पड़ी. मंच पर कई और कवि थे. जिनमें, फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, फैज साहब आदि. काव्य सितारों की आकाशगंगा जैसा अद्भुत नजारा था.

फिराक साहब काफी बुजुर्ग हो चले थे. इतने कि मानसिक सक्रिय होने के बावजूद ठीक से चल नहीं पा रहे थे. विश्वविद्यालय के कुछ लड़के, उन्हें मंच तक लेकर गए.

चूंकि, उर्दू शायरी मुझे बेहद पंसद है. खासकर फैज की शायरी का मैं दीवाना हूं. इसलिए समरोह में पहुंचा. साथ में अपने 6 साल के बेटे विक्रम को भी ले गया, जो उस वक्त महज छह साल का था. ये जानते हुए भी कि विक्रम को कुछ समझ नहीं आएगा. लेकिन, एक दिन बड़ा होकर वो अपने दोस्तों को बता सकेगा कि मैंने फैज और फिराक को देखा है. ये सोचकर मैं उसे साथ ले गया.


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खुशनुमा माहौल में संचालक ने फिराक का एक शेर पढ़कर महफिल की शुरुआत की. आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी, हम-असरो जब वो जानेंगी कि तुमने फिराक को देखा है.

फिर उन्होंने कहा कि मैं शेर को को थोड़ा बदलना चाहूंगा, और पढ़ा- आने वाली नस्लें तुमसे रश्क करेंगी हम-असरो, जब वो जानेंगी कि तुमने फैज, फिराक और महादेवी वर्मा को देखा है.

इसके बाद विश्वविद्यालय की कुछ लड़कियों ने फैज की मशहूर नज्म-गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौ बहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले, पढ़ी. मैंने इस नज्म को कई मर्तबा सुना. लेकिन कभी भी उतनी खूबसूरती से नहीं सुन सका, जितना 40 साल पहले विश्वविद्यालय की लड़कियों ने उस यादगार शाम में सुनाया था.

मंच से काव्य पाठ प्रारंभ हुआ. आखिर में फैज साहब की बारी आई. जिनका, हम सबको बेसब्री से इंतजार था. जैसे ही वे बोलने उठे तो, महफिल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी. उस इंसान के लिए जो, ताउम्र अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा रहा.

पाकिस्तान में मॉशर्ल लॉ के दौरान उन्हें कई साल तक जेल में रखा गया. रॉवलपिंडी मामले में झूठा फंसा गया. जिसने लिखा था, बोल की लव आजाद हैं तेरे, बोल-जुबां अब तक तेरी है. असल में वे हमारी नजर में हीरो थे.


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फैज साहब ने कहा कि उन्हें ऋषि भारद्वाज की नगरी इलाहाबाद से होने पर फख्र है. जहां भगवान राम, अपने वनवास के दौरान आए और अन्य ऋषि मुनि भी. फिर उन्होंने हमें 1930 के प्रगतिशील लेखक संघ से जोड़ा, जिसके लिए फैज ने काम किया था. उन्होंने कुछ कलाम सुनाए. उस यादगार शाम की स्मृति आज भी अमिट है.

जैसा कि मैंने पहले जिक्र किया है कि फैज 20वीं सदी के मेरे सबसे पसंदीदा उर्दू कवि हैं. हालांकि मैं मिर्जा गालिब को अब तक का सबसे बड़ा उर्दू शायर मानता हूं. सुप्रीमकोर्ट के अपने फैसलों में मैंने उनके शेरों का उल्लेख भी किया है.

जब मैंने, पाकिस्तान में बंद भारतीय नागरिक गोपाल दास की रिहाई के लिए पाकिस्तान सरकार को अपने फैसले के जरिये एक अपील की. जो जासूसी के इल्जाम में 27 सालों से पाकिस्तान की जेल में सजा काट रहे थे. मैंने फैज के एक इस शेर के साथ शुरुआत की-‘कफस उदास है यारो सबा से कुछ कहो, कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जिक्र-ए-यार चले.’

पाकिस्तानी अधिकारियों पर इस शेर का इतना ज्यादा असर पड़ा कि, उन्होंने ऐलान किया-पाकिस्तान सरकार, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई अपील का सम्मान करेगी. दुनिया के न्यायिक इतिहास में कभी भी किसी कोर्ट द्वारा इस तरह की अपील पहले नहीं की गई थी. और कभी भी इसे इतना सम्मान नहीं दिया गया था. ये उर्दू शायरी की ताकत है.


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सुप्रीमकोर्ट के एक और फैसले में मैंने फैज के एक शेर का हवाला दिया-‘बने हैं अहले हवस मुद्​दई भी, मुंसिफ भी, किसे वकील करें किससे मुंसिफी चाहे’. मतलब, जब स्वार्थी लोग ही याचिकाकर्ता और न्यायाधीश होते हैं, इस हालत में मुझे किसको अपना वकील करना चाहिए और किससे न्याय मांगना चाहिए.

मेरे फैसले के कुछ दिनों बाद एक वकील मित्र पाकिस्तान गए, जिन्होंने बताया कि आपके उस शेर का हवाला देकर पाकिस्तान के वकील पर्चे बांटे रहे हैं. एक और मित्र ने मुझे बताया कि पाकिस्तान के एक उच्च न्यायालय ने भी अपने फैसलों में मेरे निर्णय का हवाला दिया है.

मैं, 45 साल पहले की एक शरारत का जिक्र करके इस पोस्ट को समाप्त करता हूं, जिसे मैंने आज तक साझा नहीं किया है. घटना, 1972 या 73 की है. तब मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में काफी जूनियर वकील था. आज, जब 75 साल की उम्र में मेरे अंदर इतना जुनून है तो 26 साल में क्या आलम होगा, आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं.

हुआ यूं कि एक जज आए. जो लगभग सभी याचिका और अपील खारिज कर देते थे. कुछ वकील मेरे पास आए. बोले काटजू साहब, बचिए. ये तो हमें बर्बाद कर देंगे. हमें बचा लीजिए. मैंने, उनसे कहा-फिक्र मत कीजिए.


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उस शाम को मैंने लिखा, ‘ये हाईकोर्ट या कसाईघर. नीचे मैंने फैज के उसी शेर का जिक्र किया-बने हैं अहले हवस मुद्​दई भी, मुंसिफ भी, किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहे. मैंने ये भी लिखा था कि, यह जज जब से आए हैं, तब से लगभग सभी मामलों को खारिज ही कर रहे हैं. उच्च न्यायालय की हालत बूचड़खाने जैसी हो गई है.’

किसी, प्रेस ने इस पत्र को छाप दिया. और अगली सुबह उच्च न्यायालय परिसर में इसे बांट दिया गया. इसकी प्रतियां हर कोर्टरूम में जजों की मेज पर रख दी गईं थीं. जब, जज कोर्टरूम में दाखिल हुए, तो उन्होंने पत्र देखा-पढ़ते ही हंगामा खड़ा हो गया.

कई जज तो गुस्से में कमरे से बाहर निकल गए. ये कहते हुए कि ये क्या बदतमीजी है. खैर, उस पत्र का असर ये हुआ कि उसके बाद जज अधिक उदार हो गए थे. इसका श्रेय फैज साहब को ही जाता है.

(मशहूर शायर फैज अहमद फैज की जयंती पर उनकी स्मृति में ये लेख जस्टिस मार्केंडय काटजू ने लिखा है, जो सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश और प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे हैं. अंग्रेजी में लिखे उनके लेख का ये हिंदु अनुवाद है.)

 

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