जब 9 साल की उम्र में आंबेडकर को मुस्लिम पहचान बताने पर भी नहीं मिला था पानी

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Ambedkar Muslim Identity Water Shiva Temple Incidents
साभार, सोशल मीडिया.
अतीक खान 

 

‘हम भूखे थे और खाना, खाना चाहते थे. लेकिन पानी नहीं था. हमने बैलगाड़ी वाले से पूछा, कहीं पानी मिल जाएगा. उसने चेताया, चुंगीवाला हिंदू है. और तुमने सच बोल दिया कि हम महार हैं तो पानी नहीं मिलेगा. उससे मुसलमान बताकर अपनी तकदीर आजमा लो. प्यास से तड़पते 9 साल के भीमराव आंबेडकर अपनी आत्मकथा ‘वेटिंग फॉर वीजा’ में ये लिखते हैं.

गाड़ीवाले की सलाह पर आंबेडकर चुंगी वाली झोपड़ी में जाकर पूछते हैं-थोड़ा पानी मिल जाएगा. अंदर वाला शख्स सवाल करता है-कौन हो. ‘आंबेडकर कहते हैं, हम मुसलमान हैं.’ आंबेडकर लिखते हैं, ‘मैंने उससे उर्दू में बात की, जो मुझे अच्छी आती थी. लेकिन ये चालाकी काम नहीं आई. उसने इतने रुखे अंदाज में कहा, ‘तुम्हारे लिए यहां पानी किसने रखा है? पहाड़ी पर जाओ और वहां से ले आओ. मैं अपना सा मुंह लेकर गाड़ी के पास लौट आया. मेरे भाई ने सुना तो कहा चलो अब सो जाओ.’

ये घटना 1901 की है. लेकिन 120 साल बाद भी समाज उसी सोच में कैद है. बीते शुक्रवार को जब एक मुस्लिम बच्चा गाजियाबाद के डासना स्थित शिव मंदिर में पीनी पीने गया. तब श्रृंगी नंदन यादव नामक युवक ने उस बच्चे को बेरहमी से पीटा. श्रृंगी इंजीनियरिंग में ग्रैजुएट है. घटना का वीडियो उसने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट किया. बहरहाल, पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. (Ambedkar Muslim Identity Water Shiva Temple Incidents)


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आंबेडकर 9 साल की उम्र में पानी के ल‍िए भेदभाव का श‍िकार हुए थे. जिसका उनके व्यक्तित्व पर काफी गहरा असर पड़ा. शिव मंदिर के बाहर पीटे गए बच्चे की उम्र भी कोई 13-14 साल के आसपास होगी. यानी सवा दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी देश में बच्चे पानी पीने के लिए भेदभाव का सामना कर रहे हैं.

इस घटना ने आंबेडकर के वाकिये की यादें ताजा कर दी हैं. ज‍िसको लेकर सोशल मीडिया पर आंबेडकर की तस्वीर के साथ शिव मंदिर के बाहर पीटे गए बच्चे की एक तस्वीर का हाथ से बनाया गया च‍ित्र वायरल हो रहा है, ज‍िसे लोकेश पूजा ने बनाया है. जो धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव का समाज का विद्रूप चेहरा बयां करती है.

आंबेडकर अपनी आत्‍मकथा में ल‍िखते भी हैं कि इस घटना की मेरी जिंदगी में काफी अहमियत है. तब मैं नौ साल का था. मेरे दिमाग पर घटना की अमिट छाप पड़ी. इसके पहले भी मैं जानता था कि मैं अछूत हूं और अछूतों को कुछ अपमान, भेदभाव सहन करना पड़ता है. मसलन, स्कूल में, मैं अपने बराबरी के साथियों के साथ नहीं बैठ सकता था. मुझे एक कोने में अकेले बैठना पड़ता था. (Ambedkar Muslim Identity Water Shiva Temple Incidents)


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मैं यह भी जानता था कि मैं अपने बैठने के लिए एक बोरा रखता था और स्कूल की सफाई करने वाला नौकर तक वह बोरा नहीं छूता था. क्योंकि मैं अछूत हूं. हालांकि आंबेडकर को हैदराबाद के दौलताबाद के एक किले में पानी को लेकर मुसलमानों से भी भेदभाव का सामना करना पड़ा था. इस तरह दोनों मायनों में आंबेडकर के अनुभव कड़े रहे.

डॉ. भीमराव आंबेडकर की वेटिंग फॉर वीजा कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है. जबकि भारत में ये किताब नहीं पढ़ाई जाती. यह किताब हर छात्र, देशवासी को पढ़नी चाहिए. ताकि वो जातिगत भेदभाव को लेकर आंबेडकर के अनुभव जान और समझ सके.

आज देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है. अलग-अलग राज्यों में जश्न के कार्यक्रम भी हो रहे हैं. लेकिन एक सवाल बरकरार है. क्‍या देश को धर्म-जाति और नफरत की कैद से आजादी मिल पाएगी? क्‍योंक‍ि इससे उबरने के बजाय समाज इसमें और गहरा धंसता जा रहा है. आज तो बड़े फख्र के साथ हिंसा को जायज ठहराया जाने लगा है. और तो और महिला, दलित और अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा करने वालों की जयकार भी होने लगी है.


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उनके समर्थन में रैलियों का सिलसिला चल पड़ा है. कठुआ से लेकर यूपी-राजस्थान में हुईं मॉब लिंचिंग की घटनाओं के बाद ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं. जिन पर समाज के एक बड़े हिस्से की मौन सहमति प्रदर्शित नजर आती है. जो भारत की वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति और उसकी तासीर के खिलाफ है. (Ambedkar Muslim Identity Water Shiva Temple Incidents)

 

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