UP : संगमनगरी के इस मठ में 170 साल से जल रही अखंड ज्योति, आज भी जगाए हुए है आजादी की अलख

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द लीडर। उत्तर प्रदेश के जिला प्रयागराज से एक खास तस्वीर सामने आई है। संगम क्षेत्र स्थित एक मठ में करीब 170 सालों से एक अखंड ज्योति लगातार जल रही है। देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता की पहली लड़ाई भले ही सन 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम से शुरू हुई लेकिन इसका चिराग बहुत पहले जल चुका था जो आज भी बिना बुझे संगम नगरी प्रयागराज के एक आश्रम में धर्म की ज्योति के समानांतर आजादी की अलख आज भी जगाए हुए हैं।


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स्वतंत्रता की पहली चेतना और संग्राम की यह वह प्राचीन निशानी है जो दिल्ली के इंडिया गेट पर स्थिति अमर ज्योति से भी पुरानी है। जहां बिना किसी गतिरोध के आज भी राष्ट्रीय चेतना के सुर ईश्वर की भक्ति के समानांतर गाये जाते है। जहां आज भी धर्म ध्वजा के साथ हर स्वतंत्रता दिवस पार शान से तिरंगा फहराया जाता है।

रामानंद चार्य पीठ में जलती है अखंड ज्योति

प्रयागराज के संगम तट के पास स्थित त्रिवेणी बांध पर रामानंद चार्य की इस पीठ में रहने वाले साधू संतों और रामानंद चार्य के अनुयायियो को जितनी चिंता मंदिर में स्थित रामानंद की मूर्ति के पूजा अर्चना और रखरखाव की रहती है। उतनी ही चिंता इस मंदिर के अंदर सैकड़ों बरसों से निरंतर जल रही इस अखंड ज्योति की रहती है। जो देश की आजादी के संघर्ष की गवाह रही है।

इसे सबसे पुरानी लौ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। प्रयागराज के संगम तट के पास स्थित रामानंद चार्य पीठ में आजादी की गवाह रही  यह अखंड संघर्ष ज्योति सन 1853 से लगातार जल रही है।

आश्रम में मौजूद संतों और साधकों के मुताबिक, रामानंद चार्य सम्प्रदाय की परम्परा के संत सियाराम शरण एक सेनानी थे जो बाद में साधू हो गए। उन्होंने ही इस अखंड संघर्ष ज्योति को 1853 में जलाया। जिसका मकसद देश में स्वतंत्रता की चेतना को जन -जन तक पहुंचना था।

सन 1853 से जलती आ रही अखंड ज्योति

सियाराम शरण दास के बाद इस परम्परा को महंत बालक दास ने आगे बढ़ाया। जिसके बाद आज तक बिना बुझे यह ज्योति जल रही है। समय-समय पर भले ही मठ का विकास हुआ हो लेकिन सालों से जली आ रही अखंड ज्योति को कभी भी बुझने नहीं दिया गया।

आजादी मिलने के बाद देश प्रदेश में सुख शांति बनी रहे इसके लिए अखंड ज्योति को जला कर रखा जा रहा है। जिन श्रद्धालुओं को भी अखंड ज्योति के बारे में पता चलता है वह एक बार इसका दीदार करने जरूर आता है।

इस अखंड ज्योति के अलावा इस आश्रम में यह भी परंपरा है कि, यहां ईश्वर की आराधना के साथ आजादी की कथा का भी वाचन होता है। समय बदला दौर बदला तो इनका मकसद भी बदल गया। आजादी के बाद यहां राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सद्भाव के प्रसंग पढ़े और सुने जाने लगे है। आज भी यह धर्म ध्वजा के साथ ही देश की आज़ादी का शान तिरंगा भी पूरी शान से लहराता है।


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