आफत तो आना ही है, जब तपस्वियों की गुफाएं बना दीं अमीरों की मौजमस्ती का अड्डा

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चंद्रशेखर जोशी

अब तक की पड़ताल में पता चला है कि ऋषिगंगा नदी में आई आपदा के पीछे चारधाम जैसे प्रोजेक्ट जिम्मेदार हैं। इस प्रोजेक्ट में उत्तराखंड के केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को जोडऩे वाली सडक़ को चौड़ा किया जाना है। इस खतरनाक योजना की शुरुआत 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी।

प्रधानमंत्री ने इस योजना से पहले केदारनाथ की एक गुफा के भीतर ध्यान करने का पाखंड रचा था। जिस गुफा में सदियों से मोह-माया त्यागे संन्यासी जीवन बिताते थे, वहीं कुर्सी के मोह में लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में तस्वीरें खिंचाई गई थीं। इन गुफा-कंदराओं को फोटो स्टूडियो बना दिया गया था।


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तपस्वियों की यह गुफा तब से धनपतियों की मौज का आलीशान अड्डा बन गई है। इसमें बिजली है, गर्म पानी के लिए गीजर है, एक अटैच बाथरूम भी बन गया है। दो-तीन महीने पहले ही इसकी बुकिंग होने लगती है। मंदिर तक पहुंचने के लिए सीधे हेलिकॉप्टर तैनात हैं। केदारनाथ जैसे इलाकों में इस तरह के निर्माण हैवानी सोच है।

चारधाम परियोजना में सरकार ने सारे नियम-कायदे खत्म कर दिए हैं। एन्वॉयरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट से बचने के लिए एक परियोजना को कई छोटी-छोटी परियोजनाओं में दिखाया गया है। इस एक ही परियोजना को 53 टुकड़ों में बांटा गया है। यह परियोजना 889 किलोमीटर की है। ये सडक़ें भारी मशीनों से बनाई जा रही हैं, और पहाड़ काटकर मलबा आबादी की तबाही के लिए फैलाया जा रहा है।

2018 में सडक़ एवं परिवहन मंत्रालय ने ही सर्कुलर जारी किया था कि पहाड़ों में सडक़ों के डामर वाला हिस्सा (ब्लैक-टॉप) 5.5 मीटर से ज्यादा चौड़ा नहीं होना चाहिए, लेकिन चारधाम परियोजना में सडक़ के ब्लैक-टॉप की चौड़ाई दस मीटर तक कर दी गई। इतनी चौड़ी सडक़ बनाने के लिए दुनिया की सबसे ऊंची और सबसे नई पर्वत शृंखला में पहाड़ों और पेड़ों को बड़ी मात्रा में काटा जा रहा है।


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इसके लिए अब तक 56 हजार से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं और 36 हजार के करीब पेड़ मार्क किए गए हैं, जिन्हें जल्द काटा जाना है। जानकारों का कहना है कि काटे गए पेड़ों की संख्या इससे काफी ज्यादा है क्योंकि इसमें वे पेड़ शामिल नहीं हैं, जो पहाड़ काटने के दौरान उसके साथ गिर गए या इस परियोजना के कारण भूस्खलन की चपेट में आ गए।

बेतरतीब कटान के बाद लैंडस्लाइड कई लोगों की जान भी ले चुका है। इसमें तीन लोग एक ही परिवार के थे, जिनका घर ऋषिकेश के पास हुए लैंडस्लाइड के मलबे में दब गया था। इसी प्रोजेक्ट के कारण रुद्रप्रयाग के चंडीधार में भी आठ लोग एक साथ मलबे में दफन हो गए थे। इनमें उमा देवी भी शामिल थीं जो इस परियोजना के खिलाफ खुद एक याचिकाकर्ता थीं। अब बारिश आते ही भारी मलबा और पत्थर भीषण तबाही मचाते रहेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह उनके निजी विचार हैं)

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