अगर केंद्र सरकार ग्लेशियरों पर शोध प्रोजेक्ट बंद न करती तो शायद टल जाती उत्तराखंड आपदा

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Uttarakhand Disaster Government Research Project
नेशनल ग्लेशियोलॉजी सेंटर परियोजना

देहरादून, मनमीत : हिमालयी राज्य उत्तराखंड (Uttarakhand ) में आने वाली तमाम ग्लेशियर आपदा की सूचना हमें पहले मिल सकती है. केवल सूचना भर नहीं, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग से कैसे हिमालय का बचाव किया जाये. इसके लिये दुनिया जहान से तमाम वैज्ञानिक एक साथ जुट सकते थे. अगर पिछले साल केंद्र सरकार उत्तरांखड में नेशनल ग्लेशियोलॉजी सेंटर परियोजना बंद न करती. या ये परियोजना पूरी हो गई होती तो आज समूचे हिमालयी क्षेत्र में आपदा से पहले बचाव की कवायदें की जा सकती थी. रैणी तपोवन आपदा के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शनिवार देर शाम को हुई नीति आयोग की बैठक में राज्य ग्लेशियोलॉजी सेंटर खोलने का आग्रह किया है. (Uttarakhand Disaster Government Research Project)

केंद्रीय विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय की ओर से जून के आखिरी सप्ताह में आये पत्र में इस परियोजना से हाथ खड़े कर दिए गए थे. सरकार ने 2009 में पानी के स्रोत का अध्ययन करने के लिए एक अत्याधुनिक परियोजना की शुरुआत की थी, जिस पर सिंधु, यमुना, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में 800 मिलियन से अधिक लोग निर्भर हैं. ”


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इस परियोजना को केंद्रीय वित्तीय मंत्रालय से लगभग 211 करोड़ रुपये का बजट जारी हो चुका था. नेशनल ग्लेशियोलॉजी सेंटर के लिए उत्तराखंड में मसूरी के नजदीक करीब 200 हेक्टेयर भूमि तय कर दी गयी थी. संस्थान के लिये वैज्ञानिक और अन्य स्टॉफ का ढांचा मंजूर होने के साथ ही डीपीआर फाइनल हो गई थी.

वर्ल्ड ग्लेशियर मॉनीटरिंग सर्विस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल बताते हैं कि ‘उत्तरी और दक्षिण ध्रुव के बाद हिमालय थर्ड पोल के तौर पर जाना जाता है. हिमालय से भारत की अर्थव्यवस्था जुड़ी है. अगर हिमालय वैसा नहीं रहेगा, जैसा आज है तो निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था के साथ ही जैव विविधिता पर गंभीर संकट आयेगा. जिससे भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया प्रभावित होगी.

2004 से पहले जब ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की बात प्रमाणित हुई थी तो, ये तय हुआ कि देश का अपना ग्लेशियोलॉजी सेंटर होना चाहिये. उसके बाद 2009 में ग्लेशियोलॉजिकल रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी प्रगति करने के लिए सरकार 10 वीं योजना के दौरान हिमालयन ग्लेशियोलॉजी में फील्ड ऑपरेशन और अनुसंधान के लिए एक राष्ट्रीय केंद्र स्थापित करने की योजना को स्वीकृति मिली. ग्लेशियोलॉजी सेंटर बनने के बाद, सभी ग्लेशियोलॉजिकल गतिविधियां, अनुसंधान और अनुप्रयोगों का एक केंद्र बन जाता, जो एक हिमस्खलन पर ग्लेशियोलॉजी शोध करती.’


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2010 के बाद से नेशनल ग्लेशियोलॉजी सेंटर की अवधारणा पर काम शुरू हुआ. पहले ये तय करने में ही काफी समय लगा कि सेंटर कहां स्थापित किया जाये, वेस्टर्न हिमालय या सेंट्रल में. वेस्टर्न हिमालय में जम्मू कश्मीर और हिमाचल आते हैं. वैज्ञानिकों के एक पक्ष ने तर्क दिया की ईस्टर्न हिमालय में ये राष्ट्रीय शोध केंद्र स्थापित होना चाहिये. लेकिन आखिर में कई दौर की बैठकों के बाद तय हुआ कि सेंट्रल हिमालय यानी उत्तराखंड में ही इस रिसर्च सेंटर को स्थापित किया जाये.

इसके पीछे ये मजबूत तर्क था कि उत्तराखंड की राजधानी में ही सर्वे ऑफ इंडिया का मुख्यालय है. और दूसरा वहां पर वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान भी मौजूद है. बाद में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान को ही इस परियोजना की नोडल एजेंसी बनाया गया. वाडिया संस्थान ही इस परियोजना के निर्माण पर मुख्य भूमिका भी निभा रहा था.

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के पूर्व महानिदेशक और इस परियोजना में शुरूआत से जुड़े प्रोफेसर बीआर अरोड़ा बताते हैं कि ग्लेशियोलॉजी सेंटर में होने वाले शोध से ये पता चलता कि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव को कैसे रोका जा सकता है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिम रेखा (स्नो लाइन) 50 मीटर तक पीछे खिसक गई है. जिसके नकारत्मक प्रभाव अब हिमालय के जलवायु और जैविक विविधता पर पड़ने लगे हैं.


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इस परियोजना में देश के बड़े ग्लेशियर वैज्ञानिक एक सेंटर पर आकर शोध करते. केंद्र को स्थापित करने के लिए देहरादून में स्थित वाडिया हिमालय भू वैज्ञानिक संस्थान को नोडल एजेंसी बनाया गया था. लगभग सभी तैयारियां होने के बाद अचानक 25 जुलाई को केंद्रीय विज्ञान एंव प्रोद्यौगिकी मंत्रालय की ओर से वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान को पत्र आया. जिसको पढ़ने के बाद इस परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों में निराशा छा गई.

पत्र में लिखा था कि सरकार ने इस परियोजना को बंद करने का निर्णय लिया है. इसके बाद जो शोध होंगे, वो छोटे स्तर पर वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान में होंगे. वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. कलाचंद साईं बताते हैं कि ये केद्र सरकार का निर्णय है. हम अपने स्तर पर वाडिया में शोध कार्य करते रहेंगे.

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