हिमालय की 10 हजार ग्लेशियर की झीलों में सुनामी आने का खतरा: रिसर्च

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मनमीत

समुद्र में सुनामी की भयावहता सुनी होगी, यह हिमालय की चोटियों पर भी आ सकती है, यह शायद नहीं सुना होगा। लेकिन यह खतरा वास्तविक है। जिस तरह के हालात हिमालय पर्वत पर पैदा हो चुके हैं, जो तथ्य सामने आए हैं, वो डराने वाले हैं।

उत्तराखंड के चमोली में आई आपदा के बीच एक शोध सामने आया है। इस शोध में दर्ज जानकारी और आने वाले खतरों को लेकर सरकार को भी चेताया जा चुका है। इस रोशनी में कोई कदम उठाया गया हो, लगता नहीं है।

शोध में बताया गया है कि हिमालय में अगर आठ रिक्टर या उससे ऊपर का भूकंप आया तो वहां मौजूद लगभग दस हजार ग्लेशियर झीलों में बड़ी सुनामी आ सकती है। इन झीलों का पानी पचास मीटर ऊपर उठ सकता है।


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वाडिया हिमालय भूगर्भीय संस्थान के भौतिकीविद विभाग के व वरिष्ठ भूकंप वैज्ञानिक डाॅ. सुशील कुमार शोध के बारे में बताते हैं, ”हिमालय में भविष्य में अगर कोई बड़ा भूकंप आया तो बड़ी सुनामी आ सकती है। हिमालय में इस समय लगभग दस हजार ग्लेशियर से बनी झीले हैं। अगर रिक्टर आठ का भूकंप आता है तो इन झीलों में पानी पचास मीटर तक ऊपर उठ सकता है। ये सभी झीले सिस्मिक जोन पर हैं यानी ये झीलें सबसे ज्यादा भूकंप आने वाली भूगर्भीय क्षेत्रों में मौजूद हैं।”

डॉ.सुशील ने बताया, ”भूकंप के केंद्र में एनर्जी बहुत ज्यादा होगी तो सब कुछ हवा में होगा क्योंकि चीजें स्थिर नहीं होंगी। स्वाभाविक रूप से ग्लेशियल झीलों में पानी सुनामी की तरह रिएक्ट करेगा। विश्व बैंक और ग्लोबल फैसिलिटी फॉर डिजास्टर रिडक्शन एंड रिकवरी के साथ मिलकर आईसीआईएमओडी ने भी इस खतरे की पुष्टि की है।”

”हालांकि, 1503 के बाद से उत्तराखंड में आठ रिक्टर का भूकंप नहीं आया है। जबकि 1803 और 1905 में बड़े भूकंप आ चुके हैं। नब्बे के दशक में उत्तरकाशी और चमोली में भूकंप आए, लेकिन वो बड़े भूकंप नहीं थे। जनसंख्या घनत्व ज्यादा होने के कारण जानमाल का नुकसान ज्यादा हुआ था”, उन्होंने बात को जोड़ा।


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दक्षिण की तरफ खिसक रहा हिमालय

वाडिया संस्थान ने इस शोध के लिए कुमाऊं- गढ़वाल और नेपाल हिमालय (तिब्बत से उत्तराखंड वाला भूभाग) में नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजीआरआइ) समेत अन्य संस्थानों के साथ जीपीएस स्टेशन स्थापित किए हैं।

अध्ययन से पता चला कि हिमालयी भूभाग प्रतिवर्ष 18 मिलीमीटर की दर से दक्षिण की तरफ खिसक रहा है, जबकि शेष हिमालयी क्षेत्र में यह दर 12 से 16 मिलीमीटर के बीच है। अधिक सक्रियता के चलते निरंतर भूकंपीय ऊर्जा उत्पन्न हो रही है। जो कभी भी बड़े भूकंप के रूप में सामने आ सकता है।


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छोटे छोटे भूकंप बड़े संकेत

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्था ने उत्तराखंड और हिमाचल में भूकंप के छोटे झटकों को ट्रेस करने वाले उपकरण सिस्मोग्राफ और एक्सलरोग्राफ लगाए हैं। इन उपकरणों से रीडिंग मिलने लगी है। इसी बुनियाद पर हिमालय क्षेत्र के लाखों लोगों को बचाने के लिए गहन शोध भी शुरू हो गया है।

हिमालय में लगातार आ रहे भूकंप पर शोध में ये भी सामने आया कि प्लेट्स के आपस में टकराने से जो घर्षण हो रहा है, उसका असर व्यापक हो रहा है। वैज्ञानिक भाषा में उसे हिमालय के नीचे उत्पन्न हुए मेन बाउंड्री थ्रस्ट के कारण 200 किलोमीटर दूर तक ट्रांसफर फॉल्ट विकसित हो रहा है।

इस टकराहट से जहां हिमालय की ऊंचाई हर साल 20 से 30 एमएम तक बढ़ती है, वहीं लगातार भूकंप भी आता है। वरिष्ठ भूकंप वैज्ञानिक डॉ. सुशील बताते हैं कि पूरी दुनिया में हिमालयन रेंज भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील मानी जाती है।

इंडियन और यूरेशिया प्लेट दोनों एक दूसरे से नीचे खिसक रही हैं। यही कारण है कि हर दिन कहीं न कहीं छोटे भूकंप आते रहते हैं। जब इन दोनों प्लेटों को टकराने के लिए ज्यादा गैप मिल जाता है तो टकराहट जोरदार होती है, जो बेहद तेज कंपन पैदा करती है। नेपाल का भूकंप इसी का नतीजा था।


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संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम में जताई जा चुकी है चिंता

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, पिछली शताब्दी के दौरान नेपाल, पाकिस्तान, भूटान और चीन में कम से कम 35 ग्लेशियल झील का प्रकोप हुआ है। लेकिन, ग्लेशियल झीलों के भूकंप के कारण टूटने से बढ़े हुए जोखिम पर शायद ही कभी चर्चा की गई है।

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