क्या मुस्लिम खिलाड़ी अच्छा खेलकर देश पर अहसान जताने के साथ पीड़ित होने की पैंतरेबाजी करते हैं

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Rahul Gandhi Cricketer Wasim Jaffer
क्रिकेटर वसीम जाफर, फोटो साभार सोशल मीडिया

वसीम ज़ाफ़र एक क्रिकेटर हैं. यह पहले बता देना जरूरी है क्योंकि वसीम ज़ाफ़र का क्रिकेट खेलना मुझे याद नहीं है और बहुतों को भी याद नहीं होगा. पर क्रिकेट में वसीम ज़ाफ़र के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी बैटिंग या बॉलिंग नहीं, उनकी दीन की इबादत है.

बहुत दिनों बाद उनका नाम सुनाई दिया तो इस संदर्भ में जब उन्होंने विक्टिमहुड का हवाला देते हुए उत्तराखंड की क्रिकेट टीम के कोच का पद छोड़ दिया.

माना जाता है कि जब उनके चुने हुए मुस्लिम कप्तान को हटा दिया गया तो वे नाराज होकर टीम छोड़ गए. कोच का क्रिकेट से ज्यादा ध्यान अपने धर्म पर था, वे मैदान पर मौलवी बुलाते थे, दूसरे खिलाड़ियों को दीन की दावत देते थे, और जब टीम के खिलाड़ी जोश भरने के लिए “राम भक्त हनुमान की जय” बोलते थे तो उन्हें सेक्युलरिज्म याद आ जाता था और उन्होंने इसे बदलवा दिया. पर जब बात सबके सामने आ गई तो वही पुराना पैंतरा – “विक्टिमहुड.”


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खेल के मैदान पर यह विक्टिमहुड पुराना पैंतरा है. हॉकी के एक मशहूर खिलाड़ी हुए, असलम शेर खान. 1975 में वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम में भी थे. उनकी आत्मकथा का नाम है – “टू हेल विथ हॉकी”…हॉकी जाए जहन्नुम में.

असलम शेर खान नेशनल टीम में रहे, वर्ल्ड कप जीता, ओलिंपिक खेला…फिर दो बार एमपी भी बने. देश ने उन्हें विश्व स्तर पर पहुंचाया, पार्लियामेंट में भेजा, पर वे विक्टिम ही बने रहे. अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि 1975 के वर्ल्डकप के सेमीफाइनल में उन्हें मलेशिया के खिलाफ नहीं उतारा जा रहा था क्योंकि भारत की टीम में मुस्लिम देश के खिलाफ मुसलमान खिलाड़ी नहीं खिलाए जाते थे.

उन्हें रिज़र्व प्लेयर बना कर रखा गया और सब्स्टीच्यूट की तरह उतारा गया और तब उन्होंने गोल करके स्कोर बराबर कर दिया. अगर एक मुस्लिम खिलाड़ी टीम में नहीं चुना गया तो विक्टिम…और उसने गोल कर दिया तो यह देश पर एहसान हो गया. और फिर फाइनल पाकिस्तान से था और उसमें वे प्लेइंग इलेवन में थे..उसका क्या? कुछ नहीं… भाड़ में जाए हॉकी…वे विक्टिम हैं.


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कुछ ही साल बाद उसी भारतीय हॉकी टीम के कप्तान ज़फर इकबाल हुए, मोहम्मद शाहिद हुए…पर असलम शेर खान विक्टिम थे.

जब 1982 में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 7-1 से एशियाई खेलों का फाइनल मैच हारा था तो टीम के कप्तान ज़फर इकबाल थे. उन्हें तो किसी ने बुरा भला नहीं कहा. बदनामी हुई, कॅरियर खराब हुआ तो गोलकीपर मिहिर रंजन नेगी का.

लेकिन जब “चक दे इंडिया” फ़िल्म में शाहरुख ने एक हॉकी खिलाड़ी का रोल किया तो शाहरुख का चरित्र लिखा गया था गोलकीपर नेगी को ध्यान में रख कर…पर उसका नाम जबरदस्ती रख दिया गया कबीर खान…और उसे विक्टिम बना दिया गया कि जब पाकिस्तान से टीम हारी तो उसे गद्दार कहा गया.

एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे स्टार धनराज पिल्लई और मुकेश कुमार को बिना वजह टीम से हटा दिया गया तो वे विक्टिम नहीं हुए, पर एक मुस्लिम हमारे देश में जेनेरिक विक्टिम है…वह नेशनल टीम का कप्तान बनकर भी विक्टिम ही रहता है. वह पार्लियामेंट में चला जाता है फिर भी वो विक्टिम ही रहता है.

वह जब अच्छा खेलता है तो वह देश पर एहसान करता है, और जब टीम से निकाल दिया जाता है तो फिर से विक्टिम हो जाता है. वह मैच फिक्सिंग करता है, जानबूझकर शारजाह में भारत को हर मैच हरवाता है फिर भी कप्तान बना रहता है, पर जब पकड़ा जाता है तो फिर से विक्टिम बन जाता है.

(नोट: सोशल मीडिया पर यह लेख कई नामों से वायरल है, सौंधी खुशबू नाम के फेसबुक पेज पर यह राजेश मिश्रा के नाम से प्रकाशित है, लेखक के यह निजी विचार हैं, इस लेख से सहमति या असहमति पर आधारित लेख आमंत्रित हैं।)

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