आज़ादी की लड़ाई में वहाबी मूवमेंट को ठंडा करने के लिए अंग्रेज़ों ने बनाया था देशद्रोह क़ानून

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Sedition Section 124A
Supreme court of India. File Photo

द लीडर : क्या देशद्रोह क़ानून अभिव्यक्ति की आज़ादी को कंट्रोल करता है. स्वतंत्रा की जिस मशाल को ठंडा करने के लिए अंग्रेज़ों ने देशद्रोह क़ानून बनाया था. आज़ादी के 75वें महोत्सव में भी क्या इसकी ज़रूरत नज़र आती है. पिछले एक दशक में सरकारों ने देशद्रोह क़ानून का इस्तेमाल किस तरह से किया है. ऐसे बहुत से सवाल, जो आम लोगों के मन में हैं. आज हम उन्हीं पर बात करेंगे. (Sedition Section 124A)

इसलिए क्योंकि सरकार देशद्रोह क़ानून की समीक्षा कर रही है. और तब तक के लिए सुप्रीमकोर्ट ने इस क़ानून पर रोक लगा दी है. भारत के चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्सीय खंडपीठ ने कहा कि, समीक्षा तक देशद्रोह का कोई नया केस दर्ज़ नहीं किया जाएगा. इस संबंध में केंद्र सरकार राज्यों को निर्देश दे सकती है. अगर कोई केस दर्ज होता है तो आरोपी ज़मानत के लिए कोर्ट जा सकते हैं.

पहले ये जान लेते हैं कि देशद्रोह क़ानून है क्या? 1860 में इंडियन पैनल कोड लागू हुआ. और 10 साल बाद 1870 में अंग्रेज़ हुकूमत ने इसमें देशद्रोह की धारा-124-ए जोड़ दी. उस वक़्त स्वतंत्रता की लड़ाई चरम पर थी. मुस्लिम मौलवी भारत की आज़ादी के लिए समाज को एकजुट करने में लगे थे. इस मूवमेंट को वहाबी फिरका लीड कर रहा था. अंग्रेज़ों ने वहाबियों के भय से देशद्रोह का क़ानून बनाया, ताकि देशविरोधी साजिश के आरोप में उनके इरादे को तोड़ा जा सके. यानी सरकार के ख़िलाफ बोलकर, लिखकर, चित्र-कार्टून, इशारे, उत्तेजित भाषण या जिससे विद्रोह की आशंका थी-उसे कंट्रोल कर दिया गया.


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1897 में लोकमान्य तिलक के ख़िलाफ अंग्रेजों ने देशद्रोह का केस दर्ज़ किया. जिस पर हंगामा हो गया. लोकमान्य तिलक मशहूर स्वतंत्रता सेनानी थे. वह वह जाने माने वकील, पत्रकार रहे हैं. उस वक़्त केसरी और मराठा दो अख़बार निकालते थे. इस तरह अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज़ों को देशद्रोह क़ानून के पहरे में कैद रखा था. महात्मा गांधी ने अपने यंग इंडिया अख़बार में देशद्रोह के जरिये स्वतंत्रता सेनानियों के दमन पर चिंता व्यक्त करते हुए लेख भी लिखे हैं.

आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशद्रोह क़ानून को और सख़्त करते हुए 1973 में इसे संज्ञेय अपराध बना दिया. यानी आरोपी को बिना वारंट गिरफ़्तार किया जा सकता है. इसमें तीन साल से लेकर उम्रक़ैद तक की सज़ा का प्रावधान है. (Sedition Section 124A)

हालांकि आज़ादी के बाद से देशद्रोह के क़ानून को ख़त्म किए जाने की मांग उठती रही है. अब चूंकि सुप्रीमकोर्ट ने इस क़ानून का संज्ञान लिया है. जिसको लेकर केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा और इसकी समीक्षा-संशोधन की बात कही है. इसी मामले को सुनते हुए सुप्रीमकोर्ट ने देशद्रोह के तहत कोई नया मुक़दमा दर्ज़ करने पर रोक लगा दी है.

सरकार की ओर से देशद्रोह क़ानून ख़त्म करने को लेकर सुप्रीमकोर्ट में केदारनाथ बनाम स्टेट ऑफ बिहार का हवाला दिया गया. जिसमें पांच जजों की बेंच ने कहा था कि फ़ैसले पर पुनर्विचार की ज़रूरत नहीं है. दरअसल, 1962 में केदारनाथ बनाम स्टेट ऑफ बिहार केस में सुप्रीमकोर्ट के पांच जजों की बेंच ने अपने फ़ैसले में कहा था कि देशद्रोह क़ानून के दुरुपयोग के बावजूद इसकी उपयोगिता ज़रूरी है.


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एक दिन पहले ही क़ानून मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि देशद्रोह क़ानून को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से विचार करने को कहा है. प्रधानमंत्री ने अप्रचलित क़ानून को हटाने का आग्रह भी किया. बहरहाल, अब इसकी समीक्षा होगी और फिर सुप्रीमकोर्ट का फ़ैसला आएगा. (Sedition Section 124A)

10 साल में देशद्रोह के 405 मुक़दमें

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो-एनसीबी का डाटा है कि पिछले एक दशक में देशद्रोह के 405 मामले दर्ज किए गए हैं. इसमें 2014 से 2019 यानी 6 साल के दरम्यान 326 मुक़दमे लिखे गए. जिनमें 559 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. लेकिन केवल 6 लोगों पर ही दोष साबित हुआ है.

देशद्रोह के 141 मामलों में ही पुलिस चार्जशीट दाखिल करने में सफल हुई. यानी आधी से भी ज़्यादा मामलों में आज तक चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी. दोष सिद्धि के रेशियो को देखते हुए ही इस क़ानून की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठा है. दूसरा-जिस तरह से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री या दूसरे नेताओं की आलोचना पर देशद्रोह लगाने का चलना बढ़ा है-वो भी चिंता का विषय बना है. इस क़ानून के ज़रिये हाल में कई जाने माने पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्रनेताओं को निशाना बनाया गया है. (Sedition Section 124A)

देशद्रोह जितना घातक यूएपीए

देशद्रोह की तरह ही कुछ और सख़्त क़ानून हैं. जिसमें गैरक़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम-यूएपीए है. 2015 से 2019 तक यानी पांच सालों में यूएपीए के 5128 केस दर्ज किए गए. सबसे ज़्यादा मामले मणिपुर में दर्ज हैं. यहां 1786 लोगों पर यूएपीए लगाया गया.

इसी तरह नेशनल सिक्योरिटी एक्ट-एनएसए है. यूपी में साल 2017 से 2021 तक एनएसए के तहत करीब 523 केस दर्ज किए गए हैं. इसमें अधिकांश गौकशी से जुड़े मामलों में एनएसए लगाया गया है. इन तीनों क़ानूनों को लेकर गाहे-बगाहे विरोध के स्वर सुनाई देते रहते हैं. (Sedition Section 124A)


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