प्राइवेट अस्पतालों को कंपनी की तरह चलाया जा रहा, इसकी जांच की ज़रूरत-चीफ जस्टिस

द लीडर : भारत के चीफ़ जस्टिस एनवी रमना ने अपने रिटायरमेंट से चंद घंटों पहले निजी स्वास्थ्य सेवाओं (प्राइवेट अस्पतालों) पर गंभीर प्रश्न और चिंता व्यक्त की है. इस आशय के साथ कि ये अस्पताल इंसानों की सेवा के बजाय मुनाफ़ा कमाने में लगे हैं. अस्पतालों को कंपनीज़ की तरह चलाया जा रहा है. सीजेआई ने मेडिकल सेवाओं के बाज़ारीकरण पर जांच की ज़रूरत भी जताई है. (Chief Justice NV Ramana)

चीफ़ जस्टिस एनवी रमना नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज में लॉ एंड मेडिसन विषय पर बोल रहे थे. जहां उन्होंने धोखाधड़ी वाली स्वास्थ्य सेवाओं के मामलों को सुलझाने के लिए क़ानून बनाने के महत्व पर प्रकाश डाला.

कहा कि अदालतों ने देश की स्वास्थ्य निगरानी पॉलिसीज को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है. निदेशक सिद्धांतों ने सेहत, पोषण पर ज़ोर दिया है. इसके अलावा संविधान की 11वीं और 12वीं अनुसूची में स्थानीय निकायों पर स्वच्छ पेयजल, साफ़-सफ़ाई और ज़रूरी स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने का दायित्व देता है. (Chief Justice NV Ramana)


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सीजेआई ने कहा कि वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति से पहले नीमहकीम के उदय के संदर्भ पर भी बात रखी. बोले-नीमहकीमी वहीं से प्रारंभ होती है, जहां से जागरुकता ख़त्म होती है. वहां मिथकों और नीमहकीमों का स्थान होता है. ये देश को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी है. पैसे और वक़्त की कमी की वजह से देश की बड़ी आबादी इन अप्रशिक्षित और अप्रमाणित लोगों के पास इलाज़ कराने जाते हैं. ग्रामीण और वंचित लोगों पर इसका गंभीर असर पड़ रहा है. इसलिए इलाज़ के नाम पर धोखाधड़ी का शिकार होने वालों के लिए क़ानून लाया जाना समय की ज़रूरत है.

सीजीेआई ने क़ानून और मेडिकल प्रैक्टिस करने वालों के बीच की समानताओं पर भी रौशनी डाली. उन्होंने कहा कि एक अच्छे वकील को एक अच्छे डॉक्टर की तरह ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान हासिल करना करना चाहिए. चिकित्सा और क़ानून दोनों दुनिया के सबसे प्राचीन पेशे हैं और इनमें विकास की असीमित संभावनाएं हैं. दोनों पेशे इंसान की बुनियादी आवश्यकताओं से पैदा होते हैं. वकील और डॉक्टरों के प्रति लोगों में भरोसा होता है कि वह उनके हक़ में काम करेंगे. (Chief Justice NV Ramana)

स्वास्थ्य सेवाओं के व्यवसायीकरण का ज़िक्र करते हुए सीजेआई ने इसकी जांच की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. उन्होंने कहा कि आज बड़ी तेजी के साथ निजी अस्पताल खोले जा रहे हैं. ये कोई ख़राब बात नहीं है, लेकिन एक संतुलन की ज़रूरत है. समस्या ये है कि हम अस्पतालों को प्राइवेट कंपनी की तरह चला रहे हैं, जिसमें मुनाफ़ा कमाना सेवा से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है. ये काफ़ी गंभीर है कि डॉक्टर मरीज़ों के प्रति असंवेदनशल होते जा रहे हैं. वो उनके लिए सिर्फ़ संख्याबल हैं. ये स्थिति ने स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता को बढ़ावा दिया है.


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