दहेज और औरतों पर जुल्म के खिलाफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का अभियान

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Muslim Personal Law Board Campaign Against Atrocities Dowry Women
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक का फाइल फोटो, साभार ट्वीटर.

द लीडर : दहेज और महंगी शादियों के चलन के खिलाफ मुस्लिम समाज में शायद पहली बार ऐसी बेचैनी का आलम नजर आ रहा है. सुन्नी-बरेलवी और देवबंद से दहेज पर रोक की पहल के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी अब सामने आया है. बोर्ड ने शादियों को आसान बनाने और दहेज के रिवाज को रोकने के लिए एक अभियान शुरू किया है. (Muslim Personal Law Board Campaign Against Atrocities Dowry Women)

महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में उलमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक के बाद से इस अभियान पर काम शुरू हो चुका है. जल्द ही ये दूसरे राज्यों तक भी पहुंचेगा. इसकी जिम्मेदारी बोर्ड के सचिव मौलाना उमरैन को सौंपी गई है.

बोर्ड के अध्यक्ष मुहम्मद राबे हसनी नदवी के हवाले से कहा गया है कि मुसलमानों को बड़े-बड़े होटलों, वेडिंग हॉल में शादी समारोह नहीं करने चाहिए. दहेज के लेनदेन, बारात और अन्य आयोजनों से भी बचें. दूसरे लोगों को भी समझाएं. बीवियों के साथ अच्छा व्यवहार करें. और इस्लामिक शिक्षाओं को अपनाकर जिंदगी में कामयाबी और तरक्की हासिल करें.

बोर्ड ने कहा कि शादी को सरल बनाने, रीति-रिवाज और अन्य प्रथाओं को रोकने के लिए अभियान जरूरी है. खासतौर से दहेज के लेनदेन और बेटियों पर होने वाले जुल्म पर अंकुश लगाने के लिए.


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इस अभियान के तहत तय किया गया है कि जिस शादी में दहेज के लिए जबरन लेनदेन होता है. उसमें उलमा-काजी शामिल न हों. ख्याल रखें कि यह कदम बेटियों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है.

मुस्लिम समाज में ये बेचैनी आयशा की मौत से पैदा हुई है. अहमदाबाद में 23 साल की आयशा ने, पिछले दिनों साबरमती नदी में कूदकर जान दे दी थी. इससे पहले उन्होंने एक लाइव वीडियो जारी किया था, जिसने हर इंसान को झकझोर दिया था और दहेज पर एक बहस छेड़ दी थी.

इसी क्रम में सुन्नी-बरेलवी मसलक के केंद्र दरगाह आला हजरत से ये ऐलान हुआ कि शादियों में दहेज लेनदेन, बैंडबाजा और बेहिसाब खर्च न करें. जिन शादियों में ये सब हो, तो काजी निकाह न पढ़ाएं. दरगाह के सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन मियां की ओर से एक टीम भी गठित की गई है, जो इन बुराईयों से बचने के लिए समाज को जागरुक करने का काम करेगी.


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एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर इसरार खान कहते हैं कि दहेज एक गंभीर बुराई के रूप में समाज में दाखिल हो चुकी है. इसे रोकने के लिए हम बेटा-बेटियों को काबिल बनाना होगा. दूसरा, माता-पिता की ये जिम्मेदारी है कि वे बेटियों को उनके आर्थिक हक हर हाल में दिलाएं. मसलन, बेटी को पिता की संपत्ति में हक और दूसरा, शादी के समय उनका मेहर ज्यादा रखें. ऐसा करके हम लड़कियों को आर्थिक तौर पर सक्षम बना सकेंगे.

इस्लामिक इंटेलेक्चुअल बोर्ड के अध्यक्ष और ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य डॉ. यासीन अली उस्मानी ‘द लीडर‘ से बातचीत में कहते हैं कि एक गंभीर बुराई के तौर पर दहेज की जड़ें हमारे समाज में जम चुकी हैं, जो लड़कियों का भविष्य बर्बाद कर रही है. तंग आकर वे खुदकुशी तक कर रहीं. कौम और मजहबी रहनुमाओं को एक मजबूत रणनीति के तहत इसकी जड़ें समाज से मिटानी होंगी.

डॉ. उस्मानी कहते हैं कि मैं समझता हूं कि ये कोई मुश्किल काम नहीं है. इसलिए क्योंकि हमारे पास मस्जिद, खानकाह, दरगाह और उलमा का एक शानदार नेटवर्क है, जिसके जरिये हम इसे आसानी से खत्म कर सकते हैं. बस जरूरत इस बात की है कि एकजुट होकर, मजबूत इरादे के साथ काम करना होगा. लोगों के बीच जाकर ये कहना होगा कि दहेज के खिलाफ एक अभियान शुरू करें.

गरीब बच्चियों की सुरक्षा की खातिर इस अभियान की जरूरत हो गई है. खासतौर से महिलाओं के बीच, उन्हें भी इससे जोड़ना होगा. इस बात के लिए जागरुक करना होगा कि गैर-इस्लामी रस्मों को बढ़ावा देने से बचें. इस सूरत में हम समाज को दहेज की बीमारी से मुक्त करा सकते हैं. अच्‍छी बात ये है क‍ि अब समाज इस मुद़दे पर बेदार हो रहा हे और यकीनन अच्‍छा पर‍िणाम सामने आएगा.

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