Moradabad Muslim Massacre 1980 : पीएसी ने ईदगाह में नमाज़ियों पर झोंक दिए थे फायर

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मुरादाबाद ईदगाह-फाइल फोटो साभार विकीपीडिया

द लीडर : ईद-उल-फित्र का दिन. मुरादाबाद की ईदगाह नमाजियों से खचाखच भरी थी. अहाते में कोई 40,000 हजार नमाजी होंगे. नमाज के वक्त एक पशु सामने आने से पैदा हुए विवाद को लेकर पुलिस और प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC) ने नमाजियों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी. जिसमें करीब 300 नमाजी मारे गए. मौतों का वास्तविक आंकड़ा कहीं अधिक बताया जा रहा है. जिस तारीख की ये घटना है. वो आज है-13 अगस्त. 41 साल पहले, 1980 की. तब बिहार के गया से सांसद सैयद शहाबुद्​दीन ने इसे आजाद भारत का जलियांवाला बाग हत्याकांड कहा था. (Moradabad Muslim Massacre 1980 )

जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को हुआ. क्रांतिकारी रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग में सभा कर रहे थे. जनरल डायर ने इन पर गोलियां चलवा दीं. जिसमें करीब 400 क्रांतिकारी शहीद हो गए. वो वैसाखी का दिन था. वैसाखी तीज है, जिसे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. ठीक वैसे, जैसे ईद.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के रिसर्च स्कॉलर शरजील इमाम और साकिब सलीम ने इस नसंहार को लेकर 2017 में एक लेख लिखा था. जिसमें जलियांवाला बाग और मुरादाबाद नरसंहार में समानताएं बताईं.

जैसे दोनों ही मामलों में पीड़ितों पर गोली चलाई गई. उन्हें बंद स्थानों तक सीमित रखा गया. उनके भागने के रास्ते बंद कर दिए गए थे. (Moradabad Muslim Massacre 1980 )


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भाजपा नेता और पूर्व विदेश मंत्री एमजे अकबर, तब एक तेज-तर्रार युवा पत्रकार हुआ करते थे. उन्होंने मुरादाबाद जनसंहार को लेकर ”दंगों के बाद दंगा” किताब लिखी है.

अकबर ने लिखा है :-”पीएसी ने ईद की नमाज के वक्त करीब 40,000 मुसलमानों पर गोलियां चला दीं. कोई नहीं जानता कि हकीकत में कितने लोग मारे गए हैं. जो मालूम है वो ये कि मुरादाबाद की घटना हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं थी.

”बल्कि एक कट्टर सांप्रदायिक पुलिस बल के हाथों मुसलमानों की सोची-समझी हत्या थी. जिसने इसे हिंदू-मुस्लिम दंगा बनाकर अपने नसंहार को ढकने की कोशिश की.” (Moradabad Muslim Massacre 1980 )

एमजे अकबर ने किताब में कहा- ”ईदगाह पर गोलीबारी के बाद पुलिस पर हमला नहीं किया गया था. ईदगाह से कोई पांच किलोमीटर दूरी पर एक चौकी है, मुसलमानों ने उस पर हमला कर दिया. जवाबी कार्रवाई में पांच लोग मारे गए. लेकिन रास्ते में भीड़ ने किसी हिंदू के मकान या दुकान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया. यानी उसे छोड़ दिया.”

नरसंहार के संदर्भ में अकबर और शहाबुद्​दीन के तर्क

-मुरादाबाद नसंहार को लेकर एमजे अकबर और सांसद शहाबुद्​दीन ने जो तर्क रखे हैं. उनमें स्थापित खामियों की तरफ इशारा किया. शहाबुद्​दीन ने कहा कि मुसलमानों के हथियारबंद होने का दावा पूरी तरह मनगढ़ंत है. ऐसे समझिए.

-ईदगाह में हथियार आते नहीं दिखे या देखे गए.

-कोई खर्च किए गए कारतूस नहीं बरामद हुए.

-किसी भी पुलिसकर्मी को गोली या चोटें नहीं आईं.

-ईदगाह के सामने किसी भी इमारत पर गोलियों के निशान नहीं हैं.

-अगर उकसाने वाले हथियारबंद थे, तो उन्हें ईंट-पिटाई क्यों करनी चाहिए थी?

शोधार्थी साकिब और शरजील अपने लेख में कहते हैं कि, ”मुरादाबाद नसंहार पुलिस की बर्बरता का मामला था. कानून-व्यवस्था की ताकतों ने उन हजारों मुसलमानों पर अपना गुस्सा जाहिर किया जो खुशी के दिन नमाज अदा करने आए थे. गोलीबारी से भगदड़ में तमाम बच्चे मारे गए. सैकड़ों गंभीर रूप से घायल हुए. उनके लिए मौत धीरे-धीरे आई.” (Moradabad Muslim Massacre 1980 )


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वह लिखते हैं कि, मुरादाबाद के हिंदू और मुसलमान दोनों ही किसी को भी बताएंगे कि 13 अगस्त 1980 को उनके शहर में जो हुआ वह सांप्रदायिक दंगा नहीं था. असल में ये पुलिस और मुसलमानों के बीच संघर्ष था.

लेकिन पुलिस ने अपनी क्रूरता पर चादर डालने के लिए. हकीकत में क्या हुआ? इसके लिए झूठ बोला. नमाज की घटनाओं से ध्यान हटाने के लिए झूठे रास्ते अख्तियार किए. 13 अगस्त को मुरादाबाद सांप्रदायिक नहीं था, लेकिन पुलिस ने बाद में इसे सांप्रदायिक बना दिया होगा.

लेख में उस वक्त की मीडिया खबरों का भी विश्लेषण शामिल है, जिन्हें लेखकों ने फेक खबरें बताया है. यानी उस नरसंहार को दंगे के तौर पर पेश किया गया. (Moradabad Muslim Massacre 1980 )

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