#BengalElection : आखिर बंगाल में क्यों बजता है दीदी का डंका

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लखनऊ। पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2011 से ही ममता बनर्जी का डंका बजता रहा है। इस बार चुनाव में भी उन्होंने यही बताने की कोशिश की है कि उन्हें बंगाल की जनता पर पूरा भरोसा है। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी परम्परागत सीट भवानीपुर छोड़कर नंदीग्राम से चुनावी दम दिखाने का फैसला किया।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की लोकप्रियता इसी बात से समझी जा सकती है कि उन्हें “दीदी” कहकर पुकारा जाता है। बंगाल में ममता बनर्जी के कद में जबरदस्त इजाफा हुआ है।

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ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1970 में हुई थी, तब उन्होंने कांग्रेस का दामन बतौर कार्यकर्ता थामा था। ममता बनर्जी 1976 से 1980 तक महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। इसके बाद उन्होंने 1984 में देश की सबसे युवा सांसद बनने का खिताब हासिल किया।

ममता

उस वक्त ममता बनर्जी ने CPM के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट पर मात दी थी। यही से उनको एक बड़ी पहचान मिली। 1991 में जब नरसिम्हा राव की सरकार बनी तो उन्हे कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई, कुछ दिनों बाद विवाद बढ़ा और दीदी को 1993 में दरकिनार कर दिया गया।

असली खेल तो उस वक्त हुआ जब ममता बनर्जी ने अपनी ही पार्टी कांग्रेस के खिलाफ बागी तेवर अख्तियार कर लिए। दीदी ने 1997 में कांग्रेस को ये कहकर अलविदा कर दिया कि कांग्रेस बंगाल में CPM की कठपुतली बन गई है।

1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AIMC) नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली और इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 8 सीटों पर जीत हासिल की।

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2006 दिसंबर में नंदीग्राम आंदोलन के दौरान ममता बनर्जी ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। मार्च 2007 को 14 ग्रामीणों पर गोलियां बरसा दी गईं और कई सारे लोग गायब हो गए। लेकिन फिर भी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस इस आंदोलन में डटी रही। दीदी को राजनीतिक तौर पर इस आंदोलन का सबसे बड़ा फायदा मिला।

2009 के लोकसभा चुनाव में ममता की पार्टी ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2010 में हुए कोलकाता नगरपालिका चुनाव में भी ममता बनर्जी का जलवा दिखाई दिया। TMC ने 141 सीटों में से 97 सीटों पर कब्जा जमा लिया।

2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नाम की वो आंधी चली कि जो सामने आया उड़ता चला गया। उस वक्त जातीय गणित, धार्मिक फैक्टर सबकुछ दीदी के फेवर में था। इस चुनाव में उन्होंने 294 में से 184 सीटों पर जीत हासिल की।

ममता बनर्जी ने 2011 में मां माटी मानुष का नारा दिया और इसका असर उनकी योजनाओं में दिखने लगा।

परिवर्तन का नारा देकर बंगाल की सियासत में अपनी अलग पहचान बनाने वाली ममता बनर्जी ने बंगाल से वामदलों का सफाया किया। वो बंगाल में इतनी लोकप्रिय हो गईं कि लोगों के दिलों पर राज करने लगीं। यूं कहें कि ममता बनर्जी को बंगाल के लोगों ने रोल मॉडल बना लिया।

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