‘किसानों के पास छह माह का राशन है, हमारे पर सालभर की दवाएं’

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कहते हैं डाक्टर को अपने जज्बातों को काबू में रखना चाहिए लेकिन तमाम डॉक्टर ऐसे हैं जो घरबार छोड़कर किसानों के दर्द में शामिल हैं। वे किसानों की जिस्मानी तकलीफ का इलाज तो कर ही रहे हैं, अपने दिल से उठी हूक की भी दवा वहां तलाश रहे हैं।

देश की राजधानी की सीमाओं पर सर्द मौसम में 24 घंटे मुफ्त सेवाएं देने वाले ये डॉक्टर भावुक होकर कहते हैं, ‘कितना तकलीफदेह है, एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रता जब किसानों की आत्महत्या की खबर न आए या यह सुनने को न मिले कि फसल का सही दाम न मिलने पर किसान ने अपनी फसल सड़क पर गिरा दी या नदी में बहाने को मजबूूर हो गया।’

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दिल्ली बॉर्डर पर मौजूद डॉक्टर कहते हैं, ‘आजादी से अब तक हमारी सरकारें किसान विरोधी रहीं और हमारे नेताओं ने हमें किसानोे के प्रति निष्ठुर रहना सिखाया। आज किसान पिछले 70 साल का हिसाब लेने के लिए दिल्ली के बॉर्डर पर बैठा, जिसे पूरे समाज से सहयोग की उम्मीद है। इस उम्मीद को सरकार तोड़ने पर आमादा है।’

हम डॉक्टर्स भी इसी समाज का हिस्सा हैं और जब समाज में कुछ गलत हो रहा हो या किसी के साथ कोई अन्याय हो रहा हो तो हम मुंह नहीं फेर सकते।अपनी इसी जिम्मेदारी को समझते हुए हमारे संगठन प्रोग्रेसिव मेडिकोस और साइंटिस्ट फोरम ने सभी धरना स्थलों पर मुफ़्त स्वास्थ्य सेवाएं देने का फैसला लिया, डॉक्टरों ने कहा।

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वे बताते हैं, पिछले एक माह में हमारी टीम ने अभी तक सिंघु, टीकरी, गाज़ीपुर और शाहजहांपुर समेत सभी बॉर्डरों पर 30 से ज्यादा मुफ्त स्वास्थ्य शिविर लगाए हैं। पहला शिविर केवल दो डाक्टरों ने लगाया था। फिर अगला पांच, फिर दस और आज हमारी टीम में 109 सदस्य हैं।

हमारी टीम में सफदरजंग तथा दिल्ली के कई बड़े अस्पतालों के डॉक्टर हैं जो बेहद संवेदनशील और किसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझते हैं। हमारे एक कैंप में रोजाना तकरीबन 400-500 किसानों को इलाज या परामर्श दिया जा रहा है।

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आंदोलन स्थल की परेशानियों के बीच राेजमर्रा की जिंदगी कैसे गुजारते हैं, जबकि आपका व्यवसाय आरामदेह जीवन वाला होता है? इस सवाल पर डॉक्टरों ने हंसकर कहा, ‘हमारे सभी सदस्यों का जज़्बा बुलंद है। उनके सिर पर किसानों की सेवा का जुनून चढ़ा है। यहां भी कम सुविधाएं नहीं हैं, सरकार तो इतना भी नहीं करती आम लोगों के लिए।’

हम सबने ठाना है कि जब तक किसान विरोधी तीनों नए कानून वापस नहीं हो जाते, हम किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सरकार से टक्कर लेगें और रोज़ मुफ्त स्वास्थ्य शिविर लगाकर किसानों की सेवा करेंगे।

अगर किसान छह माह का राशन लेेकर आए हैं तो हमने भी एक साल की दवाइयां इकट्ठी कर ली हैं। इस सेवा से हम महसूस कर रहे हैं कि हम वास्तव में राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभा पा रहे हैं।

(इनपुट: किसान आंदोलन स्थल से प्रकाशित ‘ट्राॅली टाइम्स’ से साभार)

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