Wednesday, May 12, 2021
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‘इब अले ऊ’: लाखों साल में आज कौन ज्यादा विकसित हुआ – तुम या हम?

मनीष आज़ाद

हाल ही में लखनऊ जंक्शन पर बंदर भगाने वालों की खबर वायरल हुई। कई साल पहले भी एक खबर पढ़ी थी की दिल्ली सरकार लुटियन जोन में बंदर भगाने की नौकरी देती है. उस वक़्त इस नौकरी को पाने वाले का वेतन था 6000 रुपये.

उस वक़्त यह खबर महज एक चुटकुले की तरह जेहन में आई और चली गई. अभी कुछ दिन पहले एक फिल्म देखी- ‘इब अले ऊ’ तो इस काम के बारे में गहराई से पता चला। इस फिल्म के जरिए आप भी जानिए इस बारे में।

‘इब अले ऊ’ फिल्म ने यह साबित कर दिया कि एक सामान्य और छोटी सी खबर पर अपने विचार और कला से कितनी गहराई में जाया जा सकता है. 1 घंटे 37 मिनट की इस फिल्म से महसूस होता है कि आज हम एक ‘सभ्यतागत संकट’ [civilizational crisis] से गुजर रहे हैं.

फिल्म की कहानी बहुत सामान्य सी है. बिहार से एक अदद नौकरी की तलाश में आए बेरोजगार नौजवान अंजनी को लुटियन दिल्ली में बंदर भगाने का काम मिलता है. वह अपनी बड़ी दीदी और जीजा के साथ दिल्ली की एक झुग्गी में रहता है. दीदी घर से ही फ़ूड पैकेट सप्लाई का काम करती है. जीजा एक निजी कंपनी में सुरक्षा गार्ड है.

बगल में रहने वाली एक लड़की निजी अस्पताल में नर्स है और अंजनी को प्यार करती है. दूसरी तरफ लुटियन दिल्ली की भव्य व विशालकाय इमारतें हैं और उस पर निर्बाध घूमते बंदर हैं, जिन्हें वहां से भगाने की जिम्मेदारी अंजनी और महिंदर जैसे लोगों की है. अंजनी और महिंदर जैसे लोगों के उपर नज़र रखने के लिए पूरी एक श्रेणीबद्ध हायारकी [hierarchy] है.

इस फिल्म के निर्देशक प्रतीक वत्स खुद कहते हैं की दिल्ली की बात हो और हायारकी [hierarchy] की बात न हो, ये कैसे हो सकता है. फिल्म में यह ‘हायारकी’ [hierarchy] खुद एक विषय की तरह आया है, लेकिन मूल विषय से पूरी तरह गुंथा हुआ है. दिल्ली में हायारकी [hierarchy] के सबसे निचले पायदान पर खड़ा अंजनी भी जब अपनी प्रेमिका के साथ कंप्यूटर पर नौकरी तलाश रहा है तो वह भी एक मौके पर अपना गुस्सा अपनी प्रेमिका पर निकाल देता है और यह साबित कर देता है की हायारकी [hierarchy] में उसके नीचे भी कोई है.

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अंजनी इस अपमानजनक नौकरी को बार बार छोड़ने का एलान करता है, लेकिन दीदी और जीजा के दबाव के कारण वह ऐसा नहीं कर पता. उसके दीदी जीजा जानते हैं कि दिल्ली में बिना नौकरी के वह उनकी छोटी सी आय पर बोझ बन जाएगा.

बंदरों को भगाने का सबसे स्टैंडर्ड तरीका यह है कि लंगूर की आवाज निकाली जाय- ‘इब अले ऊ’ . लेकिन महिंदर के लाख सिखाने के बावजूद अंजनी ऐसी आवाज निकालने में पारंगत नहीं हो पाता. इसलिए उसे अपनी नौकरी बचाने के लिए कभी गुलेल का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी लंगूर का पोस्टर उन जगहों पर लगाना पड़ता है, जहां से बंदरों को भगाना होता है. लेकिन हर बार उसे पता चलता है कि उसका यह तरीका ‘गैरकानूनी’ है.

थकहार कर उसे अंत में खुद लंगूर बनना पड़ता है, ताकि उसे देखकर बंदर भागें. यहीं पर इस फिल्म के डायरेक्टर प्रतीक वत्स एक ऐसा रूपक रचते हैं जो फिल्म को एक नई ऊंचाई पर ले जाता है. ‘सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट’ के संघर्ष में मानव विकासक्रम की उल्टी यात्रा. नर से वानर बनने की प्रक्रिया. इस फिल्म को यदि डार्विन देखते तो पता नहीं वे हंसते या रोते.

अंजनी के लंगूर बनने का यह दृश्य बरबस बुद्धदेव दास गुप्ता की चर्चित फिल्म ‘बाघ बहादुर’ की याद दिला देता है.

फिल्म की सामर्थ्य इसमें है कि फिल्म की कहानी इस रूपक में कैद नहीं होती, जैसा की मणि कोल, कुमार साहनी जैसे लोगों की फिल्मों में आमतौर पर कहानी रूपक की कैदी हो जाती है, बल्कि यहां यह ताकतवर रूपक कहानी को निर्बंध कर देता है. यह शायद इसीलिए संभव हुआ क्योंकि डायरेक्टर कहानी के उप विषयों [sub text] को भी कहानी के मुख्य विषय जितना ही महत्व देता है.

अंजनी के जीजा का वेतन तो थोड़ा बढ़ता है, लेकिन इसके साथ ही अब उसे अपने साथ एक गन रखने की भी जिम्मेदारी दे दी जाती है. उसकी पत्नी गर्भवती है, और उसे इस वक़्त इस गन का घर में होना अपशकुन लगता है. यह प्रतीक भी बहुत कुछ बयां कर देता है.

फिल्म के अंत में एक सनसनी की तरह पता चलता है कि अंजनी के दोस्त महिंदर से बंदर भगाने के दौरान गलती से एक बंदर की मौत हो जाती है और भीड़ उसे पीट पीटकर मार देती है. क्योकि बंदर हनुमान का रूप है. उसे आप भगा सकते हैं, मार नहीं सकते.

इस महत्वपूर्ण राजनीतिक विषय को फिल्माया नहीं गया है. बल्कि यह विषय महज सूचना के रूप में अंजनी के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचता है. शायद कोई दूसरा फिल्मकार होता तो इस विषय को फिल्माने का मोह नहीं त्याग पता. लेकिन प्रतीक ने इसे न फिल्माकर ‘माॅब लिंचिंग’ की इस सूचना को और भी ताकतवर बना दिया और फिल्म को एक नई ऊंचाई दे दी. फिल्म में क्या फिल्माना है से ज्यादा जरूरी यह निर्णय करना होता है कि क्या नहीं फिल्माना है.

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फिल्म की गति इतनी सहज सरल है की ऐसा लगता है कि पूरी फिल्म रीयल लोकेशन पर गुप्त तरीके से फिल्माई गयी हो. अंजनी का अभिनय तो शानदार है ही, लेकिन आश्चर्यचकित महिंदर का चरित्र करता है. दरअसल महिंदर वास्तविक जिंदगी में बन्दर भगाने के रोजगार में ही है. इसी के साथ प्रतीक वत्स ने सारे लोकेशन तय किए थे. महिंदर को देखकर पता ही नहीं चलता कि वह अपना वास्तविक काम कर रहा है या अभिनय कर रहा है.

बंदरों को भी मिडिल शाट या क्लोज़-अप में ही फिल्माया गया है. यानी बंदरों को भी यहां सामान्य रूप में नहीं बल्कि विशिष्ट रूप में फिल्माया गया है, मानो प्रत्येक बंदर एक चरित्र हो. कुछ क्लोज़-अप तो बहुत ही अर्थपूर्ण है. ऐसे ही एक क्लोज़-अप में मानो बंदर अंजनी की आंखों में घूरते हुए कह रहा हो- ‘लाखों सालो के मानव विकास के बाद आज कौन ज्यादा विकसित है- तुम या हम’?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व कलात्मक फिल्म समीक्षक हैं)

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