कैसे आयशा की मौत ने समाज, सरकार और धर्मगुरुओं की असलियत को उजागर कर दिया!

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Ayesha Exposed Society Government Religious Leaders
आयशा की फाइल फोटो, दूसरी तस्वीर शौहर के साथ की है. साभार ट्वीटर
सम्युन खान

खुदकुशी से पहले अहमदाबाद की आयशा ने जो वीडियो बनाया. उसे देखना बेहद तक़लीफदेह है. मगर उससे भी ज्यादा अफसोसनाक वो सोच है, जिसने आयशा की जान ले ली. आखिर हम, औरतों के लिए किस तरह का दमघोटूं समाज बना रहे हैं, जिसमें हर रोज कोई आयशा, पूनम जान गंवाती चली जा रही हैं. सभ्य समाज में वहशियत की हदें पार करती ऐसी घटनाओं पर मातम मनाने से बेहतर है कि बदलाव की दिशा में आगे बढ़ा जाए. (Ayesha Exposed Society Government Religious Leaders)

आयशा का वीडियो देखकर आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्हें किस कदर प्रताड़ित किया गया होगा, कि शौहर आरिफ और ससुरालीजनों के जुल्म से टूटकर घातक कदम उठाने को मजबूर हो गईं. हालांकि, आयशा का ये फैसला कतई अच्छा नहीं था. उन्हें, हालात से डटकर लड़ना चाहिए था.


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अब बात करते हैं उस सोच की, जिससे आयशा हार गईं. असल में दिक्कत हमारी मानसिकता में है. परिवार और समाज की सोच में है. हमारी व्यवस्था, शिक्षा, समाज और यहां तक कि हम सब इसके लिए बराबर के दोषी हैं. इसलिए क्योंकि ये किसी एक आयशा के सुसाइड भर का मसला नहीं है.

जैसा कि हर आत्महत्या पर दोष का मुलम्मा लगाकर उसे भूल जाने के हम आदि हो चुके हैं. बल्कि ये मुद्​दा, महिलाओं की सुरक्षा, आत्म-सम्मान, बराबरी और भावना से जुड़ा है.

तो इस पर पहला सवाल यही उठता है कि, जब-धार्मिक और संवैधानिक कानून ने महिलाओं को बराबरी का हक दे रखा है. तो फिर कैसे एक पुरुषवादी सोच, औरतों के बराबरी के अधिकार पर अतिक्रमण करके बैठी है.

इसका जवाबदेह कौन है? क्या इस सोच में महिलाएं शामिल नहीं हैं? धर्म के हर मामले में दखल देने वाले धर्मगुरुओं की क्या इस पर कोई जवाबदेही नहीं बनती?


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दूसरा-महिला सशक्तिकरण के लिए बड़ी-बड़ी बातें और दावे किए जाते हैं. सरकारें, कहते नहीं थकतीं कि महिलाओं को आत्मनिर्भर किए बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता. लेकिन हकीकत क्या है? क्या वे महिलाओं को सुरक्षा, आत्मबल देने में विफल नहीं हैं?

अगर ऐसा नहीं है तो फिर कैसे कोई सिरफिरा हाथरस की उस लड़की के पिता को सरेआम गोली मारकर कत्ल कर देता है, जिसकी बेटी का वो उत्पीड़न कर चुका होता है. इस तरह एक बाप बेटी के इंसाफ की जंग में अपनी जान गंवा बैठता है.

हाथरस, उन्नाव, कठुआ, दिल्ली निर्भया केस और बदायूं तक. ऐसी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है, जिसमें बेटियों के आंसुओं पर देश में गम का सैलाब दिखता है, जो दूसरे ही पल हमारी स्मृतियों से ओझल भी हो जाता. महिलाओं के मुद्​दे पर ये आदत बदलने की जरूरत है. (Ayesha Exposed Society Government Religious Leaders)


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बेटियों को मानसिक सशक्त बनाएं

आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ बेटियों को मानसिक और भावनात्मक रूप से ताकतवर बनाने की जरूरत है. कोई लड़की प्रेम में धोखे का शिकार हो जाए, तो वो मौत को नहीं बल्कि जिंदगी का खूबसूरत रास्ता चुने. ससुराल की ज्यादती के खिलाफ डटकर खड़ी हो जाए. लड़े कि लड़ना है मुकद्दर. हमारी सरकारों को भी अधिक संवेदनशील और प्रशासनिक व्यवस्था को जिम्मेदार बनाना पड़ेगा कि, वे महिलाओं के खिलाफ अपराध को प्राथमिकता पर देखें.

धर्मगुरु अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें

महिलाओं के खिलाफ ऐसी घटनाएं रोकने के लिए हर समाज के धर्मगुरुओं को आगे आकर बड़ी भूमिका निभानी होगी. समाज के एक बड़े हिस्से पर धर्मगुरुओं का प्रभाव है. निश्चित रूप से दहेज प्रथा जैसी कुरीति के खिलाफ इनकी पहल सकारात्मक बदलाव ला सकती है. (Ayesha Exposed Society Government Religious Leaders)


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मौत किसी मसले का हल नहीं

फिर कहूंगी कि किसी हादसे से टूटकर मौत को गले लगाना, किसी मसले का हल नहीं है. बल्कि मौत नए मसलों को जनती है. जिसमें, परिवार बिखरते हैं. परिवार बेटियों से नजदीकी बढ़ाए. बेटियों के साथ बेटों को भी शिक्षित करें. ताकि बच्चे ऐसे नकारात्मक विचारों से आजाद रहकर सकें. कम से कम उन तमाम आयशाओं को जेहन में रखते हुए कि आखिर कोई आयशा इस कदर नकारात्मकता में कैसे घिर गई कि उसने अपना जीवन ही समाप्त कर लिया. (Ayesha Exposed Society Government Religious Leaders)

 

(लेखिका समाजसेवी हैं और समाजवादी पार्टी से जुड़ी हैं)

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