बरेली में भीड़ का नया अध्याय लिख गया आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान का 104वां क़ुल

द लीडर. फ़ाज़िल-ए-बरेलवी इमाम अहमद रज़ा ख़ान आला हज़रत का 104वां क़ुल भीड़ का नया बाब लिख गया. भारत के सूबे उत्तर प्रदेश में ज़िला बरेली के बाशिदे शुक्रवार को तारीख़ मंज़र से रूबरू हुए. क़ुल में मौजूद हाज़रीन के हुजूम को किसी ने अक़ीदत का दरिया, किसी ने सैलाब तो बहुतों ने समंदर क़रार दिया. इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान से बाहर सड़कों पर जहां तक नज़र गई, भीड़ ही भीड़ दिखाई दी.



आला हज़रत के उर्से रज़वी में उमड़ा अक़ीदतमंदों का जनसैलाब, आज टूट जाएंगे भीड़ के सारे रिकॉर्ड



इस्लामिया से क़ुतुबख़ाना, चौपुला, नावेल्टी चौराहा, दरगाह आला हज़रत जाने वाले रास्ते हों, भीड़ से भरने लगे. क़ुल के मद्देनज़र शहर की मस्जिदों में नमाज़ का वक़्त दोपहर एक बजे मुक़र्रर किया था लेकिन नमाज़ से पहले ही इस्लामिया मैदान फ़ुल हो गया. जुमे की नमाज़ ख़त्म होने के बाद सड़कें लोगों से भरी दिखाई देने लगीं. जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, वैसे ही मंच पर मौजूद उलमा का जोश भी बढ़ता चला गया.

तक़रीर के ज़रिये सुन्नी बरेलवी मुसलमानों से आला हज़रत, मुफ़्ती आज़म हिंद और ताजुश्शरिया की तालीम पर मज़बूती के साथ जमे रहने की नसीहत की. चेताया भी कि अगर भटके तो फिर बड़ा नुक़सान उठाना पड़ेगा. बीच-बीच में आला हज़रत की लिखी नात और मनक़बत भी पेश की गईं. हिस्सा लेने आए अक़ीदतमंद सुब्हान अल्लाह, माशा अल्लाह, नारा-ए-तकबीर अल्लाहु अकबर के नारे लगाकर अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहे. जैसे दोपहर 2 बजकर 38 मिनट का वक़्त हुआ, लगा जैसे भीड़ का समंदर ठहर गया हो. जो जहां था, वहीं खड़ा होकर फ़ातिहा में शामिल हो गया.



आला हज़रत के 104वें उर्से रज़वी का आगाज़, बरेली में तीन साल बाद फिर रूहानियत का अनूठा नज़ारा



क़ुरान की आयत पढ़ी जाने लगीं. माइक पर जब आला हज़रत के सज्जादानशीन मुफ़्ती मुहम्मद अहसन रज़ा ख़ान क़ादरी अहसन मियां की आवाज़ गूंजी लाखों ज़ायरीन के हाथ दुआ के लिए उठ गए. अहसन मियां मुसलमानों के लिए तमाम वो दुआएं बारी-बारी से मांगने लगे, जिनकी ज़रूरत महसूस की जा रही थी. उन्होंने तमाम प्रमुख ख़ानक़ाहों के लिए और उनमें एका बनाए रखने के लिए भी दुआ की. दुआ ख़त्म होने के बाद इस्लामिया मैदान में नमाज़-ए-जुमा अदा की गई. बाद में जैसे भीड़ अमन के साथ आई थी, वैसे ही वापस अपने घरों के लिए लौटने लगी. प्रशासन और पुलिस के अफ़सर भी पूरे वक़्त जमे रहे. टीटीएस के वालिंटियर भी हरकत में दिखे, भीड़ को कंट्रोल करने के लिए बेरिकेड्स भी लगाए गए थे लेकिन कहीं पुलिस को ज़ायरीन की तरफ़ से मशक़्क़त का सामना करना पड़ा हो, ऐसी कोई इत्तेला नहीं मिली. इंतज़ाम पहले से बेहतर रहे.

प्रशासन और इंतज़ामिया कमेटी दोनों ही तरफ़ से. सबसे ख़ास बात यह कि बरेली शहर मेहमाननवाज़ी की कसौटी पर एक बार फिर खरा उतरा. बाहर से आने वाले ज़ायरीन ख़िदमत से ख़ुश होकर लौटे. जाते-जाते बाशिंदों का शुक्रिया अदा करना न भूले. तीन दिन तक लगे इस दीनी मजमे की सबसे ख़ास बात यह रही कि जिस गंगा-जमुनी तहज़ीब का ज़िक्र दुनियाभर में होता है, अला हज़रत का उर्स उसकी जड़ों का पानी दे गया. उर्स में पहले से काफ़ी ज़्यादा भीड़ आई और जब रहने-ठहरने के लिए जगहें कम पड़ीं तो हिंदू भाईयों ने भी ज़ायरीन के लिए घरों के दरवाज़े खोल दिए.


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