Birthday special: शकील बदायूंनी-एएमयू से निकलकर मायानगरी के सतरंगी आसमान तक

सलमान ज़मीर-
The leader hindi: गीत और ग़ज़ल से मुहब्बत की खूशबू दुनियाभर में महकाने वाले शकील बदायूंनी आसान अल्फ़ाज़ में अवामी जज़्बात की अदायगी बहुत ख़ूबसूरती के साथ कर गए हैं. जब भी गीत लिखने के लिए क़लम उठा, ऐसी रचना निकली, जो अमर हो गई. फिल्मी दुनिया के वो ऐसे गीतकार हैं, जिनके गीतों की लोगों को एक या दो लाइन नहीं पूरे के पूरे रट गए. चाहे वह फिल्म बरसात का गाना-कल रात ज़िंदगी से मुलाक़ात हो गई या फिर मुग़ले आज़म का जब प्यार किया तो डरना क्या, हो. भजन लिखे तो डूबकर और जब देशभक्ति गीत की बारी आई तो अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, ऐसी रचना दे गए, जो ख़ास मौक़ों पर बजता है तो सुनने वालों के लिए वतन पर मर मिटने का जज़्बा हिलोरे मारने लगता है.


तुम मुझे यूं भुला न पाओगे–मुहम्मद रफ़ी


सप्लाई ऑफिसर से सितारों की दुनिया में पहुंचने वाले मशहूर शायर, गीतकार, भजनों के शहंशाह शकील बदायूंनी का आज जन्म दिन है। बदायूँ के मुहल्ला सोचा में 3 अगस्त 1916 पैदा हुए. साल 1936 में पढ़ाई के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए. यहीं से वे कॉलेज के मुशायरों में भाग लेने लगे. 1940 में शादी के बाद दिल्ली में सप्लाई ऑफिसर नियुक्त हो गए। 1946 में ज़िंदगी में टर्निंग प्वाइंट आया. दिल्ली के एक मुशायरे में फिल्म निर्माता एआर कारदार से मुलक़ात हुई और उन्होंने शायरी से प्रभावित होकर मुंबई बुला लिया।

मायानगरी में जब संगीतकार नौशाद के साथ जोड़ी बनी तो उनके गीत और संगीत की जुगलबंदी ने नया इतिहास रच दिया. शकील बदायूंनी छा गए. क़रीब 100 सुपरहिट फिल्मों में गीत लिखे, जिनमें बैजू बावरा, गंगा जमुना, मदर इंडिया, लीडर, उड़न खटोला, कोहिनूर, मुगले आजम और संघर्ष खास रहीं. शकील बदायूंनी को लगातार तीन बार फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला.


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1961की फ़िल्म “चौदहवीं का चांद” का गाना ‘चौदहवीं का चांद हो या आफ़ताब हो…” 1962 की फ़िल्म “घराना” का बेहतरीन गीत ‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं…’ 1963 की फ़िल्म “बीस साल बाद” का गीत ‘कहीं दीप जले कहीं दिल….’ जैसे अमर गाने लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गए. फ़िल्म “मुगले आजम” का गीत ‘जब प्यार किया तो डरना क्या…’ ने तो शकील बदायूंनी को गीतों का शहंशाह बना दिया.

1952 में फ़िल्म “बैजू बावरा” के लिए लिखा भजन- ‘मन तड़पत हरि दर्शन को…’ और 1954 की फ़िल्म “अमर” का भजन ‘इंसाफ का मंदिर है, ये भगवान का घर है…’ 1968 की बहुचर्चित फ़िल्म “नीलकमल” का भजन ‘हे रोम रोम में बसने वाले राम…’  फ़िल्म “उस्ताद” का ‘जान सके तो जान तेरे मन में छुपे भगवान….. फ़िल्म “नया दौर” का ‘आना है तो आ राह में.. और 1961 में फ़िल्म “घराना” का भजन ‘जय रघुनन्दन जय सियाराम.. भजन सुनकर लोग भक्ति में डूब जाते हैं.


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Abhinav Rastogi

पत्रकारिता में 2013 से हूं. दैनिक जागरण में बतौर उप संपादक सेवा दे चुका हूं. कंटेंट क्रिएट करने से लेकर डिजिटल की विभिन्न विधाओं में पारंगत हूं.

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