AMU के छात्र राजा महेंद्र प्रताप ने अफगानिस्तान में बनाई थी पहली निर्वासित सरकार

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विजय शंकर सिंह-

-स्मृति दिवस-

मथुरा से जब आप हाथरस की ओर चलेंगे तो हाथरस जिले में प्रवेश करते ही एक कस्बा पड़ेगा मुरसान। मुरसान एक छोटा सा कस्बा है। मुरसान एक छोटी सी रियासत रही है। वहां के राजा थे महेंद्र प्रताप सिंह। राजा महेंद्र प्रताप उन विलक्षण और प्रतिभाशाली स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में से एक रहे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारत के बाहर आज़ादी की मशाल और स्वतंत्र चेतना को जगाये रखा। उनका जन्म 1 दिसंबर 1896 को और मृत्यु 29 अप्रैल 1979 को हुई थी। वे आज़ादी के बाद मथुरा से सांसद भी रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम के सेनानी के साथ-साथ पत्रकार, लेखक और समाज सुधारक भी थे।

जब भारत अपनी आजादी के स्वरूप को पूरी तरह से निर्धारित भी नहीं कर पाया था, तब उन्होंने साल 1915 में ही, अफ़ग़ानिस्तान में स्वाधीन भारत की सरकार गठित कर दी थी। यह गवर्नमेंट इन एकजाइल थी, यानी वनवास में गठित सरकार। बेशक, राजा महेन्द्र प्रताप की इस सरकार ने स्वाधीनता संग्राम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई, पर इसने दुनियाभर को यह संदेश ज़रूर दे दिया कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी चाहता है।

भारत की यह पहली निर्वासन में गठित सरकार थी और दूसरी निर्वासन में सरकार का गठन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में आरजी ए हुकूमत ए आज़ाद हिंद के नाम से किया था। इन्हीं राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर अलीगढ़ में उत्तर प्रदेश सरकार एक यूनिवर्सिटी की स्थापना करने जा रही है। राजा की शिक्षा भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हुई थी और उन्होंने अपने इस मातृ संस्था को कुछ भूमि भी दान दी थी। एएमयू के दानदाताओं में राजा महेंद्र प्रताप का भी नाम दर्ज है।

राजा महेन्द्र प्रताप, मुरसान के राजा घनश्याम सिंह के तृतीय पुत्र थे और जब वे तीन वर्ष के थे तब हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने उन्हें पुत्र के रूप में गोद ले लिया। 1902 में उनका विवाह बलवीर कौर से हुआ था जो जींद रियासत के सिद्धू जाट परिवार से थीं। विवाह के समय राजा पढ़ाई कर रहे थे। हाथरस के जाट राजा दयाराम ने 1817 में अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया था और उनका साथ, मुरसान के जाट राजा ने भी दिया था। अंग्रेजों ने दयाराम को बंदी बना लिया। 1841 में दयाराम का देहांत हो गया। उनके पुत्र गोविन्दसिंह गद्दी पर बैठे।

1857 के विप्लव में गोविंद सिंह अंग्रेजों के साथ थे, फिर भी अंग्रेजों ने गोविंद सिंह का राज्य उन्हें वापस नहीं लौटाया, बल्कि कुछ गांव, 50 हजार रुपये नकद और राजा की पदवी देकर हाथरस राज्य का पूरा अधिकार उनसे छीन लिया। राजा गोविंदसिंह की 1861 में मृत्यु हो गई। संतान न होने पर अपनी पत्नी को पुत्र गोद लेने का अधिकार वे मृत्य के समय दे गए थे। अत: रानी साहब कुँवरि ने जटोई के ठाकुर रूपसिंह के पुत्र हरनारायण सिंह को गोद ले लिया।

अपने दत्तक पुत्र के साथ रानी अपने महल वृन्दावन में रहने लगी। राजा हरनारायन को कोई पुत्र नहीं था। अत: उन्होंने मुरसान के राजा घनश्यामसिंह के तीसरे पुत्र महेन्द्र प्रताप को गोद ले लिया। इस प्रकार महेंद्र प्रताप मुरसान राज्य को छोड़कर हाथरस राज्य के राजा बन गए।

प्रथम विश्वयुद्ध के कारण ब्रिटिश साम्राज्य अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में उलझा था, उसका लाभ उठाकर भारत को आजादी दिलवाने के ध्येय से राजा विदेश निकल जाना चाहते थे। पर उनके पास पासपोर्ट नहीं था। वे शुरू से ही देश की आज़ादी के समर्थक थे और अपने श्वसुर, महाराजा जींद के विरोध के बावजूद उन्होंने 1906 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया था।

उन्होंने ‘निर्बल सेवक’ नामक एक समाचार-पत्र भी देहरादून से निकाला था। जिसमें उन्होंने जर्मनी के पक्ष में एक लेख लिखा था। इस लेख के कारण ब्रिटिश सरकार उनसे नाराज़ हो गई और उन पर 500 रुपये का अर्थदंड लगा दिया। उन्होंने जुर्माना तो भर दिया लेकिन देश को आजाद कराने की उनकी इच्छा प्रबल हो गई।

विदेश जाने के लिए उन्हें जब पासपोर्ट नहीं मिला तो मैसर्स थौमस कुक एंड संस के मालिक ने उन्हें बिना पासपोर्ट के अपनी कंपनी केपी एंड ओके स्टीमर द्वारा इंग्लैंड पहुंचा दिया। उसके बाद उन्होंने इंग्लैंड से जर्मनी जाकर वहां के शासक कैसर से भेंट की। कैसर ने उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी के आंदोलन में हर संभव मदद देने का वादा किया।

वहां से वह बुडापेस्ट, बल्गारिया, टर्की होकर अफ़ग़ानिस्तान गए। अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह से उन्होंने मुलाकात की और वहीं पर 1 दिसंबर 1915 में काबुल से भारत के लिए अस्थाई सरकार के गठन की घोषणा की, जिसके राष्ट्रपति वे स्वयं बने और प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्ला खां को बनाया गया। यह निर्वासन में गठित पहली सरकार थी।

तभी अफगानिस्तान ने अंग्रेजों से आज़ाद होने के लिए युद्ध छेड़ दिया औऱ राजा महेंद्र प्रताप वहां से रूस निकल गए। रूस में 1917 की क्रांति हो चुकी थी। जारशाही का पतन हो चुका था। लेनिन के नेतृत्व में वहां पहली बार कम्युनिस्ट सरकार बन चुकी थी। लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था।

यूरोप में अफरातफरी थी। राजा ने रूस जाकर वर्ष 1919 में लेनिन से मुलाकात की। उस समय लेनिन अपने देश की समस्याओं में उलझे थे। क्रांति तो हो चुकी थी लेकिन अभी रूस में कम्युनिस्ट स्थिर नहीं हो पाए थे। वर्ष 1919 में लेनिन से हुई अपनी इस मुलाकात का जिक्र उन्होंने स्वयं किया है।

राजा लेनिन से भारत की आज़ादी के लिए सहायता चाहते थे, जो उन्हें नहीं मिल पाई। सन 1920 से लेकर 1946 तक राजा विदेशों में भ्रमण करते रहे। विश्व मैत्री संघ की स्थापना की। 1946 में भारत लौटे। इस दरम्यान कांग्रेस के नेताओं से उनका संपर्क बना रहा। जब वे 1946 में कलकत्ता हवाई अड्डे पर स्वदेश वापस पहुंचे तो सरदार पटेल की बेटी मणिबेन उनको लेने कलकत्ता हवाई अड्डे पहुंची हुई थीं।

रोचक जानकारी यह भी है कि राजा महेंद्र प्रताप को एक बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामित किया जा चुका था। उनका नामांकन 1932 में शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए किया गया था। नोबेल पुरस्कार समिति द्वारा सार्वजनिक किये गए एक पुराना डेटाबेस में उनके बारे में जो लिखा-

”प्रताप ने शैक्षिक उद्देश्यों के लिए अपनी संपत्ति छोड़ दी, और उन्होंने बृंदाबन में एक तकनीकी कॉलेज की स्थापना की। 1913 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी से जाकर मिले। अफगानिस्तान और भारत की स्थिति के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए दुनियाभर का भ्रमण किया।

वर्ष 1925 में वह तिब्बत की यात्रा पर एक मिशन के साथ गए और दलाई लामा से मिले। यह मिशन, मुख्य रूप से अफगानिस्तान की ओर से एक अनौपचारिक आर्थिक मिशन था। इसी के माध्यम से वे ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूरताओं को भी उजागर करना चाहते थे। उन्होंने खुद को भारत का एक विनम्र सेवक कहा।”

उस वर्ष का पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया। पुरस्कार राशि इस पुरस्कार खंड के एक विशेष कोष के लिए आवंटित की गई थी।

राजा महेन्द्र प्रताप और महात्मा गांधी के बीच बीच मे निरंतर संपर्क बना भी रहा। महात्मा गांधी ने 1929 में अपने अखबार यंग इंडिया में लिखा था, देश के लिए इस रईस ने निर्वासन को अपने भाग्य के रूप में चुना है। उन्होंने अपनी शानदार संपत्ति शैक्षिक उद्देश्यों के लिए छोड़ दी है। प्रेम महाविद्यालय उनकी रचना है। यह उद्धरण नोबेल पुरस्कार समिति के अभिलेखों में दर्ज है।

1957 के लोकसभा चुनाव में राजा महेंद्र प्रताप ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जो जनसंघ प्रत्याशी थे, को हराया था। राजा महेंद्र प्रताप निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे। हालांकि, अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर सीट से भी प्रत्याशी थे, और वे वहां से जीत गए थे।

(लेखक वरिष्ठ लेखक व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, लोकमाध्यम ब्लॉग से साभार)


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