अभी टला नहीं त्रिवेंद्र का संकट

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द लीडर। ऐसा तो नहीं कि बतौर पर्यवेक्षक रमन सिंह मुख्यमंत्री की चाय पीने और केदारनाथ का स्मृतिचिन्ह लेने भर को देहरादून भेजे गए थे। यकीनन शनिवार को वह एक सियासी भूचाल लेकर आये थे और एपिसेंटर पर बैठे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह का संकट टला नहीं। पार्टी उपाध्यक्ष रमन सिंह ने जो देखा सुना वह तो उन्होंने बता दिया होगा लेकिन अभी और भी देखा परखा जा रहा है। उत्तराखंड के सांसदों को दिल्ली बुला लिया गया है और संघ से भी परामर्श जारी है।

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त्रिवेंद्र सिंह ने रमन सिंह के जाने के बाद उनकी तस्वीर के साथ ट्वीट किया कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी से मुलाकात हुई उन्हें विधायकों से भी मिलवाया। इसके बाद विधायकों के साथ बैठक कर उन्होंने यह भी संदेश देने की कोशिश की कि सब ठीक ठाक है। सरकार समर्थक मीडिया और सोशल मीडिया पर त्रिवेंद्र के जयकारे जारी हैं लेकिन सत्ता के गलियारों में एक बडे भूकंप के बाद दूसरे झटके का अंदेशा बना हुआ है।

मुख्यमंत्री पद के दावेदार एक सांसद रविवार को कार्यक्रम रद्द कर दिल्ली रवाना हुए तो मंच से ऐलान हुआ कि उन्हें पार्टी अध्यक्ष और गृह मंत्री ने जरूरी विमर्श के लिए दिल्ली बुलाया है। शनिवार को अचानक देहरादून दौडे दूसरे सांसद भी दिल्ली की तरफ रवाना हुए हैं।

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रमन सिंह को देहरादून में कुछ विधायकों से ही मिलवाया गया था और ये भी सच है कि करीब 20- 22 विधायकों और एक राज्यसभा सदस्य ने कहा कि नेतृत्व बदलने से पार्टी को चुनाव में नुकसान हो सकता है क्योंकि ऐसा पहले भी हो चुका है। दिल्ली को यह भी संदेश देने की कोशिश हुई कि यदि कुछ नाराज लोगों की बात सुनी जा रही है तो उनके बारे में भी सोचा जाना चाहिए जो अभी खुश हैं।

यूं ये भी सच के नेता बदले न बदले हर चुनाव में यहां अब तक सत्ताधारी दल हारता ही रहा है। सियासी गलियारों की खबर रखने वाले बता रहे हैं कि संघ के लोगों से रमन सिंह की अलग मुलाकात को हलके में नहीं लेना चाहिए। प्रदेश में संघ की रिपोर्ट त्रिवेंद्र के पक्ष में नहीं। एक को छोड़ बाकी सांसद भी नेता बदलना चाहते हैं इनमें से दो तो खुद दावेदार हैं। ये भी सही है कि उनकी अति सक्रियता को भी केंद्रीय नेतृत्व ने संज्ञान में लिया है और अगर बदलाव होता है तो इनको शायद ही तरजीह मिले।

संघ के लोग एक ऐसे सांसद का नाम सुझा रहे हैं जो काफी हद तक तटस्थ है भले ही उनके पास प्रशासनिक अनुभव कम हो। त्रिवेंद्र को अमित शाह का वरद हस्त बताया जाता है। इसलिए माना जा रहा है कि दिल्ली के मंथन में त्रिवेंद्र का पक्ष भी मजबूत रहेगा।

त्रिवेंद्र मूलतः स्वयं सेवक हैं ऐसे में नागपुर की हवा उनका अगला मार्ग तय करने में निर्णायक हो सकती है। देहरादून में तो नागपुर के लोग उनके पक्ष में नहीं लगते। 18 मार्च को सरकार के चार साल पूरे होने का जश्न है । देखते हैं रमन की रिपोर्ट कब सामने आती है।

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