वो बेटा जिसने दिलाई 30 साल पहले किए गए गुनाह की सज़ा

द लीडर हिंदी: कोर्ट का एक ऐसा फ़ैसला जिसने इंसाफ़ की नई नज़ीर और संघर्ष की बरसों बरस याद रहने वाली इबारत लिख दी है. जब कभी कोई मज़लूम, ज़ालिम को सज़ा दिलाने में थका हुआ या ख़ुद को कमज़ोर महसूस करेगा, इस बेटे की यह जद्दोहद उसे हौसला देगी. उसने काम ही ऐसा किया है. वारदात के 30 साल बाद उन दो भाईयों को 10-10 साल क़ैद और 30-30 हज़ार का जुर्माना लगा है, जो ज़िना करने के बाद अपने इस जुर्म को भूल चुके थे. इस जुर्म की वजह से पैदा हुए बेटे ने 17 साल का होने के बाद ठान लिया कि जिनने उसकी मां के साथ हैवानियत की. उन्हें सज़ा दिलाकर रहेगा. अब आपको संघर्ष की यह दास्तान तफ़्सील से बताते हैं, जो पूर्व सीएम एनडी तिवारी मामले से मेल खाती है लेकिन उसकी शक्ल जुदा है.

रोहित शेखर के कोर्ट पहुंचने पर एनडी तिवारी को क़ुबूल करना पड़ा था कि वो उनके ही बेटे हैं. अब हम आपको जो बताने जा रहे हैं, यह मामला यूपी के ज़िला शाहजहांपुर का है. 30 साल पहले 1994 में थाना सदर बाज़ार क्षेत्र में दो भाईयों ने एक किशोरी को हैवानियत का निशाना बनाया था. बहन-बहनोई के साथ रहने वाली यह लड़की उस वक़्त घर में अकेली थी. इसके बाद उसे डरा-धमकाकर यह सिलसिला बाद तक चलता रहा. दोनों भाईयों की करतूत किशोरी के गर्भवती होने पर सामने आई. उनके घरवालों से शिकायत की तो उल्टे डरा-धमकाकर मुंह बंद करा दिया गया. डॉक्टरों के गर्भपात से इन्कार कर देने पर 13 साल की उम्र में किशोरी ने रामपुर में बेटे को जन्म दिया.

बदनामी के सबब इस बच्चे को हरदोई में एक रिश्तेदार के हवाले कर दिया गया. बाद में उस लड़की की शादी भी हुई लेकिन छह साल बाद ही हैवानियत का राज़ पता चला तो शौहर और उसके घरवालों ने रिश्ता तोड़ लिया. उधर, वो बेटा जिसे हरदोई में रिश्तेदार को दिया गया था, 14 साल का हुआ तो अपने बाप के बारे में जानकारी की. मां तक पहुंचा और उनसे बामुश्किल तमाम पूरा क़िस्सा जानने के बाद उसने गुनहगारों को सज़ा दिलाने की ठानी. तब कोर्ट के आदेश पर सदर थाने में नक़ी हसन उर्फ़ ब्लेडी और उसके भाई गुड्डू के ख़िलाफ़ 27 साल बाद FIR दर्ज हुई.

दोनों पेशे से ड्राईवर हैं. मुक़दमा दर्ज होने के बाद दोनों फरार हो गए. पुलिस ने ब्लेडी पर 25 हज़ार का इनाम भी घोषित कर दिया था. दोनों पकड़े गए. गुड्डू को ज़मानत मिल गई. वारदात को मुद्दत गुज़र चुकी थी. पुलिस के पास सुबूत और गवाह नहीं थे. तब पीड़िता के बेटे का डीएनए नकी उर्फ़ ब्लेडी से मैच हो गया. इस तरह 30 साल बाद अपर सत्र न्यायाधीश षष्टम लवी यादव ने एक तारीख़ी फ़ैसला सुना दिया. जो मुद्दतों याद रखा जाएगा.

वैसे ही जैसे डीएनए टेस्ट के बाद एनडी तिवारी को मानना पड़ा था कि रोहित शेखर उन्हीं के बेटे हैं. अब डीएनए की बदौलत ही हैवानियत करने वाले सज़ा के हक़दार बनकर सलाख़ों के पीछे पहुंचाए गए हैं. अब वो अपने उस जुर्म पर शर्मिंदा हो रहे होंगे, जिसे उनके मज़हब में भी कबीरा गुनाह क़रार दिया गया है. वो जिसकी कि माफ़ी नहीं है. शरीयत के एतबार से ऐसे शख़्स को तब तक संगसार यानी पत्थर मारने का हुक्म है, जब तक कि उसकी सांसें थम नहीं जाएं.

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Abhinav Rastogi

पत्रकारिता में 2013 से हूं. दैनिक जागरण में बतौर उप संपादक सेवा दे चुका हूं. कंटेंट क्रिएट करने से लेकर डिजिटल की विभिन्न विधाओं में पारंगत हूं.

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