देश के नामचीन लॉ कॉलेजों में पहले दिन से भेदभाव का सामना करने लगते छात्र-जस्टिस चंद्रचूड़ ने क्यों कही ये बात

द लीडर : नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU)देश के सर्वोच्च विधि शिक्षण संस्थान हैं. जिनकी संख्या अभी 23 है. अखिल भारतीय स्तर पर कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT)के जरिये इनमें एडमिशन मिलता है. सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इन्हीं लॉ स्कूलों में छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव की तरफ ध्यान खींचा है. ये कहते हुए कि दाखिला लेने के दिन से ही छात्र यहां भेदभाव का सामना करने लगते हैं, जो इंटनर्शिप और जॉब तक बना रहता. (Students Discrimination Admission Law Schools Justice Chandrachud)

जो छात्र कानून के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं. वे 12वीं कक्षा के बाद क्लैट की परीक्षा में शामिल हो सकते हैं. अभी इसकी आवेदन प्रक्रिया चल रही है, जो 30 अप्रैल तक चलेगी. बीती 1 जनवरी से क्लैट के फॉर्म भरे जा रहे हैं. और 13 जून को परीक्षा प्रस्तावित है.

एनएलयू में 5 साल का बीए-एलएलबी कोर्स होता है. इसकी प्रवेश परीक्षा अंग्रेजी में होती. जस्टिस चंद्रचूड़ ने अंग्रेजी भाषा में टेस्ट को ही पहला भेदभाव बताया है. उन्होंने कहा कि इसका परिणाम यह होता है कि अंग्रेजी बैकग्राउंड वाले छात्र इसमें आसानी से पास हो जाते. जबकि हिंदी भाषी या क्षेत्रीय बोर्ड के छात्र अपेक्षाकृत कम सफल हो पाते और इस तरह वे प्रवेश से वंचित रह जाते हैं. वो इसलिए क्योंकि अंग्रेजी बोर्ड वाले छात्रों की तरह अंग्रेजी पर उनकी उतनी अच्छी कमांड नहीं होती है.


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जस्टिस चंद्रचूड़ ने एजुकेशन और जॉब में भेदभाव उन्मूलन को लेकर बनी सीईडीई की ऑनलाइन मीटिंग में कानून से जुड़े लोगों को संबोधित करते हुए ये बातें कही हैं.

इस दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने क्लैट में रीजनिंग के सवालों का जिक्र करते हुए कहा कि ये दृष्टिहीन स्टूडेंटस के साथ भेदभाव है. क्योंकि रीजनिंग के सवालों को हल करने के लिए दृष्टि की जरूरत पड़ती है. हालांकि कंसोर्टियम ने यकीन दिलाया है कि इसका समाधान करेंगे. हम उसके पूरा होने की प्रतीक्षा में हैं.

उन्होंने एनएलयू में महंगी फीस, छात्रवृत्ति समेत अन्य बिंदुओं को भी उठाया. दलित, पिछड़े और आदिवासी छात्रों के सामने इंटर्नशिप समेत अकादिमक क्षेत्र में पिछड़ने के कारणों को सामने रखा है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अक्सर ये बताया जाता है कि दलित-पिछड़े और आदिवासी छात्र मुश्किल वक्त का डटकर और सही से सामना नहीं कर पाते हैं.

जबकि सच ये है कि उनके साथियों को ही कुछ खास अधिकार या विशेषाधिकार हासिल हैं. ट्रेनिंग और मेंटरशिप भी मिलती है. दूसरी ओर पिछड़े वर्ग वाले छात्रों को अपनी फैकल्टी का ही भरपूर सहयोग भी नहीं मिल पाता है.

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