क़ुर्रतुल ऐन हैदर : आज़ादी के बाद भारतीय फ़िक्शन का सबसे मजबूत स्तंभ

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Qurratulain Hyder's Birth Anniversary
क़ुर्रतुल ऐन हैदर (20 जनवरी 1927-21 अगस्त 2007)

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्मीं क़ुर्रतुल ऐन हैदर को ऐनी आप के नाम से भी जाना जाता है. उनका पूरा नाम मुसन्निफ़ा क़ुर्रतुल ऐन हैदर था. क़ुर्रतुल के पिता सज्जाद हैदर यलदरम उर्दू के जाने-माने लेखक थे और मां नजर बिन्ते-बाकिर भी ऊर्दू लेखिका थीं. सो साहित्य क़ुर्रतुल को विरसे में मिला था. (Qurratulain Hyder’s Birth Anniversary Special)

क़ुर्रतुल ऐन हैदर के पिता ब्रिटिश राज के राजदूत की हैसियत से तुर्की, अफगानिस्तान समेत कई देशों में रहे. इस वजह से वे अंग्रेजी रंग-ढंग में पली बढीं. उनकी शुरुआती पढाई-लिखाई लखनऊ के लालबाग, के गाँधी स्कूल में हासिल की और उसके बाद अलीगढ़ से हाईस्कूल पास किया. लखनऊ के ही आई.टी. कालेज से बी.ए. करने के बाद वे स्नात्तकोत्तर की डिग्री हासिल करने लखनऊ विश्वविद्यालयचली गयीं. उसके बाद लन्दन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल में उच्च शिक्षा के लिए चली गयीं.

बंटवारे ने क़ुर्रतुल ऐन हैदर के परिवार को भी बांट दिया. 1947 के विभाजन और दंगों के बाद उनके भाई-बहन व रिश्तेदार पाकिस्तान कूच कर गए. अपने वालिद की मौत के बाद क़ुर्रतुल ऐन हैदर और उनका बड़ा भाई मुस्तफा हैदर भी पाकिस्तान चले गए जहाँ से 1959 में वे लन्दन जा बसीं. लन्दन में एक लेखक व पत्रकार के तौर पर उन्होंने बीबीसी लन्दन और द टेलीग्राफ के लिए काम किया और इम्प्रिंट पत्रिका की प्रबन्ध सम्पादक की जिम्मेदारी भी संभाली.

1956 में वे भारत घूमने आयीं और अपने पिता के दोस्त कांग्रेस नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने उनसे जानना चाहा कि वे भारत में रहना चाहेंगी? क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने भारत में रहने की इच्छा जताई और अपने पिता के दोस्त की कोशिशों के बाद वे लन्दन से मुम्बई आ गयीं और उसके बाद भारत में हीं रहीं.

ताउम्र अविवाहित रहने वाली क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया था, उनके पारिवारिक परिवेश को देखते हुए यह स्वाभाविक भी था.  उन्होंने अपनी पहली कहानी कुल 6 साल की उम्र में ही लिख डाली थी. उनकी पहली प्रकाशित कहानी बनी ‘बी चुहिया’ हुई. कुल जमा 18 बरस की उम्र में उनका पहला कहानी संग्रह ‘शीशे का घर’ सामने प्रकाशित हुआ, ये था साल 1945. इसके अगले साल ही उनका पहला उपन्यास ‘मेरे भी सनमखाने’ छपा. एक पत्रकार के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाली क़ुर्रतुल ऐन हैदर पत्रकारिता करने के दौरान भी लगातार साहित्य भी रचती रहीं. उनकी कहानियां, उपन्यास, अनुवाद वग़ैरह लगातार  प्रकाशित होते रहे. मजे की बात यह है की अँग्रेजी में पत्रकारिता करने वाली क़ुर्रतुल ऐन हैदर साहित्य उर्दू में रचती थीं.  उनके कई उपन्यास और कहानियां हिंदी, अंग्रेजी समेत कई भाषाओं में अनुवादित भी हुईं. वे साहित्य अकादमी के उर्दू सलाहकार बोर्ड की दो बार सदस्य रहीं और जामिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी व अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की विजिटिंग प्रोफेसर भी. वे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की गेस्ट प्रोफ़ेसर भी रहीं.

1959 में उनका कालजयी उपन्यास आग का दरिया छपा. इस उपन्यास को जिसे आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा उपन्यास माना गया था. आग का दरिया ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर 1947 तक के भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं को समेटे हुए है. आग का दरिया के बारे मेंप्रसिद्ध शायर निदा फ़ाज़ली ने कहा— ‘जिन्ना ने हिन्दुस्तान के साढ़े चार हज़ार सालों की तारीख़ में से मुसलमानों के 1200 सालों की तारीख़ को अलग करके पाकिस्तान बनाया था. क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने नॉवल ‘आग़ का दरिया’लिख कर उन अलग किए गए सालों को हिन्दुस्तान में जोड़ कर हिन्दुस्तान को फिर से एक कर दिया.’

21 अगस्त 2007 को दिल्ली के पास नोएडा के एक अस्पताल में उनका निधन हुआ. इस समय उनकी उम्र 80 बरस थी.

साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, इकबाल सम्मान आदि ढेरों पुरस्कारों से सम्मानित क़ुर्रतुल ऐन हैदर को साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से नवाजा गया. साल 1989 में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया.

प्रमुख उपन्यास— मेरे भी सनमख़ाने, आग का दरिया, आख़िरी शब के हमसफ़र,सफ़ीन-ए-गमे-दिल, गर्दिशे-रंगे-चमन, चांदनी बेगम.

अन्य कृतियां—

उनकी कहानियों के संकलन में ‘सितारों से आगे,’ ‘शीशे के घर,’ ‘पतझड़ की आवाज़’ और ‘रोशनी की रफ़्तार’ हैं.

उनके जीवनी-उपन्यासों में ‘कारे जहां दराज़ है’ (दो भाग), चार नावेलेट.’  ‘सीता हरन,’ ‘दिलरुबा,’ ‘चाय के बाग़’ और ‘अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो’ ख़ास हैं.

रिपोर्ताज़ में—

‘छुटे असी तो बदला हुआ ज़माना था, ‘कोहे-दमावंद,’ ‘गुलगश्ते जहां,’ ‘ख़िज़्र सोचता है,’ ‘सितंबर का चाँद,’ ‘दकन सा नहीं ठार संसार में,’ ‘क़ैदख़ाने में तलातुम है कि हिंद आती है’ वग़ैरह हैं.

अनुवाद—

हेनरी जेम्स के उपन्यास ‘पोर्ट्रेट ऑफ़ ए लेडी’ का अनुवाद ‘हमीं चराग़, हमी परवाने’ नाम से.

उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध लेखक के नाटक ‘मर्डर इन द कैथेड्रल’ का अनुवाद ‘कलीसा में क़त्ल’ के नाम से किया. इसके अलावा ‘आदमी का मुक़द्दर,’ ‘आल्पस के गीत,’और ‘तलाश’। (Qurratulain Hyder’s Birth Anniversary )

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