भाजपा विधायक की जिद पूरी,महामंडेश्वर बनेंगे, शाही स्नान करेंगे

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द लीडर हरिद्वार

कुम्भ में स्नान और वह भी शाही स्नान। ये तो सन्यासी ही कर सकते हैं लेकिन इस बार भाजपा के एक विधायक भी निरंजनी अखाड़े के शाही स्नान में होंगे और वह भी महामंडलेश्वर की उपाधि के साथ। इस तरह हरिद्वार कुम्भ में सियासी व्यक्ति को बिना सन्यासी बनाये महामंडलेश्वर बनाने की परंपरा एक नए संशोधन के साथ शुरू होगी।
पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के सचिव महंत रविंद्रपुरी ने बताया कि हरिद्वार में भाजपा के ज्वालापुर विधायक सुरेश राठौर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के महामंडलेश्वर बनाए जाएंगे। सुरेश रविदासी समाज में खासा दखल रखते हैं, चुने हुए प्रतिनिधि और कथावाचक हैं। भाजपा भी एक वोट बैंक पर उनकी पकड़ जानती है। अप्रैल के पहले सप्ताह में अखाड़े में महामंडलेश्वर पद पर उनकी ताजपोशी होगी। इसके बाद विधायक अखाड़े के संतों के साथ शाही स्नान करेंगे। जाहिर है वह महामंडलेश्वसर होंगे तो उनके साथ समाज के और लोग भी शाही स्नान में होंगे। इस तरह एक रविदासी उप अखाड़ा तैयार हो गया है। किन्नर हालांकि अब एक अलग अखाड़ा माने जाते हैं लेकिन वे भी जूना अखाड़े के साथ ही होते हैं।
शुक्रवार को अखाड़े की कार्यकारिणी की बैठक हुई। इसमें कई मुद्दों पर चर्चा हुई। महंत रविंद्रपुरी ने बताया कि विधायक सुरेश राठौर ने अखाड़े से जुड़ने की इच्छा जताई थी। कार्यकारिणी सदस्यों की आपसी सहमति से विधायक को महामंडलेश्वर बनाए जाने के प्रस्ताव पर सहमति हो गई है। विधायक राठौर का परिवार है। इसलिए उनकी संन्यास की दीक्षा नहीं होगी। अखाड़े से जुड़ने के बाद उनका नाम भी महामंडेश्वर रविदासाचार्य सुरेश राठौर हो जाएगा।
सुरेश राठौर श्री रविदास विश्व पीठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष है और भाजपा के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम इस संस्था के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। सुरेश राठौर चंडीघाट पर एक भव्य मंदिर बनाने की मुहिम छेड़े हुए हैं। उन्होंने घाट पर एक मूर्ति भी रख दी थी। प्रशासन ने ऐतराज किया तो दुष्यन्त गौतम समेत कई भाजपा के दिग्गज उनके समर्थन में आ गए थे। राठौर ने 3 अप्रैल को जुलूस निकालने और शाही स्नान करने की घोषणा की थी। संत समाज इसके विरोध में आ गया था। इसी कड़ी में संतों सियासी लोगों ने यह समाधान निकाला कि विधायक को महा मंडलेश्वर बना कर शाही स्नान करने दिया जाय। यूं महामंडलेश्वर बनने के लिए पहले सन्यास लेने की परंपरा रही है।

राधे माँ का किस्सा याद आया

इस प्रकरण से विवादित साध्वी राधे मां का किस्सा ताज़ा हो गया है।उन्हें 2013 में जूना अखाड़े ने महामंडेश्वर बनाया था। कहा गया कि मोटी रकम लेकर उन्हें बिना सन्यास दीक्षा के पद देना धर्म विरुद्ध है। काफी हंगामे के बाद उन्हें निलंबित कर जांच बैठाई गई और फिर उन्हें स्थाई रूप से हटा दिया गया।

सियासी संत और भी हैं

यूं तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ , मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती, साक्षी महाराज जैसे कई संत साध्वी सियासत में हैं लेकिन महामंडलेश्वर कम ही हैं। स्वामी यतींद्रानंद, चर्चित चिन्मयानंद , साध्वी निरंजन ज्योति को भी महांडलेश्वर की उपाधि मिल चुकी है।

गृहस्थ  संत अखाड़े से बाहर होंगे

पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी की कार्यकारिणी की बैठक में संन्यास की दीक्षा लेने के बाद भी घर-परिवार से संबंध रखने वाले संतों को अखाड़े से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। कार्यकारिणी ने प्रस्ताव पारित कर ऐसे संतों की छानबीन शुरू कर दी है कि जिनका संन्यास की दीक्षा के बाद घर-परिवार से संबंध है। अखाड़े में करीब 150 संत और महंत हैं।सभी की संन्यास की दीक्षा हुई है। इसके बाद ही उनको पदों पर आसीन किया जाता है और अखाड़ा की संपत्ति पर अधिकार मिलता है। उन्होंने बताया कि पांच संतों के घर-परिवार से संबंध होने की बात सामने आई है।

कार्यकारिणी ने ऐसे संतों को अखाड़े से बाहर करने के प्रस्ताव पारित किया है। उन्होंने कहा कि दीक्षा संस्कार के बाद संतों का घर-परिवार की मोह माया छोड़नी पड़ती है। खुद का पिंडदान करना होता है। बैठक में श्रीमहंत दिनेश गिरि, श्रीमहंत मनीष भारती, श्रीमहंत राधेगिरी, श्रीमहंत रामरतन गिरि, श्रीमहंत ओमकार गिरि समेत कई संत मौजूद रहे

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