क्या बेजुबानों के जानलेवा जख्मों पर बेअसर हो रही हजारों करोड़ की वैक्सीन

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By आशीष आनंद

बेजुबान हैं। अपने पालकों की हर हाल में मदद का अहम सहारा बनते हैं। फिर भी उनके रिसते जख्मों की असहनीय तकलीफ लाइलाज सी हो रही है। यही नहीं, कई बार उनके सामने अपने ‘जिगर के टुकड़ों’ को तड़पकर मरते देखने की लाचारी भी है। सरकार हर साल हजारों करोड़ बहा रही है उनकी जिंदगी बचाने को, जिससे इंसानों की खिदमत करने वाली ये नस्लें खत्म न हों, लेकिन कोशिश और नतीजे कुछ और बयां कर रहे हैं।

ये बीमारी है खुरपका और मुंहपका, जो जुगाली करने वाले एक से ज्यादा खुर वाले जानवरों को होती है। मतलब गाय, भैंस, सुअर, बकरी, भेड़ बगैरा। फुट एंड माउथ डिजीज (एफएमडी) क्लोव्ड फुटेड एनिमल्स (आर्टियोडेक्टाइल) की एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है। बीमारी के वायरस के सात सेरोटाइप हैं, लेकिन भारत में तीन ‘ओ’, ‘ए’ और ‘एशिया वन’ ही पाए जाते हैं।

वायरस से संक्रमित होने वाले पशुओं के मुंह या पैर यानी खुर में दाने हो जाते हैं। ये दाने या छाले जख्म बनकर सडऩ और बेइंतहा दर्द का सबब बन जाते हैं। कई बार इनमें कीड़े भी पड़ जाते हैं। बेचैनी में जानवर खाना-पीना छोड़ देते हैं और असहनीय दर्द को झेलते हुए दम तोड़ देते हैं। वायरस जानवरों के शिशुओं के मुंह या पैर में नहीं, दिल पर छाले बना देता है और वे दिल के दौरा पडऩे से मर जाते हैं।

इस बीमारी से देश का बहुत बड़ा नुकसान हर साल हो रहा है, ये बात सरकार भी जानती है। इसी वजह से पिछले डेढ़ दशक से (2004 से) एफएमडी (फुट एंड माउथ डिजीज) की रोकथाम और नियंत्रण के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये वैक्सीनेशन पर खर्च किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने 2019 से 2024 के लिए 13 हजार 343 करोड़ रुपये टीकाकरण का बजट रखा है, जिसमें ब्रूसेल्ला बैक्टीरिया की रोकथाम भी शामिल है।

हर साल हजारों करोड़ का नुकसान

बेशक! वैक्सीनेशन से बहुत से रोग लुप्त हो चुके हैं, लेकिन यही कामयाबी मुंहपका और खुरपका बीमारी में नहीं मिल पा रही। अनुमान है कि सिर्फ इस बीमारी से पशुपालकों को सालाना तकरीबन 21 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

‘एस्टीमेशन ऑफ इकोनॉमिक लॉसेज ड्यू टू फुट एंड माउथ डिजीज इन इंडिया’ , ‘इकोनॉमिक इंपैक्ट ऑफ फुट एंड माउथ डिजीज इन इंडिया’ और ‘द इकोनॉमिक इंपैक्ट्स ऑफ फुट एंड माउथ डिजीज- व्हाट आर दे, हाउ बिग आर दे एंड व्हेअर दे डू अकर’ जैसे शोध के अलावा खुद आईसीएआर ने भी बीमारी से होने वाले नुकसान का अनुमान लगाया है।

कैसे? ‘बीमार पशु खा नहीं पाते और दूध कम या बंद कर देते हैं, जल्दी मर जाते हैं और मरने तक वजन भी काफी कम हो जाता है। न जीते जी उनसे लाभ और न मरने के बाद।’ आईवीआरआई में कई बार सम्मानित हो चुके किसान राजेंद्र गंगवार ने दुख जताते हुए कहा।

एमएससी बायोटेक राजेंद्र का कहना है, ‘इससे जैव विविधता के विस्तार का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है, क्योंकि लाखों पशु परागण करने की भूमिका से अलग हो जाते हैं, उल्टा वायरस संक्रमण के विस्तार को जन्म देते हैं। हर साल होने वाला वैक्सीनेशन अगर रोग को नियंत्रित नहीं कर पा रहा तो ये भी नुकसान ही है।’

वैक्सीन की खुराक ही पूरी नहीं

बिजनेस लाइन में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक औद्योगिक अनुमान है, भारत के एफएमडी नियंत्रण कार्यक्रम में हर साल 1000 मिलियन (एक अरब) खुराक की आवश्यकता होती है, जबकि वर्तमान उत्पादन केवल लगभग 500 मिलियन (जरूरत से आधा) है।

देश में प्रमुख वैक्सीन उत्पादक हैदराबाद स्थित इंडियन इम्युनोलॉजिकलस लिमिटेड है, जो एफएमडी वैक्सीन की दुनिया की सबसे बड़ी निर्माता कंपनी भी है, जिसमें प्रति वर्ष 360 मिलियन खुराक देने की क्षमता है।

वैक्सीन और वैक्सीनेशन पर सवाल

फुट एंड माउथ डिजीज वैक्सीनेशन को लेकर इंडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में महामारी डिवीजन के हेड व प्रधान वैज्ञानिक डॉ.भोजराज सिंह ने कई सवाल खड़े किए हैं।

सूचना के अधिकार से मिली जानकारी की बुनियाद पर उन्होंने अपने ब्लॉग ‘आजाद इंडिया’ और ‘रिसर्चगेट’ पर प्रकाशित शोध के जरिए सरकार की भूमिका, वैक्सीन निर्माण, गुणवत्ता जांच और टीकाकरण प्रक्रिया को दोषी माना है।

डॉ.सिंह कहते हैं, ‘असल में बीमारी के नियंत्रण के कार्यक्रम को भ्रष्टाचार की दीमक ने चाट लिया। सरकार, प्रधानमंत्री, संस्थान को कई बार पत्र भेजकर साक्ष्य भी दिए, लेकिन कोई असर नहीं है। कहने को भ्रष्टाचार हो ही नहीं रहा इस सरकार में।’

उनका कहना है कि आरटीआई से मिले जवाब के आधार पर पता चला है कि उत्तरप्रदेश में 2017 में वायरस प्रतिरोधकता की पहली कैटेगरी वाले जिलों में सिर्फ 34.7 प्रतिशत, दूसरी कैटेगरी के जिलों में 28.4 और तीसरी में 34.9 प्रतिशत प्रतिरोधकता रही।

इन्हीं तीन कैटेगरी में वर्ष 2018 में क्रमश: सिर्फ 31.6 प्रतिशत , 25.1 प्रतिशत और 33.3 प्रतिशत प्रतिरोधकता रही। इसी तरह पंजाब में 2018 में टीकाकरण के बाद रोग प्रतिरोधकता तीन कैटेगरी के जिलों में 39 प्रतिशत, 45.9 प्रतिशत और 38.1 प्रतिशत रही। जिलों की कैटेगरी पशुधन की संख्या के आधार पर बनाई गई।

टीकाकरण के बाद रोग प्रतिरोधकता जिलेवार डेटा का विश£ेषण के बाद पहला सवाल यही बनता है कि अगर सामूहिक रोग प्रतिरोधकता का प्रतिशत आधा भी नहीं है तो टीकाकरण कैसे सफल माना जाए?

आईवीआरआई के प्रिंसिपल साइंटिस्ट का शोध ‘फुट एंड माउथ डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम: करप्शन सिंडीकेट ऑफ इंडिया’ बताता है कि 60 प्रतिशत तक सामूहिक रोग प्रतिरोधकता हासिल किए बिना नियंत्रण संभव नहीं है।

70 प्रतिशत प्रतिरोधकता रोग प्रसार रोकने और 95 प्रतिशत प्रतिरोधकता प्रकोप को रोकने के लिए जरूरी है। तब वैक्सीनेशन की इस मुहिम का नतीजा क्या निकाला जाए? क्या वैक्सीनेशन कार्यक्रम का डिजायन गलत था? क्या कार्यक्रम गलत ढंग से लागू किया गया? या फिर बेजुबानों के नाम पर धनराशि का ‘बंदरबांट’ हुआ?

दिल्ली के अलावा सीरोकन्वर्जन क्या है ज्यादातर जगहों पर खराब मिला, जिसका मतलब या तो वैक्सीन गलत इस्तेमाल हुई या फिर वैक्सीनेशन की प्रक्रिया में खामी रही। क्या ऐसा भी संभव है कि वैक्सीन की गुणवत्ता एक जैसी नहीं थी?

आरटीआई से ये जानकारी भी मिली है कि भारत में हर साल मुंहपका खुरपका रोग नियंत्रण को 200 से ज्यादा वैक्सीन बैच बनाये जाते हैं और वर्ष 2012 से अब तक, पिछले सात सालों में सिर्फ 27 बैच को ही ‘औपचारिकता’ के अंदाज में जांचा गया है।

वैक्सीनेशन के बाद महामारी

हैरानी की बात ये है कि जहां टीकाकरण के बाद रोग प्रतिरोधकता मापने की जांच के बाद हालात अच्छे मिले, वहां बाद में रोग का आक्रमण भी ज्यादा सामने आया और जहां हालात खराब मिले, वहां रोग का प्रकोप ज्यादा दर्ज नहीं हुआ।

वर्ष 2018 में दिल्ली राज्य में सबसे ज्यादा (92 प्रतिशत) के बावजूद बड़ी संख्या में प्रकोप की घटनाएं सामने आईं, जबकि उत्तरप्रदेश, जहां सीरोकन्वर्जन महज 35 प्रतिशत रहा, वहां न के बराबर प्रकोप की घटनाएं दर्ज हुईं।

आंधप्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्य जो एफएमडी मुक्त घोषित हो चुके हैं और पंजाब, महाराष्ट्र जो मुक्त घोषित होने वाले हैं, वहां आउटब्रेक की रिपोर्ट को सरकारी व्यवस्था शायद दर्ज भी नहीं करती होगी। जबकि 2018 और 2019 में पूरे पंजाब में बीमारी फैली।

लुधियाना पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के फार्म पर, राष्ट्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान नाभा में भी आउटब्रेक हुआ। कुछ अरसे पहले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एफएमडी आउटब्रेक के मामले सामने आए। इसके अलावा हरियाणा के नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट करनाल में 60 मुर्राह भैंसों की मौत में भी संदिग्ध एफएमडी संक्रमण पाया गया।

एफएमडी का मानव जीवन पर असर

शव की खराब स्थिति के अलावा, एफएमडी वायरस-संक्रमित या टीकाकृत पशु मांस खाने से मनुष्यों को कोई खतरा नहीं है। लेकिन वैक्सीन में प्रिजर्व करने में एड्रोफ्लॉक्सेसिन का प्रयोग होता है, जो दूध और मांस के माध्यम से मानव शरीर में आने पर हड्डी के जोड़ों के लिगामेंट को कमजोर करता है।

कई बार इसका असर मिर्गी के दौरे पडऩे की शक्ल में भी दिखाई देता है। एड्रोफ्लॉक्सेसिन की निर्माता कंपनी ‘बेयर’ खुद ही चेतावनी देती है कि इसका प्रयोग 16 साल से कम उम्र के लोग न करें।

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