Wednesday, May 12, 2021
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आफताब-ए-सितार उस्ताद विलायत खां, जिन्होंने भारतीय सितार वादन शैली में नई जान फूंकी

सितार की धुन पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की धुन उपग्रह ‘वायजर’ में लगी डिवायस के साथ हमारे सौरमंडल से पार अंतरिक्ष में तैर रही है। ऐसी धुनों को नई शैली में तराशने और निखारने का काम किया उस्ताद विलायत खां ने।

उन्होंने सितार वादन को न सिर्फ गायकी अंग से जोड़ा, बल्कि सितार के सुरों में भी कई ऐसे बदलाव किए, जिसके बाद यह वाद्ययंत्र अब नए अवतार में नजर आता है। सितार के बजने पर अब ऐसा लगता है, जैसे कोई गा रहा है।

बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी बंगाल) के गौरीपुर में 28 अगस्त 1928 संगीतकार परिवार में पैदा हुए। उनके पिता उस्ताद इनायत खां अपने दौर के मशहूर सितार वादक होने के साथ वाद्य को विकसित करने वाले रहे।

कई पुश्तों से इस परिवार में संगीत बसा हुआ था। इनायत खां से पहले इसी उनके दादा इमदाद खां भी नामचीन रुद्रवीणा वादक थे।

विलायत खां ने ही कभी बताया था कि दादा इमदाद खां के ही मन में प्राचीन वाद्य वीणा सितार में तरब के तारों को जोड़ने का ख्याल आया, जिसे पिता इनायत खां ने पूरा किया। इस काम में उनकी मदद की वाद्य निर्माता कन्हाई लाल ने। सितार के ऊपरी हिस्से पर दूसरा तुंबा लगाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

विलायत खां ने सितार वादन की अलग गायन शैली विकसित की, जिसमें सुनने वालों को स्पष्ट अक्षरों के गायन होता महसूस होता है। वादन करते समय ‘दा’ के सुर की जगह ‘आ’ की ध्वनि साफ सुनी जा सकती थी। इसी को वादन में गायकी अंग का जुड़ना कहा गया। उन्होंने सितार के जोड़ी के तारों में से एक तार निकालकर पंचम स्वर का तार जोड़ा। एक और तार जोड़कर संख्या छह हो गई थी।

संगीत को उन्होंने इबादत की तरह जीया। मंच पर कामयाब प्रदर्शन को चुनौती की तरह लेकर पहले दुआ मांगते थे।

राष्ट्रपति फ़खरुद्दीन अली अहमद ने उन्हें “आफ़ताब-ए-सितार” का सम्मान दिया था। ये सम्मान पाने वाले वे एकमात्र सितार वादक थे।

उन्हें 1964 में ‘पद्मश्री’ और 1968 में ‘पद्मविभूषण’ सम्मान दिए गए, लेकिन उन्होंने ये सम्मान यह कहते हुए ठुकरा दिए कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान का समुचित सम्मान नहीं किया।


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उस्ताद विलायत खां ने शुरुआती संगीत शिक्षा पिता से ही ली। आठ वर्ष की उम्र में पहली बार उनके सितारवादन की रिकॉर्डिंग हुई। जब वे 12 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। फिर उनके चाचा वाहीद खां ने उन्हें सितार वादन की शिक्षा दी। नाना बंदे हुसैन खां और मामू जिंदे हुसैन खां गायन की शिक्षा की तालीम दी।

शुरू में विलायत खां का झुकाव गायकी में था, लेकिन उनकी मां ने खानदानी परंपरा आगे बढ़ाने को प्रोत्साहित किया। शायद यही वजह रही कि खानदानी परंपरा आगे बढ़ाने के क्रम में उन्होंने अपनी दिलचस्पी का मेल कर जो प्रयोग किया, वह नई शैली ही बन गया। सितार वादन के स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान अक्सर वे गाने भी लगते थे।

कहा जाता है कि 1993 में लंदन के रॉय फेस्टिवल हॉल में हो रहे एक कार्यक्रम में विलायत खां ने ‘राग हमीर’ के वादन के दौरान गायन भी पेश कर दिया था।

वे संभवतः भारत के पहले संगीतकार थे जिन्होंने भारत की आज़ादी के बाद इंग्लैंड जाकर संगीत पेश किया। साल में आठ महीने विदेश में बीतते थे और न्यूजर्सी उनका दूसरा घर जैसा बन गया था।


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कुछ मशहूर फिल्मों में भी उन्होंने संगीत दिया। सत्यजीत रे की 1958 में निर्मित बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’, 1969 में मर्चेंट आइवरी की ‘दि गुरु’ और फिर 1976 में मधुसूदन कुमार की हिंदी फिल्म ‘कादंबरी’ में उनका संगीत शामिल था।

विलायत खां ने दो शादियां कीं, जिसने वे दो बेटी और दो बेटों के पिता बने। दोनों बेटे, सुजात हुसैन खां और हिदायत खां, उनके भाई इमरात हुसैन खां और भतीजे रईस खां भी जाने माने सितार वादकों में शुमार हैं।

पांच दशक से भी ज्यादा वक्त तक सितार का जादू बिखेरने वाले विलायत खां को आखिर में फेफड़े के कैंसर ने चपेट में ले लिया। मुंबई के ‘जसलोक अस्पताल’ में 13 मार्च 2004 को उनका निधन हुआ। उनके पिता की कब्र के पास उन्हें दफनाया गया।

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