UP Politics : भाजपा में प्रदेश के नये मुखिया की दौड़ हुई तेज, रेस में ये नाम आगे, किस पर दांव खेलेगी सत्ताधारी पार्टी ?

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द लीडर। उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर तीन साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद स्वतंत्र देव सिंह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा चुके हैं। और देश के सबसे बड़े सियासी सूबे को नये नये प्रदेश अध्यक्ष का इंतजार है। साथ ही इंतजार इस बात का भी है की भाजपा अपने पुराने फॉर्मूले के तहत प्रदेश अध्यक्ष बनाती है या कुछ नया करती है।

यूपी की सियासत में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बनाने के 20 साल के सियासी पैटर्न को देखें तो किसी ब्राह्मण समुदाय के हाथों में कमान दिए जाने की सबसे ज्यादा संभावना दिख रही है। क्योंकि ऐसा देखा जा रहा है कि, विधानसभा चुनाव में ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष के चेहरे के साथ भाजपा चुनाव लड़ती आयी है।

अब तक इतने ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष रहे

इससे पहले देखा जाए तो 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान केशरीनाथ त्रिपाठी, 2009 चुनाव में रमापति राम त्रिपाठी, 2014 में लक्ष्मीकांत वाजपेयी और 2019 में महेंद्र नाथ पांडेय प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। इसी के चलते ब्राह्मण समुदाय के अध्यक्ष बनने की ज्यादा संभावना दिख रही है, क्योंकि नए अध्यक्ष के नेतृत्व में 2024 के लोकसभा चुनाव होना है।


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वहीं, पार्टी का 2024 के लोकसभा चुनाव में अस्सी की अस्सी सीटें जीतने का भी लक्ष्य है। इस वजह से सूबे के सियासी और जातीय समीकरण को देखते हुए दलित या ओबीसी समुदाय में में से किसी को संगठन की कमान सौंपने के कयास लगाए जा रहे हैं।

वैसे तो भाजपा में आजकल देखा गया है कि, ज्यादा अनुमान चलता नहीं है। और वहां चर्चित नामों को किनारे करके एक ऐसा नाम लाया जाता है जिसे शुरुआत में खुद भी यकीन नहीं होता कि, वो इस पद पर आसीन होने वाला है। लेकिन आम तौर से जो चर्चा चल रही है उसमें सबसे पहले बात ब्राह्मण चेहरों की ही कर लेते है।

ब्राह्मण समुदाय से इन नामों पर चर्चा तेज

उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष के लिए ब्राह्मण समुदाय से जिन नामों पर चर्चा तेज हैं, उसमें पूर्व उप डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा, पूर्व ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, कन्नौज के सांसद और प्रदेश महामंत्री सुब्रत पाठक, अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम, नोएडा के सांसद डॉ. महेश शर्मा और प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक को सबसे ज्यादा सुर्खियां मिल रही है।

पिछड़े वर्ग से केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर भी लग सकती है मुहर

ये तो रही ब्राह्मण भाजपा नेताओं की बात लेकिन अगर भाजपा फार्मूला बदलती है तो ओबीसी वर्ग को साधने के लिए ओबीसी अध्यक्ष भी बना सकती है। जिसमें अगर देखा जाए तो बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पिछड़े वर्ग से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर भी मुहर लग सकी है।

बीते दिनों केशव ने अपने दो दिवसीय दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की भी की थी। साथ ही केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में बीजेपी का 2017 में 325 सीटें जीतने का रिकॉर्ड है। इसलिए उनके नाम की चर्चा भी चल रही है, लेकिन साथ ही केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा और पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र सिंह चौधरी भी प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं।

बीएल वर्मा, भूपेंद्र सिंह चौधरी भी रेस में

केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा ओबीसी के लोध समुदाय से आते हैं, जो बीजेपी का कोर वोटबैंक माना जाता है। कल्याण सिंह के दौर से ही लोध बीजेपी के साथ है। ऐसे में बीएल वर्मा की चर्चा तेज है, जो रुहेलखंड से आते हैं। वहीं, भूपेंद्र सिंह चौधरी जाट समुदाय से आते हैं। जाट समुदाय से आने वाले दूसरे नेता व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के नाम की भी चर्चा है। इसके अलावा प्रदेश संगठन में महामंत्री का पद संभाल रहे अमरपाल मौर्य का नाम भी प्रदेश अध्यक्ष की रेस में है।

उत्तर प्रदेश में बीते चुनावों में देखा गया है कि, दलित वर्ग ने भी बीजेपी का खुलकर समर्थन किया है। और मायावती के गिरते जनाधार के बीच इस समुदाय से कोई नेता चुनना भी एक विकल्प हो सकता है। बीजेपी लगातार दलित वोटों पर फोकस कर रही है।

दलित चेहरे के तौर पर ये हो सकते हैं दावेदार

ऐसे में दलित चेहरे के तौर पर केंद्रीय मंत्री भानु प्रताप सिंह वर्मा, कौशांबी के सांसद विनोद कुमार सोनकर, एमएलसी लक्ष्मण आचार्य और इटावा के सांसद राम शंकर कठेरिया को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है। इस तरह बीजेपी किसी दलित को प्रदेश की कमान सौंप कर बड़ा सियासी संदेश दे सकती है।

बीजेपी ने पहले गैर-जाटव दलितों को साधने में सफल रही है। तो अब जाटव वोटों में सेंधमारी के लिए लगातार कवायद कर रही है। ऐसे में बीजेपी की नजर 2024 के लोकसभा चुनाव पर है। जिसे चलते सियासी समीकरण बनाने के लिए पार्टी किसी दलित पर दांव खेल सकती है।

किसी महिला प्रदेश अध्यक्ष की भी बन रही उम्मीद

साथ ही एक उम्मीद किसी महिला प्रदेश अध्यक्ष की भी बन रही है। क्योंकि भाजपा को ये अच्छे से पता है कि, अगर जातीय समीकरण के साथ महिलाओं का पूरा साथ अगर मिलता है तो लोकसभा में 80 की 80 सीटें जितना भी कोई बड़ी बात नहीं होगी।


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