द लीडर : हिंदू-मुसलमान और इतिहास के नवनिर्माण के रसपान के बीच अगर फुर्सत मिले तो, अदालतों के दो फैसलों पर गौर जरूर कीजिएगा! इसलिए क्योंकि भारत में शहीदे आजम भगत सिंह की किताबें पढ़ने-रखने पर सुरक्षा एजेंसियां किसी छात्र को नक्सली बताकर सालों के लिए जेल में डाल सकती हैं. और घी-खिदमत शब्द लिखने-बोलने वाले मुसलमान को आतंकी बताया जा सकता है. ऐसा हुआ है. अदालत में इन पर बहसें हुईं. और दोनों मामलों में जेल में बंद आरोपी बरी हुए हैं. (Bhagat Singh Tribal Muslim)
पहला केस कर्नाटक का है, जिसमें पत्रकारिता के आदिवासी छात्र वित्तला मालेकुड़िया और उनके पिता लिंगप्पा मालेकुड़िया को 9 साल जेल में बिताने पड़े हैं. सिर्फ इस बात के लिए कि 2012 के चिंगमंगलूर संसदीय उप-चुनाव के दौरान छात्र वित्तला ने स्थानीय प्रशासनिक अफसरों को एक पत्र लिखा था. जिसमें कहा अगर, आदिवासियों की मांगें नहीं मानीं तो, वे चुनाव का बहिष्कार करेंगे.
इस विरोध का अंजाम ये हुआ कि पुलिस ने उनके घर पर छापा मारा. जहां से भगत सिंह की कितबें, अखबारों के लेख कब्जा लिए. और इन्हीं की बिनाह पर उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA)का मामला दर्ज करके, दोनों बाप-बेटों को जेल में डाल दिया. इस दावे के साथ कि, इन्होंने प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पीपुल्स वॉर के लोगों को अपने घर में ठिकाना दिया था.
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मैंगलुरू की सेशन कोर्ट के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीबी जकाती ने गुरुवार को दोनों बाप-बेटों को यूएपीए और देशद्रोह के आरोपों से बरी कर दिया है. ये कहते हुए कि भगत सिंह की किताब और अखबारों की कटिंग रखने पर कानूनन कोई पाबंदी नहीं है. इससे प्रतिबंधित संगठनों के साथ उनके रिश्ते साबित नहीं होते हैं. (Bhagat Singh Tribal Muslim)
इस तरह अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण 9 साल जेल में बिताकर वित्तला मालेकुड़िया और उनके पिता लिंगप्पा मालेकुड़िया जेल से बाहर आ रहे हैं. लेकिन इन्हें किस बात की सजा मिली? उन भगत सिंह के विचारों को पढ़ने की, जिन्होंने भारत की आजादी के लिए महज 24 साल की उम्र में फांसी का फंदा चूम लिया. क्या भगत सिंह को पढ़ना देशद्रोह है? ऐसा तो नहीं कि नए भारत में भगत सिंह के विचार अप्रासंगिक हो रहे हैं या किए जा रहे हैं?
अब दूसरा केस भी देख लीजिए. हरियाणा के पलवल इलाके में इटावर एक जगह है, जहां खुलफा-ए-राशिदीन मस्जिद बनाई जा रही थी. मस्जिद परिसर में ही तब्लीगी जमात का सबसे बड़ा मरकज बनाया जा रहा है. जुलाई 2018 में नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA)ने यहां छापा मारा. इस आरोप के साथ कि मस्जिद आतंकी फंडिंग से बनाई जा रही है.
एनआइए ने मुहम्मद सलमान, मुहम्मद सलीम, आरिफ गुलाम बशीर धर्मपुरिया और मुहम्मद हुसैन मौलानी को पाकिस्तान के आतंकी संगठन आइएसआइ से फंड लेने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. तब से ये जेल में हैं. (Bhagat Singh Tribal Muslim)
एनआइए ने मुहम्मद सलमान के फोन के दो मैसेज को चार्जशीट में शामिल किया. जिसमें एक मैसेज है कि, ‘घी’ का इंतजाम हो गया है. बॉम्बे वाली पार्टी ले जाएगी…उनके हाथ भिजवा देंगे. दूसरा मैसेज था: ‘आप खिदमत में थे, इसलिए आपको मालूम नहीं है.’
एनआइए ने घी और खिदमत को आतंकी भाषा का कोडवर्ड बताया. इस दावे के साथ कि ये आतंकियों को संसाधन मुहैया कराने की बात कर रहे थे. एनआइए की स्पेशल कोर्ट के जज प्रवीण सिंह ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया. ये कहते हुए कि, इन शब्दों के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है. इनके दूसरे अर्थ भी निकलते हैं. इसलिए एनआइए के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
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एनआइए के वकील ने अपनी दलीलों से कोर्ट में ये साबित करने की भरसक कोशिश की कि इन शब्दों का अर्थ विस्फोटक भी हो सकता है. लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन्हें बिना सबूत के विस्फोटक से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है. और इतने भर से आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. (Bhagat Singh Tribal Muslim)
खुलफा-ए-राशिदीन मस्जिद पर टेरर फंडिंग के आरोप की जांच के लिए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष जफरुल इस्लाम ने एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई थी. इस जांच दल का हिस्सा रहे सुप्रीमकोर्ट के अधिवक्ता अबु बकर सब्बाक ने द लीडर को बताया कि, एनआइए ने बुनियादी प्रक्रियाओं तक का पालन नहीं किया. और एक मनगढ़ंत कहानी लिखी थी. शुक्र है कि अल्पसंख्यक आयोग की जांच में उन तमाम तथ्यों को सामने रखा गया, जो आरोपियों की बेगुनाही का आधार बने.
इन दोनों घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आदिवासी और अल्पसंख्यक-मुसलमानों को लेकर एजेंसियों किस तरह से काम करती हैं. उनकी सामान्य चीजों और बातचीत को भी नक्सली और आतंकी से जोड़कर पेश करने की कोशिशें होती हैं. जैसा कि इन दोनों मामलों में सामने आया है. (Bhagat Singh Tribal Muslim)





