यूपी में मुस्लिम मतदाताओं का रुख़ समाजवादी पार्टी के लिए ख़तरे की घंटी

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द लीडर हिंदी: यूपी के निकाय चुनाव को 2024 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइल माना जा रहा था. उसे सामने रखते हुए ही प्रमुख दलों ने तैयारी की. भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहा है और ऐसा चुनाव से पहले माना भी जा रहा था लेकिन प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के खेमे में उसके प्रत्याशियों के प्रदर्शन से मायूसी झलक रही है.

ख़ासतौर से सपा के साथ रहने वाले मुस्लिम मतदाता इस बार बिखर गए. रुहेलखंड जैसी उपजाऊ बेल्ट में सपा को भारी नुक़सान का सामना करना पड़ा है. बरेली से लेकर मुरादाबाद तक न सिर्फ प्रत्याशी हार गए बल्कि वोट ऑफ परसेंट भी घटा है.

बरेली की बात करें तो इस बार सपा समर्थित उम्मीदवार डॉ. आइएस तोमर 56,326 वोट से हारे हैं. पिछली बार हार का अंतर 12,784 था. तब सपा को 1,26, 343 वोट मिले थे और इस बार सपा 1,10, 943 वोट पा सकी. 2017 के चुनाव में बरेली नगर निगम के 28 वार्डों से सपा पार्षद जीतकर आए थे, अब महज़ 13 ही जीत सके हैं.

इसके बरख़िलाफ़ 2017 में कांग्रेस का एक पार्षद जीता था और वो भी सपा में शामिल हो गया था लेकिन इस बार तीन जीतकर आए हैं. महापौर के लिए क़िस्मत आज़मा रहे डॉ कुलभूषण त्रिपाठी को अंडर स्टीमेट किया जा रहा था लेकिन 26,975 वोट मिल गए. चौथे नंबर पर बसपा और पांचवें पर एआइएमआइएम के प्रत्याशी रहे. कांग्रेस को बरेली में सिरौली नगर पंचायत की सीट भी मिल गई.

शाहजहांपुर और मुरादाबाद जैसे सपा का गढ़ मानी जाने वाले महापौर की सीटों पर भाजपा का मुक़ाबला कांग्रेस से हुआ. दोनों जगह कांग्रेस उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे. मुरादाबाद में तो सपा चौथे स्थान पर खिसक गई.

रामपुर के मुस्लिम मतदाताओं ने तो सपा ठुकराकर आम आदमी पार्टी को चुन लिया. सपा का यह प्रदर्शन साफतौर से निशानदेही कर रहा है कि उसके वोटबैंक में सेंध लग रही है. दूसरे लफ़्ज़ों में यह भी कह सकते हैं कि मुस्लिम वोटरों का वो भरोसा टूट रहा है, जो नेताजी मुलायम सिंह यादव के रहते क़ायम हुआ और जिन्हें मुसलमानों से लगाव की वजह से मुल्ला मुलायम कहा जाने लगा. यह भरोसा निकाय चुनाव से पहले तक बना हुआ था.

ज़ाहिर सी बात है कि मुस्लिम वोटरों की सोच का यह बदलाव सपा के लिए ख़तरे की घंटी है. तब जबकि लोकसभा का चुनाव नज़दीक है. कांग्रेस के बड़े नेता निकाय चुनाव के प्रचार से नदारद रहे लेकिन मुस्लिम मतदाताओं ने फिर भी भरोसा जताते हुए उसके हक़ में वोट किया. अब ज़ाहिर सी बात है कर्नाटक की जीत और निकाय चुनाव का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए वोट बैंक वापस लौटने की दस्तक है.