बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण प्रक्रिया को पलटा, क्या अब खत्म होगी हिंसा?

द लीडर हिंदी : बांग्लादेश में बड़े स्तर पर हो रहे हिंंसक प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण पर हाईकोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया है. कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण के हाई कोर्ट के फैसले को पलटा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 7 फीसदी आरक्षण रहेगा. यानी आरक्षण बना रहेगा लेकिन इसकी सीमा कम कर दी गई है. बतादें आरक्षण के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि लगभग सभी सरकारी नौकरियां योग्यता के आधार पर दी जानी चाहिए. हाई कोर्ट ने इस साल पांच जून को एक याचिका के आधार पर साल 2018 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण रद्द करने संबंधी सरकार की अधिसूचना को अवैध करार दिया था. जिसपर बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण सिस्टम पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही थी. सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब आरक्षण सुधारों को लेकर बांग्लादेश में हिंसक झड़पें हो रही हैं.

इन हिंसक झड़पों को देखते हुए सरकार ने शुक्रवार की रात ही कर्फ़्यू लगा दिया था. बांग्लादेश में हो रहे इस पूरे प्रदर्शन के केंद्र में है, सरकारी नौकरियों में 30 फ़ीसदी का वो आरक्षण जो बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वालों के बच्चों को दिया जाता है.यूनिवर्सिटी के छात्र बीते कुछ दिनों से 1971 के मुक्ति युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का विरोध कर रहे थे.1971 में पाकिस्तान से आज़ादी की जंग लड़ने वालों को यहां मुक्ति योद्धा कहा जाता है. देश में एक तिहाई सरकारी नौकरियां इनके बच्चों के लिए आरक्षित हैं.बांग्लादेश में हिंसक झड़पों को रोकने के लिए सेना की तैनाती भी की गई है. अटॉर्नी जनरल ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए एक आवेदन दायर किया था.इस आवेदन में छात्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच वकीलों को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान बोलने की अनुमति दी गई थी.

भाग लेने वाले नौ वकीलों में से आठ ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटने का समर्थन किया, जबकि एक ने आरक्षण सुधारों की वकालत की.2018 में, सरकार ने शुरू में प्रथम और द्वितीय श्रेणी की नौकरियों के लिए आरक्षण प्रणाली को रद्द कर दिया था, जिसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे.बाद में हाई कोर्ट ने 5 जून को सरकार के फ़ैसले को अवैध घोषित कर दिया था, जिसके बाद कोटा सुधारों की मांग को लेकर छात्रों ने फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था.बांग्लादेश में आंदोलनकारी सरकारी नौकरियों में आरक्षण रद्द कर सिर्फ़ पिछड़ी जातियों के लिए अधिकतम पांच फ़ीसदी आरक्षण जारी रखते हुए आरक्षण व्यवस्था में संशोधन की मांग कर रहे हैं.आपको बताते चले कि साल 2018 में आरक्षण रद्द करने की अधिसूचना जारी होने से पहले तक सरकारी नौकरियों में मुक्ति योद्धा (स्वाधीनता सेनानी), ज़िलावार, महिला, अल्पसंख्यक और विकलांग—इन पांच वर्गों में कुल 56 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान था.

Abhinav Rastogi

पत्रकारिता में 2013 से हूं. दैनिक जागरण में बतौर उप संपादक सेवा दे चुका हूं. कंटेंट क्रिएट करने से लेकर डिजिटल की विभिन्न विधाओं में पारंगत हूं.

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