वो कवि और संत, जिन्हें सरकार खतरा मानती है

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रिज़वान रहमान

मुंबई की तलोजा जेल में बंद दो बुजुर्ग कैदी। एक कवि हैं और दूसरे संत। कवि का नाम है वरवर राव और संत का फादर स्टेन स्वामी।

सरकार ने दोनों को भीमा कोरेगांव हिंसा और प्रधानमंत्री का जान से मारने की साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया है। उन पर माओवादी गतिविधि में संलिप्त होने का आरोप है। इस मामले में हुई 16 गिरफ्तारी में, वरवर राव और स्टेन स्वामी के अलावा गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबड़े, सुधा भारद्वाज, शोमा सेन जैसे दूसरे मानवअधिकार कार्यकर्ता, शिक्षक, वकील, शोधकर्ता, लोकगायक बंद हैं।

80 वर्ष से ज्यादा उम्र के वरवर राव जनकवि हैं, शिक्षक हैं। उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। सुरक्षा तंत्र का आरोप है कि वे प्रधानमंत्री की हत्या के साजिश में लिप्त थे। उन्हें यूएपीए के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

इसी  तरह 83 साल के स्टेन स्वामी पर भी भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा का आरोप है। वो भी तलोजा जेल में यूएपीए के तहत बंद हैं। जांच एजेंसियों का दावा है कि भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा में उनके खिलाफ सबूत मिले हैं और उनके संबंध प्रतिबंधित सीपीआई माओवादी संगठन से हैं।

स्टेन स्वामी आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष के चलते चर्चा में रहे हैं। जल-जंगल-जमीन की लूट के खिलाफ लगातार लिखते बोलते रहे हैं। उन्होंने अपने लेखों के जरिए बताया है कि किस तरह बड़ी-बड़ी कंपनियां आदिवासियों को उजाड़ने में लगी हैं, उनकी जमीनें हड़प रही हैं।

किस्सा मुख्तसर: वरवर राव और स्टेन स्वामी

आजादी के दिवाने बेंजामिन मॉलेस की याद में लिखी गई वरवर राव की कविता ‘कवि’, एक तरह से उनकी आत्मकथा भी है। अवाम को मुट्ठी तानने का हौसला देने वाले राव, मॉलेस की याद में लिखते हैं…कब डरता है दुशमन कवि से?/ जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं/ वह कैद कर लेता है कवि को/ फांसी पर चढ़ाता है/ फांसी के तख्ते के एक ओर होती है सरकार/ दूसरी ओर अमरता/ कवि जीता है अपने गीतों में/ और गीत जीता है जनता के हृदय में…

वरवर राव जब अपने हैदराबाद के घर से जेल की तरफ बढ़ रहे थे, कैमरे में कैद हुई उनकी मुट्ठी ताने हुए तस्वीर उनके जीवट को दिखाती है। वरवर राव के लिए यह कोई नई घटना नहीं थी। उन्होंने अपने जीवन के पचास साल जेल, धमकी, फर्जी मुकदमों के बीच ही गुजारे हैं। लेकिन अब उनकी उम्र 80 की दहलीज पार कर चुकी है। शरीर कई तरह की बीमारियों से जूझ रहा है।

उनकी रिहाई के लिए अदालत में कई अर्जी भी डाली गईं, लेकिन सब नामंजूर हुईं। वरवर राव अपनी ही कविता में लिखते हैं… हमारी आकांक्षाएं ही नहीं/ कभी कभी हमारे भय भी वक़्त होते हैं/ बातों की ओट में/ छुपे होते हैं मन की तरह/ लेकिन वह दुशमन को बताने से नहीं चूकते: मैंने बम नहीं बांटा था/ ना ही विचार/ तुमने ही रौंदा था चीटियों के बिल को/ नाल जड़ी हुई जूतियों से/ तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा/ मधुमक्खियों के छत्तों पर तुमने मारी थी लाठी/ अब अपना पीछा करती मधुमक्खियों की गूंज से/ कांप रहा तुम्हारा दिल…

फादर स्टेन स्वामी पार्किसन भी कई तरह की बीमारियों से जूझ रहें हैं। कैंसर के उपचार में तीन सर्जरी झेल चुके हैं। हाथ कांपने की वजह से गिलास तक नहीं उठा सकते। चाय पीने के लिए स्ट्रा का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए उन्होंने जेल प्रशासन से स्ट्रा और सीपर की मांग की थी, जिसे अधिकारियों ने नकार दिया।

अदालत में इस पर बहस की लंबी प्रक्रिया चली जिसके दौरान जांच एजेंसी एनआईए ने तो यहां तक कह दिया कि हमारे पास स्टेन स्वामी को देने के लिए स्ट्रा और सिपर नहीं है। इस पर स्टेन स्वामी तनिक विचलित नहीं होते हैं।

उन्होंने जेल से पत्र लिखा, ‘वरवर राव, वर्नोन गोंजाल्वेस, अरुण फरेरा दूसरे सेल में हैं। हम एक दूसरे से दिन में सेल और बैरक खोले जाने के समय मिलते हैं। मैं कोठरी के लॉकअप में शाम के साढ़े पांच बजे से सुबह छह बजे और दोपहर के बारह बजे से शाम के तीन बजे तक दो कैदियों के साथ बंद रहता हूं। अरुण मेरी मदद नाश्ता और दोपहर का खाना खिलाने में करते हैं और वर्नोन गोंजाल्वेस मेरी मदद नहाने में करते हैं।’

‘मेरे साथ के दोनों कैदी रात में खाना खाने, कपड़े धोने में मेरी मदद तो करते ही हैं, वे मेरे घुटनों के जोड़ों की मालिश भी कर देते हैं। दोनों बहुत ही गरीब परिवार से हैं। आप अपनी दुआओं में मेरे कैदी साथी और सहयोगियों को याद रखें। साथियों, तलोजा जेल में सभी बाधाओं के बावजूद मानवता तरंग भर रही।” लंबे अंतराल के बाद पिछले दिन ही उन्हें स्ट्रा और सीपर मुहैया करा दिया गया।’

फादर स्टेन स्वामी को पहले से ही पता था, एक दिन पुलिस वाले आएंगे, इसलिए वे कहा करते थे, “मेरा बैग पैक है और मैं जाने को तैयार हूं.”

हिंसा के बाद हुई कानूनी कार्रवाई

इन तमाम गिरफ्तारियों के जड़ में 8 जनवरी 2018 को आईपीसी की धाराएं 117, 153, 505, में दर्ज की गई एफआईआर है। एफआईआर में कबीर कला मंच के 6 सदस्य सुधीर धावले, सागर गोरखे, हर्षाली पोतदार, रमेश गायचोरे, दीपक धेंगले और ज्योति जगतप का नाम था। इससे 6 दिन पहले 2 जनवरी 2018 को हिंदूवादी संगठन के नेता सांभाजी राव भिड़े और मिलिंद एकबोटे के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज हुई थी।

तफ्तीश दूसरी एफआईआर केंद्रित हो गई। यूएपीए की धाराएं जोड़ते हुए पुणे पुलिस का देश के विभिन्न शहरों में सर्च ऑपरेशन हुआ। इस संबंध में अगस्त 2018 में मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर और दूसरे बुद्धिजिवियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने मांग की थी कि पुणे पुलिस के आरोपों के मद्देनजर अलग जांच बैठाई जाए, लेकिन 3 जज की बेंच ने ऐसा करने से इंकार कर दिया।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की राय बहुमत से अलग थी। आगे चलकर पुणे पुलिस ने भीमा कोरेगांव केस में पहली चार्जशीट नवंबर 2018 और सप्लिमेंटरी चार्जशीट फरवरी 2019 में दाखिल की। इसके बाद जनवरी 2020 में यह केस पुणे पुलिस के हाथ से लेकर एनआईए को सौंप दिया गया। एनआईए ने एक दूसरी चार्जशीट अक्टूबर 2020 में दाखिल की।

चार्जशीट में यह साबित करने की कोशिश की गई कि तमाम आरोपियों का संबंध माओवादियों से है। इसके लिए सबूत के तौर पर आरोपियों से बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, माओवादी साहित्य और अहस्ताक्षरित पत्र को स्थापित किया गया है। खास बात है कि ये पत्र हस्तलिखित न होकर टाइप किए हुए हैं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश चंद्रचूड़ ने भी सवाल उठाए हैं।

 

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