चीन से मंगवाया पेपर, फिर छापे हूबहू 500 के नोट, पुणे में जाली नोट छापने वाले गिरोह का पर्दाफाश

द लीडर हिंदी : महाराष्ट्र के पुणे शहर के पास नकली नोट छापने वाली फैक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ है. जहां जाली 500 रुपये के नोट छापने का अवैध धंधा चल रहा था.चीन से पेपर मंगाकर नक़ली नोट छापने में छह लोगों को पुलिस ने गिरफ़्तार किया है. दरअसल पिंपरी-चिंचवड पुलिस ने नकली नोट छापने वाले एक गिरोह का पर्दाफाश किया है. आरोपी नकली नोट ऑफसेट मशीन की मदद से छाप रहे थे. इन्हें बेचने के दौरान गिरोह का पर्दाफाश हो गया.

मिली जानकारी के मुताबिक देहू रोड पुलिस ने जाली नोट बनाने वाले गिरोह के छह सदस्यों को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ कर रही है.बता दें पहले इन आरोपियों ने अलीबाबा वेबसाइट से नक़ली करेंसी का पेपर मंगाया. सभी युवा हैं. जल्द अमीर बनने की कोशिश में वो ट्रैक से उतर गए. उनके पास प्रिंटिंग प्रेस था ही .उसमें नक़ली नोट छापने का आइडिया आया. उसे मूर्त रूप देने के लिए अलीबाबा वेबसाइट पर ऑर्डर डालकर चीन से बढ़िया क्वालिटी का पेपर मंगाया.

यूट्यूब देखने के बाद 500 के नोटों का हूबहू डिज़ायन तैयार किया. इसके बाद नोट छापने शुरू कर दिए. सब ठीक रहा लेकिन बात पुलिस तक पहुंच गई. पुणे की पिंपरी-चिंचवड़ पुलिस ने नक़ली नोट छापने में लगे छह युवकों को पकड़ने के लिए जाल बिछाया. देहुर रोड पर किराए की दुकान पर छापा मारा. फेक करेंसी छापने वाले गिरोह के छह सदस्यों को पकड़ लिया गया. उनके नाम रितिक चंद्रमणि खडसे (22 साल), सूरज श्रीराम यादव (41 साल), आकाश विराज धंगेकर ( 22 साल), सुयोग दिनकर सालुंखे (33 साल), तेजस सुकदेव बल्लाल (19 साल) और प्रणव सुनील गवने (30 साल) हैं. इसमें रितिक ने आईटी में डिप्लोमा कर रखा है और एक कंपनी में नौकरी भी करता है. उसी ने किराये की दुकान में प्रिंटिंग प्रेस लगा रखा है.

प्रेस चल नहीं पाया तो नक़ली करेंसी छापने का आइडिया आया. तब सूरज ने 500 के नोट का डिज़ायन तैयार करने की ज़िम्मेदारी ली. इस तरह 500 के नोटों की 70 हज़ार रुपये की करेंसी तैयार कर ली. पुलिस सभी को पकड़ने के बाद अब इस धंधे के और लिंक भी तलाश कर रही है.

आरोपियों में से एक ने कर रखा आईटी में डिप्लोमा
बता दें आरोपी रितिक ने आईटी में डिप्लोमा किया हुआ है. वह एक निजी कंपनी में काम करता है. आरोपी ने प्रिंटिंग व्यवसाय चलाने के लिए पुणे के दिघी इलाके में एक दुकान किराए पर ली थी. इसके बाद एक पुरानी प्रिंटिंग मशीन खरीदी, लेकिन प्रिंटिंग का काम नहीं मिला और बड़ा घाटा होने लगा. हालत यह हो गए कि दुकान का किराया भी निकलना मश्किल हो गया था.

Abhinav Rastogi

पत्रकारिता में 2013 से हूं. दैनिक जागरण में बतौर उप संपादक सेवा दे चुका हूं. कंटेंट क्रिएट करने से लेकर डिजिटल की विभिन्न विधाओं में पारंगत हूं.

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