मजरूह सुल्तानपुरी मुशायरे के मंच से सदाबहार नग्मों के सुल्तान बनने तक

नवीन पांडे


मजरूह सुल्तानपुरी और रामपुर. आपने रेडियो सुना है तो ये आवाज़ आपने जरूर सुनी होगी…यह आकाशवाणी है…और अब आप फिल्मी गीतों का कार्यक्रम… सुनिये. इस गीत को लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने। एक ऐसा गीतकार जिसका नाम ही काफी है. आप सोच रहे होंगे कि मजरूह सुल्तानपुरी का रामपुर से क्या नाता है तो सुनिये. बचपन में मनोरंजन के लिए टीवी था पर रेडियो का भी अपना आकर्षण था. विविध भारती से हरीश भिमानी की मखमली आवाज़ और फरमाइश वाले फिल्मी नग्में! (Majrooh Sultanpuri Song Poetry)

कितने सुनहरे थे वो दिन. अब तो बस यादें ही हैं. इन गीतों के बीच कभी कभी रेडियो पर “रामपुर का बासी हूं मैं लछमन मेरा नाम/सीधी सीधी बोली मेरी सीधा-साधा काम. बजता तो अपने शहर का नाम आता देख मन में खुशी होती कि अपने शहर का नाम आया, तब पता चला कि इस गीत को लिखा है जनाब मजरूह साहब ने, जो सुल्तानपुर के रहने वाले हैं.

सुल्तानपुर भी उत्तर प्रदेश का ही ज़िला है. वैसे इस गीत की फ़िल्म का नाम भी “रामपुर के लछमन” है जो मैं आजतक नहीं देख पाया. खैर छोड़िये, बात मजरूह साहब की चल रही है तो बता दें आज उनकी पुण्यतिथि है. आपने अपने जीवन में 362 फ़िल्मों में 2318 गीत लिखे. मुशायरों में भी उनको खूब मकबूलियत हासिल हुई.

हृतिक रोशन की फ़िल्म” कहो न प्यार है” व कृश के गीतकार विजय अकेला द्वारा सम्पादित किताब “रहें ना रहें हम महका करेंगे” को आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि आपके, आपसे पहले की दो पीढ़ियां, जिन गीतों को गुनगुना रही हैं, उनमें ज़्यादातर गीत मजरूह साहब ने लिखें हैं. यह किताब उनकी सौवी सालगिरह साल 2019 को शाया हुई.

मजरूह साहब के गीतों की रेंज व्यापक है मोहब्बत हो या फिर विद्रोह, दुःख हो या फिर खुशी सभी जोनर के गीत आपको उनके खज़ाने में मिलेंगे. मिसाल के तौर पर “जब दिल ही टूट गय”, मेरे सपनों की रानी, बाबूजी धीरे चलना, ये लो मैं हारी पिया, चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का ख़ुदा जाना, तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते, अंग्रेजी में कहते हैं कि आय लव यू, सबकी बारातें आईं डोली तू भी लाना, सुनता है मेरा ख़ुदा…. आदि तमाम नग्में हैं जो सदा लोगों के होंटों पर सजतें रहेंगे. (Majrooh Sultanpuri Song Poetry)

मजरूह सुल्तानपुरी यानी असरार उल हसन ख़ान की ये नज़्म “अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया” कौन भूल सकता है. सोचा आज उनकी पुण्य तिथि है तो कुछ लिख ही दिया जाए ताकि आप भी उनके गीतों को शायद गुनगुना ही दें……मजरूह सुल्तानपुरी साहब की याद में…….. शुक्रिया (विजय अकेला साहब का आभार, जो इतनी बेहतरीन किताब तैयार की जिससे ऐसे मकबूल गीतकार के बारे में जानने को मिला.)


मजरूह सुल्तानपुरी की याद में ये लेख नवीन पांडेय ने लिखा है. उनके ब्लॉग से साभार-यहां प्रकाशित है.

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