पटना से उत्तर बिहार को जोड़ने वाला भारत का सबसे लंबा स्टील ब्रिज ‘महात्मा गांधी सेतु’ नए रूप में बनकर तैयार

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द लीडर। बिहार की राजधानी पटना से उत्तर बिहार को जोड़ने वाले महात्मा गांधी सेतु को कभी एशिया के सबसे बड़े पुल के नाम से जाना जाता था. अब इस पुल ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है.

महात्मा गांधी सेतु नए रूप में 5.575 किलोमीटर तक दो लेन में बनकर तैयार है जो स्टील से बना है. अब भारत के सबसे लंबे स्टील ब्रिज के रूप में इसकी पहचान बनी है.


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महात्मा गांधी सेतु की जर्जर स्थिति होने के बाद नवंबर 2017 में स्टील ब्रिज बनाने के निर्णय के बाद काम शुरू हुआ था. जुलाई 2020 में पश्चिमी लेन का काम पूरा हो चुका था और उस पर गाड़ियां दौड़ने लगीं.

एक ही लेन पर दोनों ओर की गाड़ियां चलने लगीं जिसके कारण जाम की समस्या थी, लेकिन अब 17 महीने के बाद पूर्वी लेन भी बनकर तैयार हो गया है. अब गांधी सेतु पर लोगों को जाम से छुटकारा मिल जाएगा. पूर्वी लेन का शुभारंभ सात जून को होना है, जिसका उद्घाटन केंद्रीय पथ निर्माण मंत्री नितिन गडकरी करेंगे.

कोरोना काल में भी चलता रहा निर्माण कार्य

यह पुल पूरी तरह स्टील से बना हुआ है, लेकिन पाया का संरचना पुराना है. पटना प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता बीरेंद्र कुमार ने बताया कि 1742 हजार करोड़ की लागत से यह ब्रिज बना है. इसमें 66360 मीट्रिक टन स्टील का उपयोग किया गया है और 25 लाख टन नट-बोल्ट लगे हैं.

लगभग 11 सौ वर्कर ने 24 घंटे काम कर इस पुल का निर्माण किया है. इस नए निर्माण किए गए स्टील ब्रिज की लाइफ 100 साल की है. मेंटेनेंस की अवधि 15 से 20 साल की है. इंजीनियर वीरेंद्र ने बताया कि पुल निर्माण के लिए कोरोना काल में भी सभी वर्कर काम में लगे रहे. किसी को छुट्टी नहीं दी गई थी.

एशिया का सबसे बड़ा पुल रहा है गांधी सेतु

पटना के गायघाट से हाजीपुर तक के लिए लगभग पौने 6 किलोमीटर लंबे इस पुल का उद्घाटन मई महीने में साल 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था. उस वक्त यह पुल एशिया का सबसे लंबा पुल था.

बिहार में राजधानी पटना से उत्तर बिहार जाने के लिए यही एक पुल था, लेकिन राज्य सरकार द्वारा रखरखाव सही से नहीं हुआ तो पुल की हालत जर्जर हो गई. आए दिन यह पुल मीडिया की सुर्खियों में रहता था. अब केंद्र सरकार और राज्य सरकार के सहयोग से नए रिकॉर्ड के साथ यह तैयार हो गया है.


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