हाशिमपुरा नरसंहार : 42 मुसलमानों को PAC ने गोली मारी-आज 35वीं बरसी है, क्या कुछ बदला है?

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Hashimpura Masscare 42 Muslims Shoot
हाशिमपुरा मुस्लिम नरसंहार की तस्वीेरें-साभार ट्वीटर.

अतीक ख़ान


-हाशिमपुरा मुस्लिम नरसंहार की आज पैंतीसवीं बरसी है. प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC)ने 42 मुसलमानों को लाइन में खड़ा करके गोली मार दी थीं. और उनकी लाशें नहर में फेंक दीं. तारीख़ दी थी 22 मई 1987. मेरठ में तब दंगें भड़के थे. सुरक्षा के लिए पहुंची पीएसी ने दंगाईयों का काम करते हुए इन मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया. लेकिन तब से लेकर अब तक क्या बदला है? क्या पुलिस सांप्रदायिक नफ़रत के ज़हर से आज़ाद हो पाई है? जवाब ख़ुद तलाश सकते हैं. इसमें मनीषा भल्ला की किताब बाइज्ज़त बरी मदद करेगी. ( Hashimpura Masscare 42 Muslims Shoot)

दो दिन पहले की घटना है. मध्यप्रदेश के नीमच में बुजुर्ग़ भंवरलाल जैन को सिर्फ़ इसलिए पीट-पीटकर मार दिया गया. क्योंकि वह अपनी आइडेंटिटी साबित नहीं कर पाए. हत्यारोपी दिनेश कुशवाहा जोकि कथित भाजपा नेता है. भंवरलाल को मारते वक़्त बार-बार ये पूछता है कि क्या तेरा नाम मुहम्मद है? अपना आधार कार्ड दिखा.

रमताल ज़िले के रहने वाले भंवरलाल मानसिक तौर पर कमज़ोर थे. परिवार से बिछड़ गए. उनकी हालत ऐसी भी नहीं थी कि अपनी पहचान और घर का पता बता पाते. इसलिए इस कमज़ोर शख़्स को मुसलमान समझकर मार दिया गया. भंवरलाल की पिटाई वाले वीडियो पब्लिक डोमेन में हैं. देख सकते हैं. नीमच के एसपी सूरज कुमार के मुताबिक दिनेश कुशवाहा को गिरफ़्तार कर लिया है. जिसने अपना ज़ुर्म क़बूला है.

भंवरलाल की हत्या के कारण पर गौर कीजिए. उनकी हत्या मुसलमान समझकर कर दी गई. इससे एक बुनियादी सवाल उठा है. क्या न्यू इंडिया में एक मुसलमान की हत्या भारतीय दंड संहिता (IPC)के दायरे से बाहर हो गई है. क्या सांप्रदायिक नफ़रत के नशे में धुत भीड़ किसी भी इंसान को मुसलमान समझकर मार सकती है? मुसलमान है इसलिए कोई मार दिया जाएगा? ( Hashimpura Masscare 42 Muslims Shoot)

इस हत्याकांड के मोटिव ने जो सवाल पैदा किए हैं-वो किसी भी इंसान को झकझोरने और बेचैन करने वाले हैं. लेकिन इस पर शिवराज सरकार का रिएक्शन क्या है? वो भी जान लीजिए. गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा कह रहे हैं कि वो परिवार के संपर्क में हैं और सब लोग सेटिस्फाइड हैं-मतलब संतुष्ट हैं. दिनेश कुशवाहा की हत्या के बाद सरकार ने ऐसा कौन सा चमत्कार कर दिया कि पूरा परिवार गृहमंत्री की पुलिस का मुरीद हो गया है.


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ख़ैर ये तो भंवरलाल जैन की हत्या पर उनका बयान है. लेकिन मुसलमानों को लेकर राज्य में जो नफ़रत तैर रही है-जिसकी बुनियाद पर एक शख़्स की हत्या कर दी गई. उसको लेकर ग़हमंत्री ने बोलना मुनासिब नहीं समझा. तो क्या ये मान लिया जाए कि सरकार की नज़र में भी किसी मुसलमान की हत्या अपराध के दायरे से बाहर है?

ये आज के डिजिटल क्रांति के दौर की तस्वीर है. लेकिन हाशिमपुरा के वक़्त ऐसा नहीं था. हाशिमपुरा मेरठ का इलाका है. वो रमज़ान का महीना था, जब सांप्रदायिक हिंसा भड़की थी. बाद में दंगे हो गए. सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल के साथ पीएसी और सेना का फ्लैगमार्च हुआ. शहर में सीआरपीएफ की 7 और पीएसी की 30 कंपनियां भेजी गईं थीं. ( Hashimpura Masscare 42 Muslims Shoot)

प्लाटून कमांडर सुरिंदर पाल सिंह के नेतृत्व में 22 मई को पीएसी के 19 जवान हाशिमपुरा पहुंचे. यहां लोगों को घरों से बाहर निकाला. इसमें बूढ़े-बच्चे और महिलाएं सब शामिल थे. बच्चे और महिलाओं को अलग कर दिया. करीब 50 पुरुषों को ट्रक में भरकर गाजियाबाद के मुरादनगर की ओर ले गए.

जहां इन्हें एक-एक करके गोली मारी गई. और लाशें नहर में फेंकी जाती रहीं. कुछ लोगों को हिंडन नदी में मारकर फेंका था. इसमें दो-तीन घायल बच गए, जिनकी वजह से इस नरसंहार की ख़ौफनाक हकीक़त सामने आ सकी. मुरादनगर थाने में इस सामूहिक नरसंहार की प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी.

इस नरसंहार को लेकर अल्पसंख्यक संगठन, मानवाधिकार संगठनों ने कड़ा विरोध-प्रदर्शन किया. जब मुद्दा देश-दुनिया में छाया, तब 30 मई को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यूपी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के साथ दंगा में झुलसे हाशिमपुरा का दौरा किया. ( Hashimpura Masscare 42 Muslims Shoot)

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने एक जांच समिति का गठन किया. जिसमें पीयूसीएल के अध्यक्ष (पूर्व न्यायाधीश) राजिंदर सच्चर और इंद्रकुमार गुजराल शामिल थे. बाद में गुजराल भारत के प्रधानमंत्री भी बने. समिति ने 23 जून 1987 को अपनी रिपोर्ट सौंपी. जिसने भारतीय पुलिस में रिस रहे सांप्रदायिक ज़हर का खुलासा किया.

उस वक़्त से लेकर आज तक कई मौकों पर पुलिस में प्रोफेशनलिज़्म की कमी को लेकर सवाल उठते रहे हैं. 2019 में हैदराबाद में एक डॉ. युवती के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में पुलिस ने चार आरोपियों को एनकाउंटर किया था. इस मामले में तीन दिन पहले ही सुप्रीमकोर्ट ने 10 पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुक़दमा चलाने की अनुमति दी है. न्यायिक जांच में ये एनकाउंटर नहीं बल्कि हत्या सामने आई थी. साल 2020 के दिल्ली दंगों में भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं. ( Hashimpura Masscare 42 Muslims Shoot)

 

(यहां व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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