गैरसैंण कमिश्नरी: त्रिवेंद्र का नया चुनावी दांव

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दिनेश जुयाल

देहरादून । उत्तराखंड की सरकार आजकल ग्रीष्मकाल राजधानी में है। 4 मार्च को बजट पेश करने की रस्म हुई। बजट में कुछ खास है भी नहीं। 57 हजार करोड़ में से 33 हजार करोड़ तो वेतन पेंशन और क़र्ज़ अदायगी के लिए हैं। बाकी रकम में भी सरकारी चैनलों में डालने के लिए रूटीन के खर्चे गिनाये हैं।

दीनदयाल उपाध्याय, अटल और प्रधानमंत्री के नाम की कल्याणकारी योजनाओं का भी चुनावी इस्तेहारों में ज़िक्र होगा। शिक्षा,स्वास्थ,पलायन, खेती आदि फोकस में नहीं हैं। इस रस्म से इतर वहां बजट पेश करने के बाद एक जश्न हुआ। 1101 दीपक जले, नाच गाना भी हुआ और एक घोषणा हुई कि कुमाऊं और गढ़वाल के दो – दो ज़िले { चमोली, रुद्र प्रयाग, बागेश्वर और अल्मोड़ा } लेकर अब गैरसैंण एक कमिश्नरी भी होगी।

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जश्न इसलिए कि गैरसैंण को ग्रीष्मकाल राजधानी घोषित किए एक साल हो गया। यह अलग बात है कि सरकार को पिछली बार कोई गर्मी नहीं लगी और वो ग्रीष्मकाल में भी देहरादून में ही जमी रही। आगे भी शायद ऐसा ही हो लेकिन ये जश्न जरूरी था क्यूंकि चुनाव होने वाले हैं और इस बीच ताकत बटोर रही क्षेत्रीय ताकतों और पहाड़ी सेंटमेंट पर पानी डालना जरूरी था। गैरसैंण! गैरसैंण! यहां का ऐसा नारा है जिसे चुनाव में तो गूंजना ही है।

विपक्ष के नाम पर 11 के आंकड़े पर सिमटी कांग्रेस की आवाज़ भारी बहुमत वाली भाजपा के शोर में कहीं सुनाई नहीं दी। वाकआउट जैसी रस्म अदायगी के अलावा अपने ही कलह में उलझी कांग्रेस के पास करने को कोई खास अनुष्ठान भी नहीं था। सरकार से कुछ तीखे सवाल हुए तो वो भी सरकारी दल के विधायकों ने ही किए ।

अपनी क्षेत्रीय मांगों के लिए प्रदर्शन करने वालों पर वाटर केनन और लाठीचार्ज का मामला भी एक मजिस्ट्रेटी जाँच के ऐलान के बाद शांत हो गया। चार धाम रोड के नाम पर तबाही, अदालत के फैसले के विपरीत हो रहे काम, नए कानून के बाद पहाड़ के गरीबों की ज़मीनों की लूट, हिमालय पर अत्याचार की वजह से आयी बाढ़, खनन और शराब माफियाओं का खेल, सरकारी विभागों का भ्रष्टाचार, उत्तर प्रदेश के पास 21 साल से पड़ी 11 विभागों की कई सौ करोड़ की परिसम्पत्तियों समेत तमाम मुद्दों पर सरकार को घेरने वाला कोई नहीं है। कांग्रेस के लिए यह मुद्दे नहीं और यूकेडी जैसे क्षेत्रीय दलों में माददा नहीं।

 

गैरसैंण में त्रिवेंद्र सिंह पिछले साल ही अपने लिए छह नाली नौ मुट्ठी ज़मीन खरीद कर बाग बांगला बनाने की व्यवस्था कर चुके हैं। हैलीपैड के निकट उनके पड़ोसी बस रहे हैं मंत्री धन सिंह रावत। सतपाल महाराज और विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद्र अग्रवाल भी वहां के भूमिधर बनने जा रहे है और मंत्री विधायक भी लगे होंगे, जिन्हे ज़मीनों से बहुत प्यार है।

अब तो वे अपने करीबी कहीं के भी निवासी को गैरसैंणवासी बना सकते हैं। ज़ाहिर है यहाँ के लोगों को बड़े लोगों के लिए अपनी ज़मीन छोड़नी होगी। मास्टर प्लान भी बन रहा है। इसलिए कमिश्नरी बनना लाज़मी था। बुरा भी नहीं इस बहाने पहाड़ में एक व्यवस्थित बस्ती तो बसेगी। लेकिन क्या ये कमिश्नरी भी देहरादून से ही चलेगी? जैसी कि पौड़ी की कमिश्नरी चल रही है।

बहरहाल उत्तराखंड के मीडिया में ये खबर कुछ इस तरह दिख रही है, जैसे पूरे प्रदेश पर प्रभु की कृपा हो गई है। सोशल मीडिया के सरकारी सिपाही बता रहे हैं कि त्रिवेंद्र ने विपक्ष के ताबूत पर आखिरी कील ठोंक दी है।

ज़ाहिर है  इस घोषणा पर अब प्रदेश भर में जश्न का चुनावी माहौल बनाया जाएगा। पिछली बार भाजपा मोदी के नाम पर जीती थी और त्रिवेंद्र अचानक ही सीएम बन गए थे। तो क्या इस बार त्रिवेंद्र अपने तुरुप से अपने नाम पर जीतेंगे? क्या एक कमिश्नरी इतना बड़ा मुद्दा बन जाएगी कि सरकार के सारे पाप धुल दे? सरकारी लोग शोर तो कुछ ऐसा ही मचा रहे हैं।

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