भीमा कोरेगांव युद्ध के अरबी सैनिक, जिन्होंने अंग्रेज अफसर का सर कलम कर पेशवा को भेंट किया

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खुशियों से सराबोर नए साल का पहला दिन, भीमा कोरेगांव युद्ध की यादगार तिथि भी है। युद्ध की वजह और नतीजों को लेकर बहसें हैं। एक पक्ष का मानना है कि इस युद्ध में अछूत जाति के महार सैनिकों ने पेशवा सेना को उसके अत्याचार के कारण खदेड़ा। जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि इस युद्ध में पेशवा सेना की पराजय ने अंग्रेजों की सत्ता को मजबूत किया।

बहरहाल, शौर्य दिवस कार्यक्रम मनाने पर चार साल पहले कोरेगांव में हिंसा हो चुकी है। हिंसा के आरोप में कई जानी-मानी हस्तियां जेल में हैं, उनको जमानत भी नहीं मिली है।

इस चर्चित युद्ध के एक खास पहलू पर आमतौर पर कोई बात नहीं होती। वह है युद्ध में अरबी सैनिकों की जांबाजी। हालांकि, वे पेशवा की ओर से लड़े। इस सिलसिले में अहम तथ्य हैं, जो अंग्रेज अफसरों के हवाले से मौजूद हैं।

इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी रहे जेम्स कैम्पबेल के छपवाए गए पूना गजेटियर में भीमा कोरेगांव का ब्योरा है। ब्रिटिश लश्कर की कमान कैप्टन फ्रांसिस एफ स्टोंटन के हाथ में थी। तीन जनवरी, 1818 को लिखे पत्र में स्टोंटन ने कोरेगांव युद्ध का ब्योरा को बताया है-

“पूना की तरफ बढ़ते हुए मैं सुबह 10 बजे कोरेगांव पहुंचा। मेरा आगे का रास्ता पेशवा की सेना ने रोक रखा था। 20 हजार घुड़सवार, 8 हजार पैदल सैनिक और दो तोपों के साथ पेशवा की सेना नदी के दूसरे किनारे पर हमले को खड़ी थी। तब मैंने कोरेगांव रुककर मुकाबला करने का निर्णय लिया और दो तोपों को मोर्चे पर लगवा दिया।

पेशवा नेतृत्व ने इसके बाद अरबों की तीन टुकड़ियां हमले को भेजीं। गांव के नक्शे की बेहतर जानकारी की वजह से उन्होंने हमारे सबसे मजबूत मोर्चे पर कब्जा कर लिया। पूरे दिन जूझते रहे और रात करीब 9 बजे हम उन्हें पीछे धकेल सके।”

1885 के पूना गजेट में मिले ब्योरे के हिसाब से अरब, गोसावी और मराठों की एक-एक टुकड़ी ने कंपनी सेना पर हमला बोला था। हर टुकड़ी में करीब 600 सैनिक थे। इन टुकड़ियों ने कंपनी सेना को गांव के एक कोने में धकेल दिया था। रात भर चले युद्ध में कंपनी के सैनिकों के पास खाना और पानी भी नहीं था।

पेशवा के अरब सैनिकों ने कंपनी की दो में से एक तोप को अपने कब्जे में ले लिया। तोपखाने पर कब्जे में लेफ्टिनेंट चिजोम मारा गया। अरब सैनिकों ने उसका सिर काटकर पेशवा के पास भिजवा दिया। अरबी सैनिकों का पेशवाई के प्रति ये समर्पण हैरान करने वाला है। वही पेशवाई, जिसपर आरोप है कि अछूतों के साथ बर्बरता के साथ पेश आई, उनके पदचिह्नों को मिटाने के लिए पीछे झाड़ू बांधने या गले में हांडी बांधने को मजबूर किया।

मुस्लिम सैनिकों की गैर मुस्लिम शासक के लिए स्वामी भक्ति की सबसे बड़ी मिसाल इब्राहिम खां गारदी हैं। ये पेशवा शासन में फौज के अहम कमांडर रहे, जिसके मातहत 10 हजार सैनिक और तोपखाना भी था। जिन्होंने पानीपत के तीसरे युद्ध में अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली से मुकाबला किया और क्रूर यातनाओं के बावजूद तौबा करने से इनकार कर दिया था। निजाम हैदराबाद को सेवाएं दे चुके इब्राहिम गारदी ने फ्रेंच अफसर से तोप संबंधी विशेषज्ञता हासिल की थी। इब्राहिम गारदी के पूर्वजों को जनजाति समुदाय का बताया जाता है।

अरबी सैनिक सेवाएं शुरू कैसे हुईं? ये जानकारी भी दिलचस्प है।

भारत के साथ अरब देशों का व्यापार प्राचीन जमाने से है। ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, कला को दुनिया में प्रसार के लिए उनका योगदान इस वजह से माना भी जाता है। ये वो दौर था, जब अरब देशों में तेल संपदा खोजी नहीं गई थी और वहां की आबादी गरीबी से सामना कर रही थी। व्यापारियों के साथ या व्यापारियों की मदद से ऐसे बहुत से लोग अरब देशों से यहां पहुंचे, जिनको रोजगार की जरूरत थी।

उनमें विशेष निपुणता बहादुरी और विपरीत हालात में युद्ध करने की थी। मालाबार, कोंकण आदि बंदरगाह से वे भारत पहुंचते रहे। बताया जाता है, निजाम हैदराबाद ने उनको सैनिक सेवाओं में रखना शुरू किया, उनकी बैरक के नाम पर बाराकश नाम की जगह आज भी मौजूद है। युद्ध और शासकों की जानकारी में आने पर दूसरी जगहों से भी सेवाओं का मौका मिला।

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