जन्मदिन विशेष: जानिए हकीम अजमल ख़ान की कामयाब ज़िंदगी के ख़्वाब सरीखे क़िस्से

The leader Hindi: दिल्ली में पैदा हुए और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल करने वाले हकीम अजमल ख़ान की जिंदगी को पढ़ें और सुनें तो ऐसा लगता है कि किताब का हरेक पन्ना और कहानी सुनाने वाले का एक-एक अल्फ़ाज़ कामयाबी की अद्भुत गाथा को बयां कर रहा है. किसी एक शख़्स में इतनी ख़ूबियां ख़्वाब सरीखा दिखती हैं. हकीम, शायर, लेखक, राजनेता और सोने पर सुहागा यह कि फ्रीडम फाइटर भी. देशभक्ति का जोश और उस पर सांप्रदायिक सौहार्द का जुनून. ऐसी इकलौती शख़्सियत जो इंडियन नेशनल कांग्रेस, मुस्लिम लीग और आल इंडिया ख़िलाफ़त कमेटी का अध्यक्ष रही. इतनी ही नहीं लाला लाजपत रॉय की सदारत वाली आल इंडिया गोरक्षा कांफ्रेंस में स्वागत समिति की बागडोर संभाली.

इस मंच से मुसलमानों को संदेश दिया कि वह हिंदू भाईयों की भावनाओं की क़द्र करें. जब बात देश को आज़ाद कराने की आई तो ब्रिटिश हुकूमत से मिले एज़ाज़ भी ठुकरा दिए. महात्मा गांधी के साथ ख़िलाफ़त आंदोलन से जुड़े गए. उनके क़रीबी साथियों में शुमार हुए. यूनानी चिकित्सा पद्धति को भी अंग्रेज़ों से बचाने अहम किरदार अदा किया. आयुर्वेदिक और यूनानी तिब्बिया कॉलेज और बाद में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना की. मरते दम तक जामिया के चांसलर रहे. चेहरा देखकर बता दिया करते थे कि अमुक शख़्स किस मर्ज़ में मुब्तेला है. उस दौर में जब रुपये की क़ीमत बहुत ज़्यादा थी, मरीज़ देखने जाने पर एक दिन के एक हज़ार रुपये चार्ज करते थे. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बतौर यूनानी डॉक्टर वो कितने क़ाबिल थे. हां, घर पर मरीज़ देखने पर कोई फ़ीस नहीं लेते थे. रामपुर नवाब के मुख्य चिकित्सक भी रहे.

हकीम अजमल ख़ान को दरगाह आला हज़रत पर ख़िराजे अक़ीदत पेश करने के लिए यौम-ए-पैदाईश से एक दिन पहले निबंध प्रतियोगिता कराई गई. दरगाह के मीडिया प्रभारी नासिर क़ुरैशी ने बताया कि प्रतियोगित में पहला इनाम मदरसा मदरसा मंज़र-ए-इस्लाम के छात्र मुहम्मद फ़ैज़, दूसरा स्थान मदरसा इस्लामिया इज़्ज़तनगर के छात्र मुहम्मद अलीम और तीसरा इनाम मंजर-ए-इस्लाम के छात्र उवैस ने हासिल किया. सभी को आला हज़रत की किताबें भेंट की गईं. इस मौक़े पर मुफ़्ती मुहम्मद सलीम नूरी बरेलवी, मुफ़्ती अख़्तर, मुफ़्ती मुईनुद्दीन और मास्टर कमाल ने हकीम अजमल ख़ान के अहम कारनामों पर रोशनी डाली. शायरी में उनका तख़ल्लुस शैदा था. उनके बेहतरीन शेर उनकी बेहतरीन शख़्सियत का आईनादार हैं.

दुनिया बस इससे और ज़्यादा नहीं है कुछ
कुछ रोज़ हैं गुज़ारने और कुछ गुज़र गए

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