क्या नए कृषि कानून देहात के जातिवादी ढांचे पर चोट करेंगे!

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आशीष आनंद-

नए कृषि कानूनों पर सरकार और दिल्ली बॉर्डर पर जमे आंदोलनकारी किसानों के बीच रार जारी है। आंदोलन के रंगरूप और कानूनों के लागू होने पर क्या नफा-नुकसान होगा, ये दोनों ओर से गिनाया जा रहा है। इस क्रम में ये अनुमान लगाना भी जरूरी है कि देहात के जातिवादी ढांचे पर इन कानूनों के नतीजों से क्या असर होगा? (Agricultural Racist Structure)

ये सच ही जान पड़ता है कि कारपोरेट कंपनियों के कृषि क्षेत्र में दाखिल होने के बाद मौजूदा संरचना में बड़ा बदलाव आएगा, कानून भी यही कहते हैं। हालांकि कानूनों के पक्षधर इसको किसानों के हित में होने का दावा करते हैं। वहीं, विरोधी पक्ष का मानना है कि इससे किसान कंपनियों के मोहताज हो जाएंगे और खेती करने की दुश्वारियां इस कदर बढ़ जाएंगी कि मजबूरी में कारपोरेट के हवाले होना पड़ेगा।

साधारण नजरिए से विरोधी पक्ष की दलील में दम है। निश्चय ही नए कृषि कानूनों से परंपरागत मालिक जाति समुदाय की आन-बान-शान बिखर जाएगी। उनकी बर्बादी उन्हें भूमिहीन या मजदूर बना देगी और वे पहले ही खासे असम्मानजनक तरीके से जी रहे वंचित तबकों की कतार में खड़े होने को मजबूर हो सकते हैं।

कौन करेगा पराभव का सामना

सवाल उठता है, क्या इस आर्थिक ताकत का पराभव उनके भीतर मौजूद जातिवादी मूल्यों को भी चकनाचूर करेगा? दूरगामी तौर जवाब है, हां। पहले बात की जाए किसानों की संख्या की। बिजनेस लाइन की खबर बताती है कि पीएम किसान योजना के तहत 14.5 करोड़ किसान परिवारों की गिनती हुई, जबकि पिछले एक साल में केवल 9 करोड़ किसान परिवारों की पहचान की गई है। ये संभव है कि अभी बड़ी संख्या ऐसी हो, जिसका नामांकन हुआ ही न हो।

किसानों की संख्या का ये आंकड़ा 2015-16 की कृषि जनगणना से है। इस जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2.382 करोड़ खाते में कृषि भूमि है। इसके बाद बिहार में 1.641 करोड़, महाराष्ट्र में 1.529 करोड़, मध्य प्रदेश में 1.0 करोड़, कर्नाटक में 0.8 करोड़, आंध्र प्रदेश में 0.852 करोड़, तमिलनाडु में 0.794 करोड़ खाते हैं। कृषि जनगणना से प्राप्त संख्या अन्य सर्वेक्षणों और रिपोर्टों से किसानों की गिनती से अलग हो सकती है। (Agricultural Racist Structure)

तकलीफों से जूझने वाली आबादी

अनुमान है कि किसानों में 86 प्रतिशत गरीब और सीमांत किसान हैं। लगभग 25 करोड़ असंगठित ग्रामीण श्रमिक हैं। ग्रामीण क्षेत्र के असंगठित श्रमिकों पर सरकारी आंकड़ा ये भी है कि 2.5 प्रतिशत सालाना दर की बढ़ोत्तरी के साथ ये संख्या लगभग 12 करोड़ है। ये अकुशल और असंगठित मजदूर वर्ग आजीविका के लिए बहुत कम मजदूरी पर जीने को मजबूर है।

देहात की ये वो आबादी है जिसकी आय का मुख्य स्रोत मजदूरी है। एक समुदाय के रूप में कृषि मजदूर हर जगह बेहद गरीब हैं। इनकी मजदूरी औद्योगिक श्रमिकों की तुलना में बहुत कम है। देहात के खेत मजदूर, भूमिहीन, गरीब सीमांत किसान ही वह आबादी है, जो आमतौर पर सामाजिक तौर असम्मानित है। वही आबादी, जिसकी उन्नति और आजादी के लिए डॉ.आंबेडकर ने सामूहिक खेती की वकालत की, ब्राह्मणवादी ढांचे में बंधी पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने से लेकर अलग बसाने तक का प्रस्ताव दिया। (Agricultural Racist Structure)

शहरों को भी उनसे उनसियत नहीं है। लॉकडाउन में भूखे प्यासे सैकड़ों मील पैदल चलकर घर वही पहुंचे। सर्वेक्षणों का अनुमान है कि 2011-2016 के बीच हर साल औसतन 90 लाख लोगों ने जीविका के लिए काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर रुख किया। ये वह आबादी है, जिसने सबसे खराब हालात और कम वेतन पर काम किया और करती है। जिन्हें प्रवास के दौरान न सरकारी योजनाओं से राहत मिलती है और न ही उन जगहों की सियासत में उनको गिना जाता है। खाने, रहने, पेयजल, बच्चों की शिक्षा, इलाज से महरूम रहते हैं।

पंजाब-हरियाणा खासतौर पर, बाकी जगहों पर भी बड़े फार्मर इन श्रमिकों की बदौलत फसल रूपी सोना उगा रहे हैं। बेशक, अपने गांव की तुलना में उनको बेहतर मजदूरी भी मिलती है और उलाहना की गुंजायश भी कम है। फिर भी इनकी मुसीबत कम नहीं है और सामाजिक सुरक्षा तो सिफर ही है।

हालात ये हैं कि पुरुष मजदूर को एक साल में लगभग 150 दिनों के लिए और एक महिला मजदूर को 130 दिनों के लिए काम मिल पाता है। कृषि श्रम जांच में एक अनुमान ये है कि औसतन एक कृषि मजदूर एक वर्ष में लगभग 197 दिनों के लिए रोजगार पाता है। आर्थिक रूप से कमजोर हैं ही, राजनीतिक तौर भी शक्तिहीन हैं।

नतीजतन, उनके ही नाम पर चलने वाली विकास योजनाओं का लाभ भी उनके हाथ नहीं आता। जबकि उनकी संख्या में लगातार इजाफा होता रहा। आंकड़े बताते हैं कि 1961 में वे 2 करोड़ 75 लाख थे और 1961 में 3 करोड़ 15 लाख, 1971 में 4 करोड़ 75 लाख, 1981 में 5 करोड़ 55 लाख, 1991 में 6 करोड़ 60 लाख और 2001 में 10 करोड़ 60 लाख हो गए। (Agricultural Racist Structure)

विकास योजनाओं से महरूम

पिछले तीन दशकों में कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी विकास का ये नतीजा है। हरित क्रांति, सस्ते सहकारी ऋण की उपलब्धता, उपज का समर्थन मूल्य इस विकास के ही हिस्से हैं। यहीं से खेत मजदूरों, छोटी जोत वाले किसान परिवारों के सदस्यों की मजबूरी पैदा हुई कि वे उन्नत खेती वाले राज्यों या फिर औद्योगिक शहरों में पलायन करें और किसी भी तरह जीवित रहें। साथ ही रोज-रोज की जातिवादी बेइज्जती से भी तात्कालिक तौर पर छुट्टी पाएं।

मौजूदा किसान आंदोलन में ये मुद्दा है ही नहीं है कि देश पूरी ग्रामीण आबादी का लगभग 23 प्रतिशत किसान आबादी सदियों से अमानवीय परिस्थितियों में जीती है। उन्होंने कभी खुद को मुखर करने का साहस नहीं किया। उनके ट्रेड यूनियन नहीं हैं या फिर बेहद कमजोर हैं, जिनकी मजदूर आंदोलन में ही कमतरी है। बड़े फार्मर हों या फिर साधारण, सुविधाओं या मजदूरी के लिए सौदेबाजी कर पाना उनके लिए संभव नहीं होता। (Agricultural Racist Structure)

इस वजह से खेतिहर मजदूरों को आमतौर पर ज़मीन मालिकों से उधार लेना पड़ता है और फिर कम वेतन में काम करना होता है। कई बार बंधुआ हालात तक में। बिहार में कामाय, तमिलनाडु में पन्नईयाल, महाराष्ट्र में कोलिस, मध्यप्रदेश में शंकरी, उड़ीसा में चारकर आदि श्रेणी के भूमिहीन मजदूर लगभग गुलाम हैं।

1948 में सरकार द्वारा उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम के तहत न्यूनतम मजदूरी अधिनियम पारित किया गया, जिसके तहत खेत श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करना होगा। राज्यों में कानून मजदूरी की विभिन्न दरों को निर्धारित करने की अनुमति देता है, इसलिए व्यवहार में न्यूनतम मजदूरी कभी मिली ही नहीं, या दी नहीं जाती।

खेत मजदूरों की दुश्वारियों का आलम

फर्स्ट एग्रीकल्चरल लेबर इंक्वायरी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि 1950-51 में कृषि श्रमिक परिवारों की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 104 रुपये थी और घर की वार्षिक औसत आय 447 रुपये थी। घर की औसत वार्षिक आय 1955-66 में घटकर 437 रुपये हो गई, फिर 1963-64 में बढ़कर 600 रुपये और फिर 1974-75 के दौरान बढ़कर 1,671 रुपये हो गई।

खेती के उन्नत तरीकों के आने के बाद मध्यम और धनी किसानों की आय के स्तर में वृद्धि हुई, लेकिन साथ ही साथ श्रम की मांग में गिरावट के कारण वास्तविक मजदूरी में गिरावट आई। (Agricultural Racist Structure)

1960-61 से 1967-68 की अवधि के दौरान प्रो. प्रणब बर्धन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, यह पता चला था कि कृषि उत्पादन में 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन केरल को छोड़कर सभी राज्यों में कृषि मजदूरी में गिरावट आई।

जी. पार्थसारथी ने अनुमान लगाया कि 1984-85 में जीवन निर्वाह के न्यूनतम मानक बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम दिहाड़ी 22 रुपये भी नहीं थी, पंजाब, हरियाणा और केरल में कुछ राहत थी। इस तरह के हालात बरकरार हैं। हकीकत यही है, खेतिहर मजदूरों का जीवन वास्तव में दयनीय है।

उनके पास रोजगार का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं हैं या बेहद सीमित हैं। शायद यही वजह है कि एनएसएस (32 दौर) से पता चला कि भारत में लगभग 3.5 लाख बंधुआ मजदूर अभी भी मौजूद हैं। श्रमिकों को सुबह से शाम तक काम करना होगा क्योंकि काम के कोई निश्चित घंटे नहीं हैं और छुट्टी और अन्य लाभों के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

कारपोरेट के आने से क्या होगा

खेती में कारपोरेट के प्रवेश से खेत मजदूरों और भूमिहीनों को खास नुकसान नहीं होगा, पूंजीवादी शोषण तो होगा ही। बल्कि यूपी-बिहार के काफी मजदूर परिवार को छोड़कर सैकड़ों मील दूर जाकर मजदूरी की मजबूरी से भी मुक्त हो जाएंगे। उनको अपने ही घर के आसपास बेहतर, तय और समय पर मजदूरी मिल सकेगी। जातिवादी तरीके से उनको बेइज्जत नहीं होना पड़ेगा। छोटी जोत के किसानों को भी मजदूरी का साधन पैदा होगा और बेवजह किसान होने के भ्रम से मुक्ति मिलेगी।

छोटी जाेत के किसानों के लिए बेहतर तो वही होता, जो डॉ.आंबेडकर ने सुझाया था, सोवियत रूस के सामूहिक खेती का मॉडल, लेकिन अब सोवियत संघ ही नहीं है तो इस मॉडल को कोई सरकार क्यों माने, सरकारों को कारपोरेट ही प्रिय है।

बड़े फार्मर और धनी किसानों को नुकसान ज्यादा होगा। उनको मनमानी का मौका नहीं होगा, बल्कि खेत मजदूरों को बेहतर सुविधा और वेतन देना पड़ेगा, जुबान और बर्ताव पर लगाम लगाकर कारपोरेट से प्रतियोगिता में उतरना होगा। इस मशक्कत के बाद भी उनका टिक पाना बहुत मुश्किल होगा। लेकिन ये खेती से जुड़ी बहुसंख्यक आबादी का मुद्दा नहीं है।


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