उत्तराखंड:राजधानी तक में सरकारी एमआरआई मशीन नहीं

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मनमीत देहरादून।
उत्तराखंड सरकार दावे कुछ भी करे लेकिन सच यही है कि वह स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में निजी अस्पतालों पर विशेष कृपालु है इसलिए देश दुनिया में रही बदनामी के बावजूद जानबूझ कर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को पंगु बना कर रखा गया है।
दूरस्थ उत्तरी छोर पर बसे सर बडियार गांव में गंभीर रूप से जख्मी महिला को पहले सीएचसी त्यूणी उपचार के लिये लाया गया। वहां महिला की गंभीर हालत देखते हुये उसे लगभग 170 किमी दूर राजधानी देहरादून के राजकीय मेडिकल काॅलेज के लिये रेफर कर दिया गया। दर्द से कहराती लहुलूहान महिला अगले दिन अस्पताल पहुंची। वहां उपचार कर रहे डाक्टरों ने एमआरआई जांच के लिये लिखा। लेकिन अस्पताल में मौजूद एमआरआई मशीन पिछले छह माह से खराब पडी हुई है। लिहाजा, परिजन जख्मी महिला को किसी निजी अस्पताल में ले गये।
गत दिनों गैरसैंण ग्रीष्मकालीन विधानसभा में सरकार ने 57 हजार करोड रूपये का राज्य बजट रखा। इसी सत्र में कैग रिपोर्ट भी सदन में रखी जो पोल खोल रही है कि यहां तो स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा 10 साल पहले के स्तर पर है
छह महीने पहले से राजधानी के दून मेडिकल काॅलेज अस्पताल की एकमात्र एमआरआई मशीन खराब है। देहरादून ही नहीं, उत्तरकाशी, टिहरी, पौडी, चमोली जैसे दूरस्थ जिलों से आने वाले मरीज पांच से 12 हजार रूपये खर्च कर प्राइवेट में ये जांच कराते हैं। कोटद्वार और हल्द्वानी के मेडिकल काॅलेज में एमआरआई है। जिनकी क्षमता केवल एक दिन में 30 मरीजों की है।
एक करोड बीस लाख से ज्यादा की जनसंख्या वाले प्रदेश में महज दो एमआरआई मशीन होना वैसे ही डब्ल्यूएचओ के मानकों से कोसों है। दून मेडिकल काॅलेज के प्राचार्य डा अशुतोष सयाना बताते हैं कि नई एमआरआई मशीन खरीदने के लिये टेंडर प्रक्रिया चल रही है।

स्वास्थ्य महानिदेशक डा तृप्ति भट्ट बताती है कि सभी खरीद की प्रक्रिया चल रही है। बांड वाल डाक्टरों की तैनाती के लिये भी कार्रवाई चल रही है। जिन डाक्टरों को पीएचसी और सीएचसी में तैनाती दी गई थी और उन्होंने वहां पर तैनाती नहीं दी है, ऐसे डाक्टरों के खिलाफ नोटिस भेजे जा रहे है। या तो वो बांड के तहत अपनी तैनाती पर आएंगे या बांड पर निर्धारित पूरा पैसा सरकारी कोष में जमा करायेंगे।

महिलाओं के लिये एक भी आईसीयू नहीं
उत्तराखंड का समाज मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है। विडंबना ये है कि राज्य के किसी भी प्रसव केंद्र में महिलाओं के लिये एक भी आईसीयू नहीं है। यहां तक की राज्य का एकमात्र महिला अस्पताल दून अस्पताल में भी महिलाओं के लिये आईसीयू नहीं है। अगर किसी महिला को प्रसव के दौरान आईसीयू की जरूरत पडती है तो उसे अन्य निजी अस्पतालों में भर्ती कराया जाता है। इसी तरह देहरादून के जिला अस्पताल में भी महिलाओं के लिये आईसीयू नहीं है।

पहाडोें पर तैनात डाक्टर गायब
डाॅक्टर पहाड़ चढने को तैयार नहीं हैं। जहां चढ़े भी हैं, वहां पर इलाज के लिए मूलभूत सुविधाएं तक नहीं। कोरोनाकाल में हर अस्पताल में वेंटीलेटर तो सजा दिए गए, लेकिन स्पेशलिस्ट के अभाव में धूल फांक रहे हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में आज भी मरीज डोली के सहारे हैं। जहां हमेशा जान का खतरा रहता है। चार साल का कार्यकाल पूरा करने जा रही भाजपा सरकार के सामने अब भी स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने की बड़ी चुनौती है।
सरकार का दावा था कि 23 लाख परिवारों के लिए अटल आयुष्मान योजना का लाभ मिलेगा। दूरस्थ क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन की सुविधाएं शुरू की जाएंगी। सरकारी अस्पतालों को पीपीपी मोड में संचालित किया जाएगा। हर गांव में 10 किलोमीटर के दायरे में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाएंगी। 13 जिलों में ट्रामा सेंटर, ब्लड बैंक व आइसीयू स्थापित किया जाएगा। मातृ-शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जाएगी। कोई भी अस्पताल बिना डाक्टर के नहीं रहेगा

दावों की ये है जमीनी हकीकत
अभी तक 1500 डाक्टरों की ही नियुक्ति हो सकी है। जो की जनसंख्या के अनुपात में बेहद कम है। अस्पतालों में अक्सर दवाइयों की कमी रहती है। सभी जिलों में टामा सेंटर व आईसीयू के लिये काम नहीं हो सका है। जहां हुआ भी है वहां पर स्टाफ नहीं है। टेलीमडिसिन पर भी काम नहीं हुआ। सरकारी अस्पतालों में एक भी सुपरस्पेशलिस्ट डाक्टरों की नियुक्ति नहीं हो सकी।

प्रदेश में डॉक्टरों व अस्पतालों की स्थिति
2109 अस्पताल हैं प्रदेश में 2715 पद डाक्टरों के स्वीकृत 1900 डाक्टर ही कार्यरत 815 डाक्टरों की है कमी। एक भी हार्ट सर्जन व न्यूरोसर्जन नहीं है।

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