यूपी से सपा की इक़रा हसन… तो ओडिशा से कांग्रेस की सोफ़िया..देशभर में ये दो लड़कियां मौज़ू-ए-बहस

द लीडर हिंदी: फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के बाद अगर यूपी से जीते किसी सांसद का चर्चा हो रहा है तो वो कैराना की सांसद इक़रा हसन हैं, जो लंदन से पढ़कर आई हैं और उनमें गज़ब का कांफिडेंस है. तब जबकि महज 29 साल की हैं. न जीतने से पहले प्रचार के दौरान उनके मुंह से हल्की बात सुनी और न जीत के बाद ग़ुरूर के क़रीब दिखाई दीं. युवा सोशल मीडिया पर इक़रा को लेकर जोश से लबरेज़ हैं. सियासत में उनके बहुत आगे जाने के लिए उन्हें विश किया जा रहा है. इक़रा हसन की तरह ही सोफ़िया फ़िरदौस भी बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी हैं लेकिन उनका चर्चा कम है. तब जबकि उनकी जीत की बात करें तो बहुत ज़्यादा बड़ी है. वो ओडिशा की पहली मुस्लिम विधायक हैं.

उम्र में बस इक़रा से तीन साल बढ़ी हैं. तेज़ तर्रार हैं. बोलने के मामले में प्रखर वक्ता हैं. ये दोनों ही मु्स्लिम लड़कियां राजनीतिक पृष्ठभूमि से निकलकर आई हैं लेकिन परिस्थितिवश. जिस तरह इक़रा ने भाई नाहिद हसन के जेल जाने पर मोर्चा संभाला, वैसे ही सोफ़िया के पिता मुहम्मद मोक़िम भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में चुनाव लड़ने के लिए आयोग्य ठहरा दिए गए. वो जिस कटक सीट से विधायक रहे वहीं से उनकी बेटी सोफ़िया फ़िरदौस जीतकर आई हैं. दोनों ही कि जीत में ख़ास बात यह है कि उन पर महज़ मुस्लिम वोटरों ने नहीं सर्वसमाज ने विश्वास जताया. इक़रा हसन और सोफ़िया फ़िरदौस की राजनीति का बेस मु्स्लिम नहीं है. यही वजह है कि दोनों के ख़िलाफ़ भाजपा को मात खानी पड़ी.

दोनों का विज़न भी एकदम क्लियर है. सोफ़िया ने तो मज़हबी दायरे तोड़कर दूसरे संप्रदायों में अपनी ख़ास पहचान बनाई. कटक वो सीट है, जहां हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सिख- यानी चारों धर्म के लोगों की बराबर भागीदारी थी. मीडिया से बातचीत में सोफ़िया कहती हैं कि क्रिश्चियन स्कूल से पढ़ी और चर्च भी जाती रही हूं. कटक के लोग बेहद इमोशनल हैं. मैंने खुद को कभी अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य के तौर पर नहीं देखा.

मेरा चुनावी नारा था- कटक की बेटी, कटक की बहू. जीतने के बाद वो दुर्गा मंदिर भी गईं. सोफ़िया भविष्य में नई उम्मीदों से लबरेज़ हैं-कहती हैं ओडिशा विधानसभा चुनाव में हम लोग 14 सीट जीतने में कामयाब रहे. 15 सीटों पर दूसरे नंबर पर रहे हैं, जिन पर हार जीत का अंतर महज़ 800 से 1100 वोट के बीच है. कम से कम 30 सीटों पर हमारा मज़बूत आधार है. अगर हम मेहनत करें तो अगले चुनाव में बहुमत हासिल कर सकते हैं. ख़ैर तब तक क्या होगा, देश की राजनीति किस ठौर ठहरेगी. उससे पहले मु्स्लिम राजनीति के नज़रिये से इक़रा हसन और सोफ़िया फ़िरदौस की जीत नई उम्मीदें जगाती है. भाजपा के वर्चस्व वाली राजनीति में स्टैंड करने के लिए एक नया रास्ता इन दोनों ऊर्जावान लड़कियों ने तैयार कर लिया है.https://theleaderhindi.com/salman-khan-was-interrogated-for-three-hours-and-arbaaz-sohail-for-two-hours-each/

Abhinav Rastogi

पत्रकारिता में 2013 से हूं. दैनिक जागरण में बतौर उप संपादक सेवा दे चुका हूं. कंटेंट क्रिएट करने से लेकर डिजिटल की विभिन्न विधाओं में पारंगत हूं.

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