#WorldSnakeDay: सांप अपने जहर को फालतू बर्बाद नहीं करते, कंजूसी से इस्तेमाल करते हैं

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सांप बड़े अनोखे किस्म के जीव होते हैं। कुदरत ने उन्हें कुछ ऐसा दिया है कि वे हर किसी को हैरान कर देते हैं। इंसान तो तबसे ही उनसे खौफ खाता रहा है, वह इंसान बना भी नहीं था। इंसान बनने के रास्ते पर अग्रसर था।

अक्सर ही किसी गांव के बाहर आपको सर्पदेवता का मंदिर या छोटा सा ठीहा दिख जाएगा। मंदिर नहीं भी मिलेगा तो मंदिर के ऊपर की डिजाइन में सांप मौजूद होगा। अगर यह भी नहीं हुआ तो शिव जी के गले में लटके हुए फन काढ़कर फुफकारते हुए सांप की छवि तो आपको हर जगह दिख सकती है।

इंसानों या अन्य जानवरों के लिए यह बेहद अजीब सी चीज थी। जिस जीव के न हाथ है न पैर। वो पेड़ पर चढ़ जाता है। यहां तक कि पेड़ पर चढ़कर वह पक्षियों के अंडे खा जाता है। पक्षियों को भी शिकार बना लेता है। जिस जीव के हाथ-पैर नहीं है वो पानी में इतनी कुशलता से कैसे तैर लेता है।

ज्यादातर सांप अपने विशेष हुनर के साथ पेड़ पर चढ़ने और पानी में तैरने में माहिर होते हैं। बल्कि, उनमें से कुछ ने तो पेड़ और पानी को ही अपना घर भी बना हुआ है। वे रेंगकर चलते हैं। छलावरण यानी केमोफ्लाज के उस्ताद होते हैं। कई बार वे सामने होने पर अपने वातावरण में इतना घुल-मिल जाते हैं कि दिखाई भी नहीं देते। अंधेरी और शुष्क जगहों को पसंद करते हैं। इसके चलते अक्सर ही हमारा पांव उन पर पड़ जाता है। या हम अनजाने ही किसी ऐसी जगह हाथ डाल देते हैं, जहां पर वे छिपकर बैठे होते हैं। इसका नतीजा सर्पदंश के तौर पर होता है।

एक बात को समझिए। सांप को हमें काटने से कोई फायदा नहीं। सांप हमें काटना चाहते भी नहीं। सांप के लिए उनका जहर उनके लिए खाने का एक जुगाड़ है। यही वह हथियार है, जिसके जरिए वे अपना पेट पालते हैं। जहर उनके अंदर एक खास ग्लैंड में बनता है और सिर के पीछे स्थित थैली में एकत्रित होता रहता है। इस थैली का कनेक्शन आगे वाले दो विषदंतों से होता है। ये विषदंत खोखले होते हैं। जब सांप किसी को काटता है तो इन जहर की थैली से जहर निकलकर खोखले विषदंतों से किसी इंजेक्शन की तरह इंजेक्ट हो जाता है।

सांप निवाला तोड़कर नहीं खाते। वे चबा भी नहीं पाते। वे अपना खाना निगल जाते हैं। इसलिए वे ऐसे ही जीवों को काटते हैं यानी उनमें जहर छोड़ते हैं, जिन्हें वे निगल सकें। जहर उनके पास इफरात नहीं है। इसलिए वे इसका बड़ी किफायत से इस्तेमाल करते हैं।

ज्यादातर सांप मेढक, छिपकलियों, चूहे जैसे छोटे रोडेंट को काटते हैं और उन्हें निगल जाते हैं। किसी ऐसे जीव को काटना जिसे निगल भी नहीं सके, यह जहर की बर्बादी है। वे इसकी बर्बादी कभी भी नहीं चाहते। क्योंकि, इसी पर उनका जीवन निर्भर है।

इसी के चलते कई बार कोबरा जैसे सांप फाल्स बाइट करते हैं। यानी काटते तो हैं लेकिन जहर नहीं छोड़ते। ताकि, वो घबराकर दूर भाग जाए। अमेरिका में पाया जाने वाला रैटल स्नेक अपनी पूंछ में फंसी किनारियों को झुनझुने की तरह बजाकर आगाह करता है कि मुझसे दूर हो जाओ। कई सांप फुफकारते हैं। मुझसे दूर रहो। मैं तुमसे उलझना नहीं चाहता। अफ्रीका में कई सांप दूर से ही जहर की फुहार छोड़ते हैं। ताकि, वे उसे दूर कर सकें।

बड़े जीवों को वो किसी भी तरह से काटना नहीं चाहते। क्योंकि, वे उसे निगल नहीं सकते। लेकिन, अक्सर ही वाकये ऐसे हो जाते हैं कि उन्हें काटना पड़ता है। इसके बाद घबराहट फैल जाती है। आपने कभी सांप को खुले में अगर सामने देखा हो तो इस बात को मानेंगे कि इसे देखने से एक अजीब किस्म की सनसनी आपके अंदर दौड़ने लगती है। एक सिहरन सी पैदा होती है। ये सदियों के जैव विकास से हमारे अंदर पैदा हुई एक सहज प्रतिक्रिया है।

हमारे देश में सांपों की तमाम प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन, इनमें से ज्यादातर जहरीली नहीं होती हैं। भारत में पाए जाने वाले सांपों में रसेल वाइपर, कोबरा, करैत और सॉ स्केल्ड वाइपर ही जहरीले होते हैं और सर्पदंश से होने वाली ज्यादातर मौतों में इन्हीं का हाथ होता है।

भारत के सर्प विशेषज्ञ रोमुलस व्हिटेकर की किताब भारतीय सांप एनबीटी से छपी है। सांपों के बारे में यहां से बहुत कुछ जाना जा सकता है। जबकि, पुणे में एक बहुत ही खूबसूरत स्नेक पार्क है। यहां पर आप तमाम सांपों को एक सुरक्षित दूरी के साथ देख सकते हैं।

दरअसल, ऊपर बताए गए चार जहरीले सांपों को पहचाना जाना जरूरी है। क्योंकि, हर सांप के जहर की विशेषता के अनुसार ही उसका एंटी वेनम भी बनाया जाता है। इसलिए अगर जिसे सर्पदंश हुआ है, वो यह बता दे कि उसे किस सांप ने काटा है तो उसका उपचार आसान हो जाता है। इसलिए कम से कम इन चार सांपों की पहचान तो सभी को बचपन से कराई जानी चाहिए।

बाकी, सांपों से सबसे ज्यादा मुठभेड़ किसानों-मजदूरों की होती है। तीन बेहद आसान उपायों से इससे बचा जा सकता है। काम करते समय रबड़ के बूट पहने जाने चाहिए। हाथों में दस्ताने होने चाहिए और रात में निकलने से पहले टॉर्च का जरूर इस्तेमाल करना चाहिए।

हमारे गांवों में अभी भी किसान टूटी चप्पल पहनकर और फावड़ा लेकर रात के अंधेरे में पानी लगाने निकल पड़ता है। यह बेहद खतरनाक है। इससे आपकी और सांप दोनों की जान खतरे में पड़ जाती है। यह टकराव न सांपों के हक में है और न ही हमारे।

(चित्र वाइल्ड लाइफएसओएस संस्था द्वारा कुछ समय पहले बचाए गए एक सांप का है। इसमें सांप के बारे में फैले कौतूहल और भय का फायदा उठाने के लिए मदारी ने उसके सिर की त्वचा में नेवले के कुछ बालों को सिल दिया गया है। ताकि, यह लगे कि सांप के बाल उग आए हैं और वह बहुत पुराना-बुजुर्ग सांप है। इससे शायद मदारी की आय कुछ बढ़ जाती होगी।)

(वन्यजीवों व पर्यावरण को समर्पित ब्लॉग जंगलकथा से साभार)

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