पुण्यतिथि: स्त्री-शिक्षा की पैरोकार पहली अध्यापिका सावित्रीबाई फुले को नमन

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सावित्रीबाई फुले स्त्री-शिक्षा की मशाल उठाए चलने वालों में अग्रणी हैं. सावित्रीबाई का, 9 वर्ष की आयु में 1840 में विवाह हुआ ज्योतिराव फुले से. ज्योतिबा समझ रहे थे कि अशिक्षा भारतीय समाज में स्त्रियों की दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह है. इसलिए लड़कियों का, बल्कि दलितों का,समाज में वंचितों का ,शिक्षित होना आवश्यक है. लड़कियाँ स्कूल पढने तभी भेजी जातीं जब उनके लिए कोई शिक्षिका होती. तो रूढ़िवादी समाज की धमकियों के बावजूद सावित्रीबाई ने अपनी पढ़ाई पूरी की और 1848 में ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिए स्कूल खोला. सावित्रीबाई ने जी-जान से स्त्री-शिक्षा के लिए काम किया.विरोध सहा. (Savitribai Phule)

समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले कवि-हृदय थीं. अपनी कविताओं के माध्यम से उन्होंने स्त्रियों की तत्कालीन सामाजिक दशा को तो बयान किया ही साथ में अशिक्षा को दलित समाज के दुश्मन के रूप में पह्चाना. उनकी एक कविता है जिसमें कुछ सहेलियाँ सम्वाद करती हैं –पढना ज़रूरी है या खेलना और घर का काम काज ?

और अंत में वे सब सहमत होती हैं कि सबसे पहले पढ़ाई,फिर खेलकूद और फिर वक़्त मिले तो घर की साफ-सफाई. यह समय वह था जब स्त्री का पढना-लिखना ग़ैर-परम्परागत ही नहीं खुला विद्रोह था जातीय-लैंगिक भेदभाव से ग्रस्त समाज में. यहाँ एक स्त्री सफल होती है. (Savitribai Phule)

शिक्षा, स्त्री के हाथ में लगी सबसे बड़ी कुंजी है. अशिक्षा उसकी आज़ादी की राह में सबसे बड़ी बाधा. इसलिए जब स्त्री पढती है तो कुछ और आज़ाद होती हैं. जब वह लिखती है तो आज़ाद होती हैं आगे की कई पीढियाँ.

और जब सहमी हुई, दुबले गात वाली, सपने देखती लड़कियाँ फर्स्ट यिअर की क्लास में बैठती हैं तब महज़ तीन साल में उनकी दुनिया बदल जाने की उम्मीद किसी यूटोपिया की तरह नहीं लगती. (Savitribai Phule)

(लेखिका और ब्लॉगर सुजाता की फेसबुक वाल से उनकी आने वाली पुस्तक स्त्री निर्मिती का एक अंश)

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