35 हजार जानवरों की मौत रेलवे से हुए हादसे में क्यों हुई

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35 Thousand Animals Died Railway Accident
चार जुलाई 2019 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर । खबर के मुताबिक वर्ष 2016 से 2018 के बीच ट्रेन से हुए एक्सीडेंट में 60 हाथी मारे गए। जबकि, 20 जून 2019 तक पांच अन्य हाथी इसी प्रकार मारे जा चुके थे। वर्ष 2016 में उन्नीस हाथी ट्रेन एक्सीडेंट में मारे गए। वर्ष 2017 में 19 मारे गए और वर्ष 2018 में 26 हाथियों की मौत ट्रेन से कटकर हुई।
ट्रेन हादसों में होने वाली हाथियों की मौत के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में रेलवे मिनिस्टर पीयूष गोयल ने यह जानकारी संसद को दी। उन्होंने बताया कि हाथियों को छोड़ भी दिया जाए तो वर्ष 2016 से 2018 के तीन सालों में लगभग 32 हजार जानवरों की मौत रेलवे से हुए हादसे में हुई। जबकि, जून 2019 तक 3400  से ज्यादा जानवर इसी प्रकार की दुर्घनाओं में मारे जा चुके थे।
वर्ष 2016 में 7 हजार 945, वर्ष 2017 में 11 हजार 683 और वर्ष 2018 में 12 हजार 626 जानवर रेलवे संबधी हादसों में मारे गए। इनमें बाघ, तेंदुआ, भैंस, गाय जैसे तमाम जानवर शामिल हैं।
ये जानकारी चूंकि संसद उपलब्ध कराई गई है। इसलिए इस पर संदेह का कोई सवाल नहीं उठता है। जो पहली तस्वीर है, वो शायद इन्हीं में से किसी हादसे की होगी। जिसमें एक जीते-जागते टस्कर की हत्या लोहे की डिब्बे ने कर डाली है।
यह है कान्हा-पेंच कारीडोर
ये तस्वीर, भारत के पहले ऐसे अंडरपास कॉरीडोर की है, जो वन्यजीवों के लिए बनाया गया है। ऊपर से सड़क गुजर रही
है। नीचे से जानवरों के आने-जाने का रास्ता है। यह स्ट्रेच एनएच77-44 पर है।

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यह कान्हा-पेंच कारीडोर है। सड़क के दोनों तरफ घने जंगल को साफ देखा जा सकता है। भारतीय वन्यजीव संस्था का एक शोध बताता है कि 90 दिनों के भीतर इसके नीचे से कम से कम 468 जानवरों को गुजरते हुए देखा गया है। ये जानवर 15 अलग-अलग प्रजातियों के थे और इसमें बाघ यानी टाइगर भी शामिल था।
यानी अगर उन्हें रास्ता मुहैया कराया जाए तो वे उस रास्ते पर चलते हैं। वे अंडरपास का इस्तेमाल सीख जाते हैं। इसका फायदा उन्हें भी होता है और हमें भी।

(वन्यजीवों व पर्यावरण का समर्पित ब्लॉग ‘जंगलकथा’ से साभार)

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