Watch- मिर्जा गालिब की 100वीं पुण्यतिथि पर आज के दिन जारी हुआ था डाक टिकट

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– यादगार –

शायरी की दुनिया में मिर्जा गालिब का नाम अमर है। उनकी शायरी पर शोध से लेकर महफिलों में चर्चा शायद कभी पुरानी ही नहीं हुई, जबकि सैकड़ों शायर उसके बाद आए और उन्होंने भी नाम कमाया। 100वीं पुण्यतिथि पर 1969 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया। (In Memory Of Ghalib)

दरअसल, मिर्जा गालिब न सिर्फ शायर रहे, बल्कि उनकी शायरी इतिहास और मनोविज्ञान का पिटारा हैं। उलझनों के साथ जिंदगी जीने का हुनर भी सिखाती हैं उनकी शायरी, साथ ही व्यवस्था से टकराती भी हैं, जिससे कोई बेहतर रास्ता निकले।(In Memory Of Ghalib)

आज उनके जन्मदिन पर देखिए यह वीडियो-

मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खां, जिन्हें आज पूरा विश्व मिर्जा गालिब के नाम से जानता है, उनका पूरा नाम मोहम्मद असदउल्लाह खान था। फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है. गालिब की सारी जिंदगी संघर्षों, विपत्तियों और दु:खों से भरी रही। आर्थिक तंगी ने कभी भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। क़र्ज़ में हमेशा घिरे रहे, लेकिन अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने देते। शायरी और उर्दू अदब से उन्होंने मरते दम तक नाता नहीं तोड़ा।

मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर, 1797 को आगरा में हुआ। जब मिर्जा पांच साल के थे, उनके पिता का देहांत हो गया। उसके बाद उनकी देख भाल उनके चाचा मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग खां ने की, लेकिन पिता के देहांत के तीन साल बाद ही चाचा भी गुजर गए और फिर मिर्ज़ा ननिहाल आ गए। ससुराल चूंकि दिल्ली थी इसलिए वहां आना जाना लगा रहता था। कुछ दिनों बाद वह दिल्ली में ही बस गए, जहां उनकी तमाम उम्र बीती।

जब 10-11 वर्ष के थे, तभी से उन्होंने शेर कहना शुरू कर दिया था। शेरो-शायरी के इतने शौकीन थे कि 25 साल की उम्र में 2000 शेरों का एक ‘दीवान’ तैयार हो गया।

हर दिल अजीज और हाजिरी जबाबी के लिए मशूहर मिर्जा गालिब के चर्चे दिल्ली की हर गली में थे। खुद बादशाह सलामत भी उन्हें सुनना पसंद करते थे।

मिर्जा गालिब को मुगल दरबार के शाही इतिहासकार के रूप में नियुक्त किया गया। बहादुर शाह जफर द्वितीय ने मिर्जा गालिब को “दबीर-उल-मुल्क” के खिताब से नवाजा। नज्म-उद-दौला और ‘मिर्जा नौशा’ खिताब दिया गया।

गालिब का निधन 15 फरवरी, 1869 को दोपहर के समय हुआ। उनकी कब्र दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में निजामुद्दीन औलिया के नजदीक बनाई गई। पुरानी दिल्ली के जिस मकान में रहते थे, उसको गालिब की हवेली कहा जाने लगा और बाद में उसे स्मारक में तब्दील कर दिया गया।


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