यूनानी चिकित्सा पद्धति-2: मुसलमानों का ऐतिहासिक योगदान

डॉ ख़ुर्शीद अहमद अंसारी-

इल्म हासिल करने को लेकर हज़रत मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी का एक लेख उर्दू भाषा में उपलब्ध है। जिसमें लिखा है, मेरे निकट दो धर्म हैं- अमीरी और ग़रीबी और दो ही ज्ञान- इलम ए नाफ़ेय (फ़ायदा पहुंचाने वाला) और इल्म ए मुज़िर ( हानि पहुंचाने वाला)।

यह लेख ईरानी और अरब वैज्ञानिकों के महिमामंडन किस्सा नहीं है। इसका मकसद यह समझाना है कि अतीत के स्वर्णिम पन्नों को उलटते रहें, उनसे प्रेरणा लें, ज्ञान अर्जित करें और प्रयास करें कि ऐसी समझ विकसित की जाए, जिसका लाभ संपूर्ण मानवता को मिल सके। अन्यथा दुनिया में एक अरब अस्सी करोड़ मुस्लिम आबादी होने के बावजूद मुसलमानों को ज्ञान विज्ञान के प्रति उदासीन हो जाने, इंसान की भलाई के लिए नगण्य योगदान के लिए याद रखा जाएगा।

अरबों और इरानियों ने जिनका साम्राज्य एशिया से यूरोपीय देशों तक फैल चुका था, उन्होंने ज्ञान विज्ञान के विकास, प्रचार ,प्रसार के लिए हर देश, धर्म, समुदाय के विद्वानों को बग़दाद में आमंत्रित करके न केवल स्वतंत्र रूप से उन्हें काम करने को कहा बल्कि उनके सम्मानजनक जीवन के मूलभूत इंतज़ाम भी किए।

यूनानी दर्शन के चार मूल तत्व आग, पानी, हवा और मिट्टी से अरब और ईरानी विद्वानों ने उसमें निरंतर परिष्कृतता का प्रयास करते हुए चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया, जिसमें इन मूल तत्वों के समानुपातिक योग संयोग से चार प्रकृतियां, (जिसे मिज़ाज कहते हैं) उत्पन्न होती हैं। हर जीव व निर्जीव में और यह मिज़ाज उस जीव और निर्जीव के गुणों को व्यख्यायित करता है और उसके अस्तित्व के श्रेष्टम और संपूर्णता के लिए अनिवार्य होता है।

उदाहरण के तौर पर, कोई सुगंधित द्रव्य है, उसे अगर खुले में रखा जाए तो वातावरण के कारकों से प्रभावित होते हुए धीरे-धीरे उसके मूल तत्वों का ह्रास होना अनिवार्य हो जाता है, जिससे कि उस द्रव्य का मूल मिज़ाज या प्रवृत्ति नष्ट हो जाएगी। इसी तरह यह चारों मूल तत्व जब प्राकृतिक रूप में संतुलन से मिलते हैं तो उस जीवन के अंदर चार तरल पदार्थ बनते हैं, जिन्हें अरबों और ईरानियों ने जीव द्रव्य (अखलात ए अरबाअ) कहा।

इनसे जीव के शरीर का उद्भव, विकास, उसके पोषण और आवश्यक कारकों को ले जाने का काम होता है। इन्हें ख़ून, बलगम, सफ़रा और सौदा के नाम से उल्लेखित किया गया। ये यूनानियों के सैगुइन, फलेग्म, कोलेरम और मेलनकोल कहा गया जो उन तरल द्रव्यों के रंग के लिहाज़ से व्याख्यायित हैं।

संतुलन और उत्कृष्टतम जीवन की गतिविधियों को नियंत्रित करने और उच्चतम व श्रेष्ठतम अस्तित्व को स्थिर रखने के लिए यूनानी चिकित्सा में एक शब्द प्रयोग किया जाता है, जिसे तबीयत (कैफ़ियत) कहा जाता है, जिससे आंतरिक प्रतिरोधन शक्ति और स्वास्थ्य को संपूर्णता देना है, मतलब की एक जीव को प्राप्त सबसे ताक़तवर क्षमता, जो जीव को स्वस्थ रखे और यदि अस्वस्थ है तो उसे स्वास्थ्य की ओर वापस लाए। इन्हीं चार द्रव्यों के भौतिक और रासायनिक संतुलन के बिगड़ने को ही “रोग” नाम से प्रतिपादित करते हैं।

शोध ,दर्शन, विज्ञान, अन्वेषण, खोज, संपादन, अनुवादन और रचनात्मक योगदान अरबों और ईरानियों द्वारा 7वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक निर्बाध चलता रहा। हर दर्शन, ज्ञान के क्षेत्र में, जिसमें महत्वपूर्ण विषय चिकित्सा, रसायन, भौतिक, गणित, खगोल विज्ञान आदि में दिए गए योगदानों को भुलाया नहीं जा सकता और इन्हीं मूल सिद्धांतों पर ही आधुनिक विज्ञान के आधार का जन्म हुआ है।

मानव विकास विज्ञान और इतिहास के गहन अध्ययन से ये बात सिद्ध होती है कि भारतीय सभ्यता के ज्ञान विज्ञान के अद्वितीय योगदान के बाद अरबों और ईरानियों ने वर्तमान में प्रचलित विज्ञान की समझ और उसके विकास में असाधारण योगदान दिया है।

यूनानी चिकित्सा विज्ञान के सभी उद्धरण की प्राचीन पुस्तकों, पत्रिकाओं में संक्रमण, संक्रामक रोगों के लक्षण, संक्रामक रोगों से बचाव और ऐसे रोगियों के उपचार के लिए प्राकृतिक औषधियों, रसायनों और खानपान की जितनी विस्तृत चर्चा है वो तार्किकता की कसौटी पर खरी उतरती है या उतर सकती है, अगर उन औषधीय गुणों को वर्तमान शोध मापदंडों पर परखने का प्रयास करें। क्या जालीनुस की “मिआस्मा सिद्धांत से ही 200 या 250 वर्ष पूर्व आई जर्म थ्योरी का जन्म नहीं हुआ?”.

इस संदर्भ के अवलोकन को यदि हम पारंपरिक यूनानी के ग्रंथों में ढूंढे तो अविस्मरणीय बातें सामने आती हैं जिनसे 7वीं सदी से लेकर 16वीं सदी के अरबी और ईरानी चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की समझ पर आश्चर्य होता है। वबा या संक्रमण जिस तरह से वर्तमान में कोरोना महामारी का प्रकोप विश्व और मानवता पर गंभीर संकट की तरह आया है, उसे उपरोक्त काल के कुछ वैज्ञानिकों के संदर्भ में समझने का प्रयास करते हैं।

रब्बन तिबरी जो कि आठवी सदीं का चिकित्सक एवं दार्शनिक है। जो तत्कालीन ईरानी साम्राज्य के इराक़ क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि समझता रहा। उसने एक ग्रंथ “फ़िरदौसुल हिकमत” लिखी, जिसमें चिकित्सा विज्ञान के मूल और आधारभूत नैदानिक निर्देशों को विस्तार से लिखा है।

इसका अनुवाद यूरोप के कई भाषाओं में हुआ था। बग़दाद का मुख्य चिकित्सा निदेशक और सबसे सम्मानित चिकित्सा शास्त्री ज़करिया राज़ी है, जिसने 9वीं सदी में रब्बन तबरी से दीक्षा ली। उसका चुनाव मुख्य चिकित्सा अधिकारी के तौर पर एक गहन चुनावी प्रक्रिया के ज़रिए किया गया।

उसने अपने पहले ग्रंथ को तत्कालीन सम्राट के पुत्र को समर्पित करते हुए “किताब अल मंसूर लिखी, जिसे पश्चिम liber almansoris रूपांतरित करता है। इसमें चिकित्सा के अध्याय बहुत ही विस्तार से लिखे गए हैं और संक्रमण का विस्तारपूर्वक उल्लेख है।

उसे बग़दाद में एक बहुत ही विशाल चिकित्सालय बनाने का उत्तरदायित्व जब दिया गया तो उसने अनोखा प्रयोग किया। शहर के कई इलाक़ो में मांस के टुकड़े लटकाए और अंत में उस स्थान पर ऐतिहासिक चिकित्सालय बनाया गया, जहां का मांस सबसे आखिर में सड़ा।

इतना ही नहीं वह चिकित्सा विज्ञान की बहुमूल्य धरोहर, जो 25 खंडों में आज भी यूनानी चिकित्सा के या दूसरे शब्दों में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की नींव रखने में सहायता की है, उस ग्रंथ का लेखक बना। इस किताब का नाम “किताब अल हावी” है, जिसे दुनिया की 38 भाषाओं में अनुदित किया गया और यह पुस्तक 17वीं सदी तक यूरोप के चिकित्सा संस्थानों में पढ़ाई जाती थी।

किताब अल हावी “liber continens” के दो अध्याय और ती से चार खंडों में संक्रमण, संक्रामक रोग और उससे जुड़ी हुई नैदानिक व्यवस्था जो जितने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यख्यायित किया गया है वो आष्चर्यजनक है। इस पुस्तक के सभी खंडों का उर्दू अनुवाद केंद्रीय यूनानी अनुसंधान परिषद, भारत सरकार द्वारा उपलब्ध किया गया है।

राज़ी की एक पत्रिका किताब अल जुदरी व हस्बा, liber variolis et morbilis, जिसका अनुवाद अंग्रेज़ी में “ऑन स्माल पॉक्स एंड मीजल्स” है। उससे अंदाज़ लगाया जा सकता है कि वो चेचक और खसरा जैसी महामारी पर कितनी विद्वता और वैज्ञानिकतापूर्ण व्याख्या 9वीं सदी में कर रहा था।

इतिहासवेत्ता इब्न अबी उसइबिया की विश्वविख्यात पुस्तक उयुन अल अंबा फी तबक़ात अल अतिब्बह से हम सब आसानी से समझ सकते हैं कि वर्तमान “इम्युनाइजेशन” को 9वीं सदी के इस महान वैज्ञानिक ने व्यख्यायित किया।

कहते हैं राज़ी का ख़याल था कि अगर चेचक या स्माल पॉक्स के ऊपर जमने वाली खुरंड को बहुत बारीक पीस कर किसी मनुष्य के शरीर में प्रवेश करा दिया जाए तो उस स्वस्थ व्यक्ति के अंदर इन रोगों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता पैदा हो जाएगी, जिसे आधुनिक विज्ञान एंटीबॉडी इम्युनिटी कहता है।

इतना ही नहीं आधुनिक सर्जरी में उपयोग की जाने वाली कैट गट का अविष्कारक भी यही ज़करिया राज़ी है। 20 हजार पन्नों का लेखक, चिकित्सक और मुख्य चिकित्साधिकारी बग़दाद, अंत में अंधा हो गया तो लोगों ने इलाज की सलाह दी। इसपर उसने उत्तर दिया था- क्षोभ और पीड़ा से भरी दुनिया को इतना देख लिया कि अब उसे और देखने की इच्छा नहीं रही और न ही जरूरत है।

स्पेनवासी मुस्लिम वैज्ञानिक इब्न ए रुश्द, जिसे इतिहासकारों ने एशिया उपमहाद्वीप के धार्मिक विद्वान वर्णित किया है। उनकी धार्मिक पुस्तकें आज भी धार्मिक संस्थानों में पढ़ाई जाती हैं। लेकिन इब्न ए रुश्द की किताब अल कुल्लियात का गहन अध्ययन, उसका अनुवाद और उसके ज्ञान विज्ञान को समझने की बहुत ज्यादा जरूरत महसूस होती है, जिसकी रोशनी में संक्रमण, संक्रामक रोगों को ही न सिर्फ़ समझा जा सके, इस योगदान को भी उचित स्थान मिल सके।

ईरानी साम्राज्य के विश्वविख्यात शेख बू अली सीना अविसेना ज्ञान का लोहा 17वीं सदी तक माना गया। 12वीं सदी का यह महान वैज्ञानिक-चिकित्सक, जिसे तत्कालीन बग़दाद में “चिकित्सकों का राजकुमार” कहा जाता था और उसकी मशहूर किताब “अलक़ानून फ़ी तिब्ब” कैनन ऑफ मेडिसिन कहलाती है।

उसे चिकित्सा विज्ञान की सबसे पवित्रतम ग्रंथो में गिना जाता रहा। इस ग्रंथ के 23 खंडों में से कुछ अध्याय संक्रमण, संक्रामक रोग, सुरक्षा संरक्षा, भोजन चिकित्सा और औषधि विज्ञान से जुड़ी हुई बारीक बिंदुओं पर तार्किक बहस करती है।

इस ग्रंथ को आधार स्तंभ मानकर गरुनर, कैमरून और जेरार्ड ऑफ क्रिमोना आदि 18 और 19वी सदीं के विख्यात चिकित्सक आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को खड़ा करने की बात करते हैं, साथ ही इब्न ए सीना को चिकित्सा का आधुनिक पितामह मानने जैसी बात करते हैं। यह किताब लगभग 400 वर्षों तक यूरोप के चिकित्सा विश्वविद्यालयों में सिलेबस में पढ़ाई जाती रही।

(इस लेख का आधार संक्रमण पर प्रकाशित कुछ शोध पत्रों पर आधारित है, विशेष कर ज़. निगार एट आल, नोमान अनवर एट आल, ए परवेज़ एट आल आदि)

(लेखक जामिया हमदर्द, नई दिल्ली में एसोसिएट प्रोफ़ेसर व यूनानी चिकित्सक हैं, ये उनके निजी विचार हैं, जनहित में साभार)


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